अधूरे पन्ने का आखिरी रंग
अवनीश जी अपनी ज़िंदगी की साठ बसंत देख चुके थे। रिटायरमेंट के बाद उनका दिन अखबार, चाय और बालकनी में
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Read Moreबारिश की शाम थी। शहर के एक छोटे से कैफ़े में हर रोज़ ठीक पाँच बजे एक बुज़ुर्ग आते थे।वो
Read Moreजूड़े में टाँक लिया करती हु अपनी बेबसी , अपने दर्द और टूटी उम्मीदें रबड़ से अच्छी तरह बांध कर
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