ट्रम्प के टैरिफ और ढहती व्यापार व्यवस्था : अनिश्चितता का युग
20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसमें कहा गया कि राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पॉवर्स एक्ट’ (IEEPA) के तहत लगाए गए टैरिफ कानून की मनाही के विरुद्ध हैं। इस फैसले ने वैश्विक व्यापार जगत में खलबली मचा दी क्योंकि IEEPA टैरिफ अब तक वसूले गए कुल टैरिफ राजस्व का लगभग 61 प्रतिशत हिस्सा थे। येल विश्वविद्यालय के बजट लैब के अनुसार 2025 के टैरिफ ने 2022-24 के औसत की तुलना में 194.8 अरब डॉलर का अतिरिक्त राजस्व जुटाया था और दिसंबर 2025 तक प्रभावी टैरिफ दर 9.9 प्रतिशत तक पहुंच गई थी जो 2024 के अंत में महज 2.3 प्रतिशत थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ट्रम्प घबराए नहीं — उन्होंने अगले ही दिन ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122 का उपयोग करते हुए 10 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी। इस पर 24 अमेरिकी राज्यों ने कोर्ट में चुनौती दी और मामला अभी भी अदालत में लंबित है। 4 मार्च को ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यह टैरिफ 15 प्रतिशत तक बढ़ाया जाएगा।
टैक्स फाउंडेशन के मार्च 2026 के विश्लेषण के अनुसार 2026 में ट्रम्प के टैरिफ 171.1 अरब डॉलर का राजस्व जुटाएंगे जो GDP का 0.54 प्रतिशत है और यह 1993 के बाद अमेरिका की सबसे बड़ी कर वृद्धि है। प्रत्येक अमेरिकी परिवार पर 2026 में औसतन 1,500 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। आयातित वस्तुओं की उपभोक्ता कीमतें 2025 में 1.3 से 1.4 प्रतिशत तक बढ़ीं। TIME पत्रिका ने जनवरी 2026 में एक विश्लेषण में लिखा कि ट्रम्प के टैरिफ वैश्विक व्यापार की नींव में दीमक की तरह हैं जो तुरंत नजर नहीं आते लेकिन धीरे-धीरे पूरी संरचना को खोखला कर देते हैं। यह बात अब और स्पष्ट होती जा रही है जब मूडीज के मुख्य अर्थशास्त्री मार्क जांडी ने कहा कि ‘अमेरिका दुनिया से दूर जा रहा है और दुनिया अमेरिका से दूर जा रही है — यह विखंडन अर्थव्यवस्था पर भार है और इसका परिणाम एक कमजोर अर्थव्यवस्था है।’
सुप्रीम कोर्ट के IEEPA फैसले के बाद की स्थिति बेहद जटिल है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर ने कहा है कि प्रशासन अब ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 232 (राष्ट्रीय सुरक्षा आधार) और धारा 301 (अनुचित व्यापार प्रथाएं) का उपयोग करते हुए टैरिफ जारी रखेगा। लेकिन धारा 122 की मियाद केवल 150 दिन है जिसके बाद कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होगी। यह राजनीतिक रूप से कठिन होगा क्योंकि खुद रिपब्लिकन पार्टी में भी टैरिफ की नीति को लेकर मतभेद हैं। व्यापार की दुनिया में इस अनिश्चितता का सबसे बड़ा शिकार व्यवसाय हो रहे हैं। EY-पार्थेनन के मुख्य अर्थशास्त्री ग्रेगरी डाको के शब्दों में — ‘टैरिफ के बारे में सुनने को मिलता है कि अब वे नहीं हैं और आप यह जानना चाहते हैं कि पैसे वापस कैसे मिलेंगे। फिर कुछ घंटे बाद वे 10 प्रतिशत हो जाते हैं। फिर अगले दिन 15 प्रतिशत। ऐसी अस्थिर नीति का ढांचा आर्थिक गतिविधियों के लिए बहुत नुकसानदायक है।’ रॉयल बैंक ऑफ कनाडा के अमेरिकी अर्थशास्त्री प्रमुख माइक रीड ने कहा कि यह दुनिया के सबसे बड़े व्यापार साझेदार के साथ व्यापार करने के तरीके को बदल देता है और इसके आर्थिक परिणाम निश्चित हैं।
चीन की स्थिति इस पूरी तस्वीर में सबसे महत्वपूर्ण है। अभी भी चीनी आयात पर 30 प्रतिशत टैरिफ (20 प्रतिशत ‘फेंटेनाइल’ और 10 प्रतिशत ‘पारस्परिक’) लागू है। चीन ने दुर्लभ खनिजों (Rare Earths) पर अपने नियंत्रण का उपयोग एक रणनीतिक हथियार के रूप में किया है क्योंकि वह वैश्विक शुद्ध दुर्लभ खनिज उत्पादन क्षमता का 90 प्रतिशत से अधिक नियंत्रित करता है। AI डेटा केंद्रों, अर्धचालकों और उन्नत प्रौद्योगिकियों के लिए जरूरी इन खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को चीन बाधित कर सकता है जिससे अमेरिका की तकनीकी प्रधानता को गंभीर खतरा है। यूरोपीय संघ और अमेरिका के बीच 27 जुलाई 2025 को जो व्यापार समझौता हुआ था जिसमें कुल टैरिफ 15 प्रतिशत की सीमा तय की गई थी, वह अब IEEPA के गिरने और नई धारा 122 के आने से संकट में है। EU की संसद ने 23 फरवरी को इस समझौते की पुष्टि रोक दी और चैथम हाउस ने 18 मार्च 2026 को एक विशेष चर्चा रखी है कि इसका आगे क्या होगा।
भारत के लिए इस टैरिफ उथल-पुथल की एक उल्लेखनीय राहत यह है कि 6 फरवरी 2026 को व्हाइट हाउस ने भारत पर लगने वाली पारस्परिक टैरिफ दर 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने की घोषणा की। 7 फरवरी से प्रभावी हुई एक अन्य व्यवस्था के तहत रूसी तेल का आयात करने वाले देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगने वाली 25 प्रतिशत की अतिरिक्त ड्यूटी भी भारत से हटा ली गई। Goldman Sachs के अनुमान के अनुसार भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से 2026 में भारत की GDP वृद्धि में 0.2 प्रतिशत अंक का अतिरिक्त योगदान होगा। लेकिन भारत को यह समझना होगा कि जो प्रशासन एक दिन में नीति बदल देता है वह जब चाहे इन रियायतों को भी वापस ले सकता है। टैरिफ का यही सबसे खतरनाक पहलू है — न केवल वे व्यापार को महंगा करते हैं, बल्कि अनिश्चितता पैदा करते हैं जो निवेश, नियोजन और दीर्घकालिक आर्थिक संबंधों को नष्ट करती है।
KPMG की 2026 ट्रेड आउटलुक रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक व्यापार की राहें 2025 में तमाम झटकों के बावजूद उल्लेखनीय रूप से मजबूत रहीं, लेकिन 2026-27 में वैश्विक वृद्धि धीमी होने का खतरा है जो निर्यात मांग को घटाएगी। ट्रम्प के टैरिफ के विरुद्ध अमेरिकी उत्पादों के बहिष्कार के रूप में प्रतिशोध का खतरा भी है। व्यापार के बदलते समीकरणों में चीन की ओर प्रवाह बढ़ा है जो अमेरिकी निर्यात के लिए एक दीर्घकालिक खतरा है। सबसे महत्वपूर्ण बात जो KPMG ने कही है वह यह कि ‘जब एक व्यवधान कम होता है, दूसरा सामने आ जाता है — ईरान युद्ध से उठी तेल कीमतें, होर्मुज बंदी, लाल सागर में संभावित नई अस्थिरता — ये सब मिलकर वैश्विक व्यापार के लिए एक बेहद अनिश्चित माहौल बना रहे हैं।’ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी जो बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था थी, वह आज गंभीर परीक्षण के दौर में है। यह केवल टैरिफ का मामला नहीं, बल्कि विश्वास का संकट है।
— पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
