मुखोटा
मुझे मुखोटा ओढ़ जीना आ गया बिन हँसी के हँसना आ गया ये लो दोस्तों मुझे भी – इंसान बनना
Read Moreकल रात तुम आये थे! कितना असहज सी हो गयी थी, पल दो पल को ! जानती हूं जरूर कोई
Read Moreतुम्हें सोचती हूँ तो गुम हो जाती हूं , तेरी परछाई सी बन जाती हूं गजलें लिखती हूँ गीत गुनगुनाती
Read Moreमेरे गाँव से दूसरे गाँव जाने के लिए सिर्फ एक पगडण्डी ही थी | छत या चौबारे में खड़ी अमिता
Read Moreये दरख़्त , येे चौखट , ये गलियां, कुछ भी ना भूला ये परिंदा आवारा !! वक्त की धूल ने
Read More“क्या कहा तूने — पैसे नहीं देगी ? क्यों ? अपने देहज में लायी थी क्या ? खाती है मेरे
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