कविता

लोग पथ से भटक रहे हैं

ये कैसा समय आ गया हैजब लोग भटक रहे हैं अपने पथ से,मर्यादा लांघ रहे हैंसंस्कार सभ्यता से दूर हो रहे हैं।मान मर्यादा की हदें पार कर रहे हैंमां बाप का अपमान कर रहे हैंछोटे बड़े का न लिहाज कर रहे हैं,आधुनिकता की अंधी दौड़ मेंसारी हदें पार कर रहे हैं,शर्मोहया की हदें पार कर रहे हैं।अपनी धर्म संस्कृति को ठुकरा रहे हैंपश्चिमी सभ्यता के गुलाम बन रहे हैं पूजा पाठ धार्मिक संस्कार को छोड़पाश्चात्य संस्कृति का गुणगान कर रहे हैं।नियम धर्म संस्कार का मजाक उड़ा रहे हैंअपने पुरखों को गंवार बता रहे हैंमाता पिता परिवार से दूर हो रहे हैंअपनी बीवी के साथ आजाद जीवन जी रहे हैंअपने बीवी बच्चों को ही परिवार समझ रहे हैं।मां बाप अकेलेपन का दंश झेल रहे हैंसमय से पहले दुनिया छोड़ रहे हैंया वृद्धाश्रम में जीवन के अंतिम दिन गिन रहे हैं।कौन कहता है कि लोग अपने पथसे भटक रहे हैं?वास्तव में लोग बड़े समझदार हो गये हैंअपनी औलादों को भविष्य की राह दिखा रहे हैंअपने हाथों ही अपनी राह दुश्वार कर रहे हैंतब लगता है कि अब तो लोग जानबूझकरअपने सुगम पथ से भटक रहे हैंअपने कल के अंधेरे की नींव आज ही रख रहे हैंविकास की नई गाथा आधुनिक ढंग से लिख रहे हैं,जिसे हम आप पर से भटकना बता रहे हैं।

*सुधीर श्रीवास्तव

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