कहानी

अस्तित्व….

उस भीड़ वाले माहोल मे भी किरण का जैसे दम घुटने लगा| मेजबान अंजली किरण की परेशानी को कब से ही महसूस कर रही थी| ”आपको कोई परेशानी है क्या?, अंजली ने किरण से पूछा| ”नहीं नहीं मै बिलकुल ठीक हूँ|” कहते हए किरण वहां से दूसरी और चली गयी|

किरण घर मे भी अपने को अकेला अनुभव करती है| इतने बड़े परिवार मे रह कर भी अपने को अकेला समझना उसे भी कुछ अजीब लगता है कस्बे मे पली-बढ़ी किरण को महानगर की जिन्दगी कभी रास नहीं आयी| शादी के पांच वर्ष बीत गये| जिन धारणाओं- मान्यताओ और आस्थाओ मे वो पली-बढ़ी है उसके विपरित शहरी जीवन उसे अजीब लगा है| एक घंटा हो गया समय का पता नहीं चला पार्टी ख़त्म होने की और है |
उसने हमेशा संयम से जीना सीखा है| उसके अनुसार नारी की एक मर्यादा होती है उसी मर्यादा के अनुसार उसे जीना चाहिए| नारी की पुरुष से अलग एक छवि होती है| वो माँ,पत्नी ,बहु और बेटी होती है| परन्तु सुमित से विवाह हो जाने के बाद उसे लगा,वो सारे संस्कार जैसे अब इस नई जिन्दगी मे बेमानी हो गये है| सुमित के घर मे इन सबके लिए कोई जगह नहीं है| सुमित का बार-बार किरण को उसके व्यक्तित्व के बारे मे जताना, उसके व्यक्तित्व को नकारना ही था| सुमित की माँ भी अपने बेटे के लिए आधुनिक विचारों वाली बहू चाहती थी|
शादी होने के चंद सप्ताह बाद ही किरण की सास उसे बेटे की पसंद-ना पसंद बता कर वो अपने घर चली गयी थी सुमित जॉब के लिए माँ से दूर रहता था| सास, बहु के आने के बाद जैसे निश्चिन्त हो गयी  थी| अपनी शादी के कुछ दिन बाद ही उसे आभास हो गया था कि वो यहाँ अच्छे से सेट नहीं हो पाएगी| सुमित को उसने उसकी दोस्त नेहा के साथ अपने शादी के रिशेप्शन वाले दिन इतने करीब देखा, दोनों एक प्लेट मे खाना खा रहे थे किरण शर्माती हुई एक किनारे खड़ी ये सब देख रही थी|
सुमित और नेहा ने साथ-साथ ऍम.बी .ए .किया था| दोनों ने जॉब के लिए अमेरिका के न्यू यार्क को चुना|सब कुछ ठीक चल रहा था| वो दोनों शादी करना चाहते थे; पर सुमित की माँ अपने देश मे रहने वाली लड़की को बहु बनाना चाहती थी| सुमित माँ के आग्रह पर भारत आ गया,पापा कुछ साल पहले बीमारी की वजह से इस दुनिया से चल बसे थे| नेहा, सुमित के आने के कुछ वर्ष बाद भारत लौट आयी, वो भारत मोटर्स मे मैनेजर की पोस्ट पर काम करने लगी| तीस वर्ष की हो गयी पर अभी तक शादी नहीं की, सुमित को अभी तक नहीं भूली है|
पार्टी मे नेहा और सुमित को इतना करीब देखकर,किरण को बहुत बुरा लगा है| सुबह किरण ने सुमित से कहा ”आपको नेहा के साथ इस तरह घुलमिल कर बाते करते हुए,एक प्लेट मे खाना खाते हुए देखकर मुझे कितना बुरा लगा!, कभी सोचा इस बारे मे|’
”ऐसा तो तुम अक्सर देखती हो, फिर आज कौनसी नई बात हो गयी|’
‘इतनी बड़ी पार्टी मे आपको उसके साथ देखकर मेरा सर शर्म से पानी -पानी हो गया|’किरण ने कहा|
चाचा जी ने तो पापा को सुमित से शादी नहीं कराने की सलाह भी दी थी| पर वो कोई निर्णय जल्दी से कर नहीं पाये और मेरी शादी आखिर सुमित से करा दी गयी| आखिर किरण ने अपने घर के दम घोटू माहोल से निकलने के लिए नौकरी करने का फैसला किया| सुबह जब किरण तैयार होकर निकल रही थी,तो सुमित ने टोकते हुए पूछा ”कहाँ जा रही हो इतनी जल्दी तैयार होकर?’
”मैंने एक स्कूल मे नौकरी ज्वाइन की है; वहीँ जा रही हूँ|’ किरण ने कहा|
“इतनी बड़ी कंपनी के मैनेजर की पत्नी,स्कूल मे नौकरी करेगी!’ सुमित ने गुस्सा होते हुए कहा|
”हाँ तो क्या बुराई है| क्या मै अपनी मर्जी का कुछ भी नहीं कर सकती?
सुमित ने अपने स्वर मे मिठास घोलते हुए कहा ” मत जाओ नौकरी करने,मेरी हैसियत का तो कुछ ख्याल करो| पर तब तक किरण दरवाजा पार करके बाहर आ गयी थी| अपनी जिन्दगी की एक नई शुरुआत करने के लिए ये उसका पहला कदम था| शायद आज वो अपने आस्तित्व को पहचान पायी थी|
शांति पुरोहित

शान्ति पुरोहित

निज आनंद के लिए लिखती हूँ जो भी शब्द गढ़ लेती हूँ कागज पर उतार कर आपके समक्ष रख देती हूँ

4 thoughts on “अस्तित्व….

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत अच्छी कहानी. लेकिन क्या यह उस समस्या का सही समाधान है, जो इस कहानी में दिखाई गई है? मुझे इसमें संदेह है.

    • शान्ति पुरोहित

      विजय कुमार भाई जी संदेह की कोई बात नही है, जॉब करेगी तो दिन भर व्यस्त रहेगी,समय ठीक से कटेगा | पति का क्या ! वो तो वही करेगा जो उसका मन करेगा यही बताना इस कहानी का उद्देश्य है

  • शान्ति बहन बहुत अच्छी और दिल को छू देने वाली कहानी है .

    • शान्ति पुरोहित

      गुरमेल भाई साहब बहुत शुक्रिया आपका

Comments are closed.