नन्हा दर्शक
नन्ही-नन्ही आँख में, सपनों का संसार।
रंग-बिरंगे चित्र से, खिलता हर व्यवहार॥
मोबाइल पर देखता, सीख रहा पहचान।
बचपन की उत्सुकता में, बसता सारा ज्ञान॥
मम्मी-पापा साथ हों, हो थोड़ा संवाद।
प्यार भरी हर बात से, खिलता उसका स्वाद॥
खेल-कूद भी ज़रूरी, दौड़े हर दिन धूप।
हँसी-ठिठोली से सजे, बचपन का स्वरूप॥
पुस्तक, खेल और प्रेम का, रखिए सुंदर मेल।
संस्कारों की छाँव में, जीवन बने सुहेल॥
नन्हा मन है फूल-सा, रखिए इसका ध्यान।
स्नेह, समय और सीख से, ऊँचा हो इंसान॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
