अनुष्टुप छंद “गुरु पंचश्लोकी”
अनुष्टुप छंद “गुरु पंचश्लोकी” सद्गुरु-महिमा न्यारी, जग का भेद खोल दे। वाणी है इतनी प्यारी, कानों में रस घोल दे।।
Read Moreअनुष्टुप छंद “गुरु पंचश्लोकी” सद्गुरु-महिमा न्यारी, जग का भेद खोल दे। वाणी है इतनी प्यारी, कानों में रस घोल दे।।
Read More“गुरु महिमा” अज्ञानान्धकार हृदय का ज्ञान-भानु, वह मन में फैलाता ज्ञानालोक। करता उभय लोक सफल गुरु, हरता सब जीवन का
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