श्रीमद्भागवतगीता में “ओम्” का वर्णन
“प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ।” (७/८)
मैं समस्त वेदों में प्रणव (ओम्/ऊँ) हूँ ।
“ओं इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।” (८/१३)
जो मनुष्य ओम् नामक एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करते हुए मेरा स्मरण करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है ।
“पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
*वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥” (९/१७)
मैं ही इस जगत का पिता, माता… और पवित्र ओंकार हूँ ।
“महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।” (१०/२५)
वाणी में मैं एक-अक्षर (ओम्) हूँ ।
“ओं तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।” (१७/२३)
ब्रह्म का त्रिविध नाम “ओम्”, तत् और सत् कहा गया है ।
“तस्मादोम इत्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।” (१७/२४)
इसलिए यज्ञ, दान और तप की क्रियाएँ ओम् के उच्चारण से आरंभ की जाती है ।
इस प्रकार हम पाते हैं कि,
क) गीता में ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ नाम “ओम्” का जप करने और कहने का विधान भगवान् श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
ख) श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि वही व्यक्ति परमगति को प्राप्त होता है जो “ओम्” का जप करता है ।
ग) श्रीकृष्ण ने स्वयं को “ओम्” कहा है ।
जब श्रीकृष्ण ने “ओम्” का जप करने की आज्ञा दी है, तो किसी कथित बाबा के कहने मात्र से हम “राधे- राधे” अथवा “गोविंद-गोविंद” का जप क्यों लगा रहे हैं? अतः श्रीकृष्ण का कहना मानकर हमें “राधे-गोविन्द” के स्थान पर”ओम्” का जप करना चाहिए ।
