आज़ादी के अमृतकाल में संकल्प, साधना और राष्ट्र निर्माण का पर्व
स्वतंत्रता दिवस केवल एक राष्ट्रीय पर्व या कैलेंडर का पन्ना मात्र नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत अमर सेनानियों के त्याग, तपस्या, अदम्य साहस और बलिदान को श्रद्धासुमन अर्पित करने का वह पावन अवसर है, जिनके खून-पसीने और संघर्षों के परिणामस्वरूप 15 अगस्त 1947 को भारत ने सदियों की परतंत्रता की बेड़ियों को काटकर एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में खुली हवा में सांस ली थी। जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो हमें महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलनों, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के इंकलाबी जोश, सुभाष चंद्र बोस के ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’ के आह्वान तथा चंद्रशेखर आजाद के अदम्य पराक्रम की गूंज सुनाई देती है, जिनके साथ-साथ उन तमाम गुमनाम नायकों और वीरांगनाओं का स्मरण करना भी हमारा नैतिक दायित्व हो जाता है जिन्होंने इतिहास के हाशिए पर रहकर भी मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। आज़ादी के वास्तविक मायने केवल विदेशी शासन से मुक्ति पाना या सत्ता का हस्तांतरण होना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ एक ऐसा प्रगतिशील, न्यायप्रिय और समतावादी समाज गढ़ना है जहाँ जाति, धर्म या वर्ग के भेद से ऊपर उठकर देश का हर नागरिक गरिमापूर्ण, भयमुक्त और आत्मनिर्भर जीवन जी सके। पिछले सात दशकों से अधिक की इस गौरवशाली विकास यात्रा में भारत ने अपनी परिपक्वता का लोहा मनवाते हुए विज्ञान, अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में मंगल और चंद्र अभियानों, अत्याधुनिक तकनीक, हरित क्रांति से लेकर कृषि आधुनिकीकरण, शिक्षा के विस्तार और आर्थिक सशक्तिकरण में अभूतपूर्व मील के पत्थर हासिल किए हैं, जिससे आज वैश्विक मंच पर भारत की गिनती दुनिया की अग्रणी महाशक्तियों और मार्गदर्शकों में होने लगी है। इसके बावजूद, यदि हम गहराई से विचार करें तो आज भी हमारे सामने भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, सामाजिक असमानता और महिला सुरक्षा जैसी कुछ ऐसी गंभीर आंतरिक चुनौतियाँ मुँह बाए खड़ी हैं जो हमसे ईमानदारी से आत्ममंथन और ठोस सामूहिक प्रयासों की मांग करती हैं, क्योंकि जब तक समाज के सबसे अंतिम पायदान पर बैठे व्यक्ति के जीवन में उजाला नहीं आता, तब तक हमारी आज़ादी अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकती। राष्ट्र की इस महान विकास यात्रा में देश की विशाल और ऊर्जावान युवा पीढ़ी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है, जिन पर न केवल तकनीकी नवाचार और आधुनिकीकरण का जिम्मा है, बल्कि देश के सामाजिक ताने-बाने और नैतिक मूल्यों को संजोए रखने का उत्तरदायित्व भी है। आइए, इस स्वतंत्रता दिवस के पवित्र अवसर पर हम सब मिलकर यह दृढ़ संकल्प लें कि हम अपने संविधान की प्रस्तावना, मौलिक कर्तव्यों और राष्ट्रीय प्रतीकों का पूर्ण सम्मान करेंगे, संकीर्णताओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखेंगे तथा भारत को विश्व गुरु और विकास के शिखर पर ले जाने में अपना शत-प्रतिशत योगदान देंगे ताकि हमारे अमर शहीदों का देखा गया सपना साकार हो सके, क्योंकि आज़ादी सिर्फ एक अधिकार नहीं बल्कि एक पवित्र उत्तरदायित्व है।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह सहज़
