पर्यावरण

धर्म और पर्यावरण संरक्षण

पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता जिन दो स्तंभों पर टिकी है, उनमें से एक है मनुष्य की आस्था और दूसरा है प्रकृति का संतुलन। जब तक ये दोनों एक-दूसरे के पूरक रहे, तब तक मानव सभ्यता फलती-फूलती रही। किंतु जैसे-जैसे आधुनिकता के नाम पर मनुष्य ने प्रकृति को उपभोग की वस्तु मानना शुरू किया, वैसे-वैसे एक गहरा असंतुलन उत्पन्न होता चला गया। आज जब विश्व पर्यावरण संकट की चरम स्थिति में खड़ा है — जहाँ ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, जंगल जल रहे हैं और जैव-विविधता तेज़ी से घट रही है — तब एक बार फिर मानवता को उसी प्राचीन ज्ञान की ओर लौटना होगा जिसे हमारे धर्मों ने सदियों पहले प्रतिपादित किया था।

भारत की धार्मिक परंपरा, जो संसार की प्राचीनतम जीवित परंपराओं में एक है, पर्यावरण के साथ एक पवित्र और गहरे संबंध की कल्पना करती है। यहाँ नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं हैं, वे माताएँ हैं — गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा। वृक्ष देवताओं के निवास-स्थान हैं — पीपल में विष्णु, बरगद में ब्रह्मा, तुलसी में लक्ष्मी का वास माना जाता है। पशु केवल जीव-जंतु नहीं, वे देवताओं के वाहन हैं — बाघ, मोर, हाथी, गाय, साँप सभी किसी न किसी देवता से जुड़े हैं। यह धार्मिक आस्था कोई अंधविश्वास नहीं थी, यह एक सुविचारित पारिस्थितिक दर्शन था जो प्रकृति के हर तत्व को सम्मान और संरक्षण का अधिकार देता था।

वेदों में पर्यावरण चिंतन : सृष्टि की पवित्रता का उद्घोष

ऋग्वेद, जो मानवता के ज्ञात इतिहास के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक है और जिसकी रचना अनुमानतः 1500 से 1200 ईसा पूर्व के बीच हुई मानी जाती है, उसमें पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि के प्रति जो श्रद्धा प्रकट की गई है, वह आज भी प्रासंगिक है। ऋग्वेद के पृथ्वी सूक्त में कहा गया है — ‘माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:’ — अर्थात् पृथ्वी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ। यह एक पंक्ति पूरे वैदिक पर्यावरण-दर्शन का सार है। जब आप पृथ्वी को माता मानते हैं, तो उसका दोहन नहीं, उसकी सेवा और संरक्षण स्वाभाविक हो जाता है।

अथर्ववेद का भूमि सूक्त, जिसे विश्व की प्रथम पर्यावरण-घोषणा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी, 63 मंत्रों में पृथ्वी की प्रकृति, उसकी जैव-विविधता और मानव के उत्तरदायित्व का वर्णन करता है। इसमें वनस्पतियों, जल-स्रोतों, पर्वतों और सभी जीवों के प्रति आदर का भाव व्यक्त किया गया है। यजुर्वेद में शांतिपाठ के माध्यम से द्युलोक, अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधि, वनस्पति — सभी के लिए शांति की कामना की गई है। यह प्रार्थना पर्यावरणीय समग्रता का उत्कृष्ट उदाहरण है। सामवेद और यजुर्वेद में वायु और जल की शुद्धता के लिए अनेक यज्ञों का विधान है — ये यज्ञ केवल आध्यात्मिक अनुष्ठान नहीं थे, बल्कि वायुमंडल को शुद्ध रखने, वर्षा को आकर्षित करने और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के वैज्ञानिक उपाय भी थे।

उपनिषदों में ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ — अर्थात् यह सम्पूर्ण सृष्टि ब्रह्म है — का दार्शनिक सिद्धांत पर्यावरण-नैतिकता की आधारशिला है। जब आप प्रत्येक वृक्ष, नदी, पर्वत और जीव में ब्रह्म का अंश देखते हैं, तो उनके विनाश की कल्पना भी पाप बन जाती है। ईशावास्योपनिषद का पहला श्लोक — ‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्’ — यही कहता है कि इस जगत में जो कुछ भी है, वह ईश्वर से आच्छादित है। इसलिए किसी के भी भाग पर लालच मत करो।

हिंदू परंपरा में प्रकृति-पूजा : जीवंत पर्यावरण-शास्त्र

हिंदू धर्म में पर्यावरण संरक्षण केवल एक नैतिक आदेश नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक व्यवहार है जो त्योहारों, संस्कारों और दैनिक आचरण में गहराई से समाया हुआ है। हरेला पर्व, जो उत्तराखंड में मनाया जाता है, वृक्षारोपण का उत्सव है। वन महोत्सव की जड़ें इसी परंपरा में हैं। पिपलांतरी गाँव, राजस्थान का वह अनुपम उदाहरण, जहाँ लड़की के जन्म पर 111 पेड़ लगाए जाते हैं — यह परंपरा हिंदू संस्कारों की प्रकृति-प्रियता का प्रमाण है। नवग्रह वाटिका, पंचवटी, और अशोक वन की अवधारणाएँ वनस्पति-संरक्षण की सुव्यवस्थित प्रणालियाँ थीं।

बिश्नोई समुदाय, जो राजस्थान के थार मरुस्थल में बसता है, हिंदू पर्यावरण-चेतना का जीवंत प्रतीक है। 1730 ईस्वी में जब जोधपुर के महाराजा के सैनिक खेजड़ी के पेड़ काटने आए, तो अमृता देवी बिश्नोई ने अपने प्राण देकर उन पेड़ों की रक्षा की। उनके साथ 363 अन्य बिश्नोइयों ने भी अपनी जान दी। यह विश्व का पहला चिप्को आंदोलन था — चिप्को आंदोलन से 242 वर्ष पहले। बिश्नोई समुदाय के 29 नियमों में से अनेक पर्यावरण संरक्षण से संबंधित हैं — पेड़ न काटना, हरे पत्ते न तोड़ना, जीव-जंतुओं को न मारना। गुरु जम्भेश्वर ने 15वीं शताब्दी में ये नियम इसलिए बनाए थे क्योंकि वे समझते थे कि मरुस्थल में जीवन का अस्तित्व वृक्षों और जीवों के संरक्षण पर निर्भर है।

1973 में उत्तराखंड के चमोली जिले में जन्मा चिप्को आंदोलन, गौरा देवी और अन्य महिलाओं के नेतृत्व में, उसी प्राचीन परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति था। पेड़ों से लिपटकर उनकी रक्षा करने वाली महिलाओं की प्रेरणा धार्मिक-सांस्कृतिक थी। वे जानती थीं कि वन ही उनके जीवन का आधार हैं, और धर्म ने उन्हें वन-रक्षा का संस्कार दिया था। इस आंदोलन के फलस्वरूप 1980 में हिमालय क्षेत्र में वाणिज्यिक वन-कटाई पर प्रतिबंध लगा — यह धार्मिक प्रेरणा से जन्मी पर्यावरण नीति का एक दुर्लभ उदाहरण है।

इस्लाम और पर्यावरण : खलीफा की जिम्मेदारी

इस्लाम में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा ‘खिलाफत’ के सिद्धांत पर आधारित है। अल्लाह ने मनुष्य को पृथ्वी पर अपना खलीफा (प्रतिनिधि) बनाया है — और एक खलीफा का दायित्व विनाश का नहीं, बल्कि देखरेख और संरक्षण का है। पवित्र कुरान में कहा गया है — ‘फसाद (भ्रष्टाचार/विनाश) न फैलाओ पृथ्वी पर, जब कि इसे सुधारा जा चुका है।’ (सूरह अल-अराफ 7:56) यह आदेश पर्यावरण-विनाश के विरुद्ध सीधी चेतावनी है।

पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) की हदीसों में पर्यावरण के प्रति गहरी संवेदना मिलती है। उन्होंने कहा था — ‘यदि कयामत का दिन आ जाए और तुम्हारे हाथ में एक पौधा हो, तो भी उसे लगाओ।’ यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण उद्धरण है जो दीर्घकालिक सोच और पर्यावरण-प्रतिबद्धता को धार्मिक कर्तव्य बनाता है। एक अन्य हदीस में वे कहते हैं कि पेड़ लगाना या फसल उगाना सदका-ए-जारिया (सतत दान) है। पैगंबर ने युद्धों में भी पेड़ काटने, पानी दूषित करने और फसलें जलाने पर प्रतिबंध लगाया था — जो आधुनिक अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के पर्यावरण-प्रावधानों के समकक्ष है।

‘हिमा’ की अवधारणा इस्लामी पर्यावरण-प्रबंधन की एक विशिष्ट परंपरा है जिसमें कुछ क्षेत्रों को संरक्षित घोषित किया जाता था जहाँ शिकार, वन-कटाई और अति-चराई पर प्रतिबंध होता था। यह आधुनिक संरक्षित क्षेत्र (protected area) की अवधारणा का प्राचीन स्वरूप था। अरब प्रायद्वीप में यह प्रणाली इस्लाम से पूर्व भी थी, लेकिन इस्लाम ने इसे धार्मिक मान्यता देकर और अधिक व्यापक बना दिया। सऊदी अरब में आज भी कुछ हिमा क्षेत्र संरक्षित हैं। इसी तरह ‘हरीम’ की अवधारणा जल-स्रोतों के आसपास के क्षेत्र की रक्षा करती थी।

2015 में प्रकाशित ‘इस्लामिक डिक्लेरेशन ऑन ग्लोबल क्लाइमेट चेंज’ — जिसे 60 से अधिक देशों के इस्लामी विद्वानों ने हस्ताक्षरित किया — में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देश, अफ्रीका और दक्षिण एशिया के गरीब मुस्लिम देश हैं और इसलिए जीवाश्म ईंधन से शीघ्रातिशीघ्र मुक्ति पाना एक इस्लामी कर्तव्य है। यह घोषणा आधुनिक इस्लामी पर्यावरण-चेतना का प्रतीक है।

बौद्ध धर्म और प्रकृति : अहिंसा का विस्तार

बौद्ध धर्म में पर्यावरण-नैतिकता की जड़ें ‘अहिंसा’ और ‘करुणा’ के मूल सिद्धांतों में हैं। बुद्ध का जन्म लुंबिनी के एक उद्यान में हुआ, उन्हें ज्ञान बोधगया में एक पीपल वृक्ष के नीचे मिला, और उनका प्रथम उपदेश सारनाथ के मृगदाव (हिरण उद्यान) में हुआ — यह संयोग नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ बौद्ध दर्शन के गहरे संबंध का प्रतीक है। ‘मेत्ता सुत्त’ में कहा गया है — ‘जैसे एक माता अपने एकमात्र पुत्र की रक्षा अपने प्राणों से भी करती है, वैसे ही सभी प्राणियों के प्रति असीम करुणा भाव रखो।’

थेरवाद बौद्ध परंपरा में भिक्षुओं के लिए वन में निवास और वन की रक्षा का विधान है। ‘वन-विहार’ परंपरा न केवल आध्यात्मिक साधना का माध्यम थी, बल्कि वनों के संरक्षण का भी उपाय थी। आज थाईलैंड में बौद्ध भिक्षु ‘पेड़ों का अभिषेक’ करते हैं — वृक्षों को भगवा वस्त्र पहनाते हैं ताकि लोग उन्हें न काटें। इस आंदोलन को ‘ट्री ऑर्डिनेशन मूवमेंट’ कहा जाता है और इसने हजारों एकड़ वन भूमि की रक्षा की है।

तिब्बती बौद्ध धर्म में पर्यावरण-संरक्षण की ‘रिग्पा’ परंपरा है, जिसमें पर्वतों, नदियों और झीलों को पवित्र मानकर उनकी सुरक्षा की जाती है। दलाई लामा ने 1992 में रियो पृथ्वी सम्मेलन में और 2015 में पेरिस जलवायु सम्मेलन से पूर्व पर्यावरण संरक्षण के लिए आह्वान किया। उन्होंने ‘पारिस्थितिक बौद्ध धर्म’ (Ecological Buddhism) की अवधारणा दी, जिसमें वे जलवायु परिवर्तन को एक आध्यात्मिक-नैतिक संकट के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार, ‘हम पृथ्वी से कुछ भी नहीं ले सकते जो हमारी जरूरत से अधिक हो — यह बौद्ध सिद्धांत और आर्थिक नीति दोनों के लिए सत्य है।’

ईसाई धर्म और सृष्टि-संरक्षण : स्टेवार्डशिप की अवधारणा

ईसाई धर्म में पर्यावरण-नैतिकता ‘स्टेवार्डशिप’ (प्रबंधकत्व) की अवधारणा पर आधारित है। बाइबल के उत्पत्ति ग्रंथ (Genesis 2:15) में कहा गया — ‘परमेश्वर ने मनुष्य को अदन की बाटिका में रखा कि वह उसे जोते और उसकी रक्षा करे।’ यह ‘जोतना और रक्षा करना’ पर्यावरण-प्रबंधन का स्पष्ट आदेश है। फ्रांसिस ऑफ असीसी, जिन्हें 1979 में पोप जॉन पॉल द्वितीय ने पर्यावरण संरक्षण का संरक्षक संत घोषित किया, ने ‘ब्रदर सन, सिस्टर मून’ की अवधारणा दी जिसमें सृष्टि के सभी तत्वों को ईश्वर की संतान मानकर उनसे भाई-बहन का सम्बंध जोड़ा गया।

2015 में पोप फ्रांसिस का विश्व-पत्र ‘लाउदातो सी’ (Laudato Si’) पर्यावरण पर एक कैथोलिक दस्तावेज़ है जिसने विश्व का ध्यान खींचा। इसमें पोप ने जलवायु परिवर्तन को मानव निर्मित और नैतिक संकट बताया। उन्होंने धनी देशों से पर्यावरणीय ऋण चुकाने की माँग की और कहा कि ‘पृथ्वी की दुर्दशा के लिए गरीब और हाशिए पर खड़े लोग सबसे अधिक कीमत चुका रहे हैं जबकि उन्होंने इसमें सबसे कम योगदान दिया है।’ यह पत्र 2015 के पेरिस जलवायु समझौते को धार्मिक समर्थन देने में महत्वपूर्ण रहा।

जैन धर्म : पर्यावरण-नैतिकता का शिखर

जैन धर्म, जो संभवतः विश्व का सर्वाधिक पर्यावरण-केंद्रित धर्म है, की नींव ‘अहिंसा’, ‘अपरिग्रह’ और ‘अनेकांतवाद’ पर है। जैन दर्शन में सिर्फ पशु-पक्षी ही नहीं, बल्कि वनस्पति, पृथ्वी, जल और वायु में भी जीव (प्राण) का वास माना जाता है। इसलिए जैन साधु-साध्वियाँ मुँह पर पट्टी बाँधते हैं ताकि साँस लेने से सूक्ष्म जीवों की हत्या न हो, और चलते समय जमीन देखकर चलते हैं ताकि कोई कीड़ा न कुचले। यह अहिंसा का ऐसा विस्तार है जो आधुनिक ‘एनिमल राइट्स’ और ‘बायोसेंट्रिक एथिक्स’ से भी आगे जाता है।

‘अपरिग्रह’ — अर्थात् संग्रह न करने का सिद्धांत — जैन पर्यावरण-दर्शन का आर्थिक पक्ष है। आज के उपभोक्तावाद और अति-उत्पादन की संस्कृति, जो पर्यावरण-संकट का मूल कारण है, उसका सीधा उत्तर अपरिग्रह में है। जैन समुदाय का वैश्विक जनसंख्या में अनुपात 0.37% है, किंतु पर्यावरणीय दृष्टि से वे सबसे कम कार्बन फुटप्रिंट वाले समुदायों में से हैं। गुजरात और राजस्थान में जैन समुदाय द्वारा संचालित पशु-चिकित्सालय (पिंजरापोल), जहाँ घायल और बीमार पशुओं की देखभाल होती है, जैव-विविधता संरक्षण का व्यावहारिक उदाहरण हैं।

सिख धर्म : धरती माता की सेवा

सिख धर्म में पर्यावरण-संरक्षण ‘सेवा’ (नि:स्वार्थ सेवा) और ‘किरत करो’ (परिश्रम करो) के सिद्धांतों से जुड़ा है। गुरु नानक देव जी ने कहा था — ‘पवन गुरु, पाणी पिता, माता धरत महत्त।’ अर्थात् वायु गुरु है, जल पिता है और धरती महान माता है। यह एक पंक्ति सिख पर्यावरण-दर्शन का सार है। गुरुग्रंथ साहिब में प्रकृति के प्रति श्रद्धा के अनेक संदर्भ हैं।

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का लंगर — जहाँ प्रतिदिन एक लाख से अधिक लोगों को निःशुल्क भोजन मिलता है — पर्यावरण की दृष्टि से भी उल्लेखनीय है। 2021 से स्वर्ण मंदिर के लंगर में प्लास्टिक-मुक्त व्यवस्था और जैविक खाद्य सामग्री का उपयोग बढ़ाया जा रहा है। ब्रिटेन में सिख समुदाय ने ‘EcoSikh’ आंदोलन की शुरुआत की है, जिसका लक्ष्य पाँच वर्षों में पाँच करोड़ पेड़ लगाना है। पंजाब में सिख किसानों द्वारा चलाया जा रहा ‘प्राकृतिक खेती’ अभियान रासायनिक कृषि से मुक्ति का प्रयास है।

स्वदेशी परंपराएँ और आदिवासी पर्यावरण-ज्ञान

भारत की आदिवासी परंपराओं में पर्यावरण-संरक्षण का जो ज्ञान है, वह हजारों वर्षों के अनुभव और अवलोकन पर आधारित है। झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी समुदाय अपने देवी-देवताओं को वनों, पहाड़ों और नदियों में मानते हैं। ‘सरना’ परंपरा में ‘जाहेर थान’ — पवित्र वन — की रक्षा धार्मिक कर्तव्य है। इन पवित्र वनों (sacred groves) को ‘देवी का जंगल’, ‘कावु’, ‘देवराई’, ‘जहेरबन’ आदि नामों से जाना जाता है। 2006 के एक अध्ययन के अनुसार भारत में एक लाख से अधिक पवित्र वन हैं जो कुल मिलाकर लाखों हेक्टेयर भूमि की रक्षा करते हैं।

मेघालय के खासी समुदाय के पवित्र वन ‘लाव खिन्माव’ हजारों वर्षों से संरक्षित हैं और इनमें ऐसी वनस्पति और जीव-जंतु पाए जाते हैं जो अन्यत्र दुर्लभ हैं। केरल के ‘कावु’ जंगल नारियल के बागानों के बीच हरे टापू की तरह हैं। राजस्थान के ‘ओरान’ पवित्र भूमि-खंड हैं जहाँ पेड़ काटना वर्जित है। इन पारंपरिक संरक्षण प्रणालियों की प्रभावशीलता आधुनिक विज्ञान ने भी स्वीकार की है — शोध बताते हैं कि पवित्र वनों में जैव-विविधता सामान्य वनों से अधिक होती है।

वर्तमान पर्यावरण संकट और धर्म की भूमिका

आज जब हम पर्यावरण संकट के आंकड़े देखते हैं, तो स्थिति की गंभीरता स्पष्ट होती है। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित नहीं किया गया — जो कि 2030 तक ही संभव है — तो अगले दशकों में भारी बाढ़, सूखा, समुद्र का बढ़ता जलस्तर और खाद्यान्न संकट लाखों लोगों को विस्थापित कर देगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2030 और 2050 के बीच जलवायु परिवर्तन के कारण कुपोषण, मलेरिया, डायरिया और गर्मी-जनित बीमारियों से प्रतिवर्ष लगभग 2.5 लाख अतिरिक्त मौतें होंगी।

भारत की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। NITI Aayog की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 21 प्रमुख शहर 2020 तक भूजल के संकट में आ सकते थे — दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद उनमें शामिल थे। 2019 में चेन्नई में जल-संकट का अनुभव हो चुका है। हिमालय के ग्लेशियर जो करोड़ों भारतीयों को जल देते हैं, तेज़ी से पिघल रहे हैं। Central Water Commission के अनुसार, गंगा बेसिन में 2050 तक जल की उपलब्धता 20% तक घट सकती है। ऐसे में पर्यावरण-संरक्षण केवल एक नीतिगत मुद्दा नहीं, अस्तित्व का प्रश्न है।

इस संकट के मूल में जो मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारण हैं, उनसे लड़ने में धर्म की विशेष भूमिका है। आधुनिकता ने मनुष्य को प्रकृति का स्वामी बना दिया, धर्म उसे पुनः प्रकृति का अंश और संरक्षक बनाने की क्षमता रखता है। सामाजिक-मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि धार्मिक-आध्यात्मिक प्रेरणा व्यवहार-परिवर्तन में सबसे प्रभावी होती है। एक अध्ययन (Yale Climate Communication, 2015) में पाया गया कि जो लोग प्रकृति को ‘पवित्र’ मानते हैं, वे पर्यावरण-हितैषी व्यवहार अधिक अपनाते हैं।

धर्म-आधारित पर्यावरण आंदोलन : वर्तमान प्रयास

विश्वभर में धार्मिक समुदाय पर्यावरण आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ‘Interfaith Rainforest Initiative’ जो 2017 में लॉन्च हुई, में हिंदू, बौद्ध, ईसाई, मुस्लिम, यहूदी और स्वदेशी धार्मिक नेता मिलकर वर्षावनों की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। ‘GreenFaith’ संगठन दुनिया के 40 से अधिक देशों में धार्मिक समुदायों को जलवायु कार्रवाई के लिए संगठित कर रहा है। भारत में ‘Samskar Charitable Trust’ और ‘Vanvasi Kalyan Ashram’ जैसी धार्मिक-प्रेरित संस्थाएँ वन-संरक्षण में योगदान दे रही हैं।

भारत में अनेक मंदिर और धार्मिक स्थल पर्यावरण-संरक्षण के केंद्र बन रहे हैं। तिरुपति बालाजी मंदिर, जो देश के सबसे धनी मंदिरों में एक है, ने अपने 10,000 एकड़ भूमि पर वृक्षारोपण कार्यक्रम चला रखा है। केरल के गुरुवायूर मंदिर और कर्नाटक के धर्मस्थल मंदिर ने भी पर्यावरण-कार्यक्रम अपनाए हैं। हरिद्वार और ऋषिकेश के अनेक आश्रम गंगा-सफाई अभियान में सक्रिय हैं। पर्यावरण विद् अनिल अग्रवाल और सुनीता नारायण द्वारा स्थापित Centre for Science and Environment की रिपोर्टें बताती हैं कि धार्मिक स्थलों का जलागम प्रबंधन और वृक्षारोपण स्थानीय जल-संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

2019 में केदारनाथ मंदिर के महंत और उत्तराखंड सरकार के संयुक्त प्रयास से मंदाकिनी नदी के तट पर व्यापक वृक्षारोपण हुआ। 2021 में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के पुनर्निर्माण में वायु-गुणवत्ता और हरित क्षेत्र के विस्तार पर भी ध्यान दिया गया। ये प्रयास छोटे पैमाने पर हैं, किंतु ये उस संभावना के प्रतीक हैं जो धार्मिक प्रेरणा और पर्यावरण-कार्रवाई के संयोग से उत्पन्न हो सकती है।

चुनौतियाँ और विरोधाभास

हालाँकि धर्म में पर्यावरण-संरक्षण की अपार क्षमता है, कुछ विरोधाभास भी हैं जिन पर ईमानदारी से विचार करना होगा। कुंभ मेले में करोड़ों श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाते हैं, किंतु इससे उत्पन्न कचरे और नदी-प्रदूषण की समस्या भी है। 2019 के प्रयागराज कुंभ मेले में Central Pollution Control Board के अनुसार, मेले के दौरान गंगा के कुछ हिस्सों में प्रदूषण का स्तर सामान्य से कई गुना बढ़ा। अगरबत्ती, दीपक और पूजा सामग्री से वायु-प्रदूषण, मूर्ति-विसर्जन से जल-प्रदूषण — ये वे क्षेत्र हैं जहाँ धार्मिक परंपराओं को पर्यावरण-संवेदनशीलता के साथ पुनर्परिभाषित करना होगा।

कुछ आलोचक यह भी कहते हैं कि धर्म के नाम पर जंगलों में अतिक्रमण, तीर्थ-स्थलों में अनियंत्रित निर्माण और वन्यजीव-संरक्षित क्षेत्रों में धार्मिक आयोजन पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। यह चिंता भी वाजिब है। किंतु इसका समाधान धर्म को पर्यावरण-विमर्श से बाहर करना नहीं, बल्कि धार्मिक नेतृत्व को पर्यावरण-शिक्षा से जोड़ना है। जब धार्मिक गुरु स्वयं पर्यावरण के प्रति जागरूक होंगे और अपने अनुयायियों को यह संदेश देंगे, तो परिणाम बहुत व्यापक और टिकाऊ होंगे।

धर्म और विज्ञान : एक साझा लक्ष्य

कुछ लोग यह सोच सकते हैं कि धर्म और विज्ञान दो अलग-अलग और विरोधी दुनियाएँ हैं। किंतु पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में दोनों का लक्ष्य एक है — इस पृथ्वी को आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवनयोग्य बनाए रखना। वैज्ञानिक डेटा और तकनीक बताते हैं कि क्या करना है और कैसे करना है। धर्म बताता है कि यह करने की प्रेरणा और नैतिक आधार क्या है — अर्थात् क्यों करना है। इन दोनों के संगम से ही वास्तविक और दीर्घकालिक पर्यावरण आंदोलन संभव है।

विश्व के प्रमुख वैज्ञानिकों के एक समूह ने 1992 में ‘विश्व वैज्ञानिकों की मानवता के प्रति चेतावनी’ में कहा था कि पर्यावरण संकट से निपटने के लिए ‘केवल नीति और तकनीक पर्याप्त नहीं हैं, हमें समाज के मूल्यों, सोच और व्यवहार में गहरा परिवर्तन चाहिए।’ 2017 में इस चेतावनी का अद्यतन संस्करण 15,000 से अधिक वैज्ञानिकों के हस्ताक्षर के साथ आया। यह ‘मूल्यों का परिवर्तन’ ही वह क्षेत्र है जहाँ धर्म की सबसे बड़ी भूमिका है।

अमेरिकी जीव-वैज्ञानिक E.O. विल्सन ने अपनी पुस्तक ‘The Creation’ (2006) में एक खुला पत्र एक बैप्टिस्ट पादरी को लिखा और धार्मिक एवं वैज्ञानिक समुदाय से मिलकर जैव-विविधता बचाने की अपील की। उन्होंने लिखा कि ‘हम दोनों जानते हैं कि यह पृथ्वी जीवन से भरी और अद्भुत है। हम दोनों मानते हैं कि यह संकट वास्तविक है। तो क्या हम मिलकर इसे बचाने की कोशिश नहीं कर सकते?’ यह आह्वान आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

आगे की राह : एक एकीकृत दृष्टिकोण

पर्यावरण संरक्षण के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है जिसमें धर्म, विज्ञान, नीति और समुदाय सभी मिलकर काम करें। धार्मिक शिक्षा में पर्यावरण-पाठ्यक्रम को शामिल किया जाना चाहिए। मदरसों, मंदिर-पाठशालाओं, गुरुकुलों और चर्च-स्कूलों में पर्यावरण-साक्षरता अनिवार्य हो। धार्मिक उत्सवों को पर्यावरण-अनुकूल बनाने के लिए धार्मिक नेताओं को पहल करनी होगी — जैसे ईको-फ्रेंडली गणेश मूर्तियों का चलन पहले से बढ़ रहा है, यह और व्यापक होना चाहिए। धार्मिक स्थलों को ‘ग्रीन टेम्पल’, ‘ग्रीन मस्जिद’, ‘ग्रीन चर्च’ बनाने के अभियान चलाए जाने चाहिए।

‘इंटरफेथ डायलॉग’ को पर्यावरण के इर्द-गिर्द केंद्रित किया जाए। जब हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन नेता एक मंच पर आकर पृथ्वी की रक्षा का संकल्प लें, तो यह संदेश उनके करोड़ों अनुयायियों तक तत्काल पहुँचता है। भारत में धार्मिक नेताओं के पास सबसे बड़ी ‘सॉफ्ट पावर’ है — कोई भी सरकार या कॉरपोरेट इतने बड़े और निष्ठावान समुदाय तक नहीं पहुँच सकती जितना एक धार्मिक नेता पहुँच सकता है।

पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान (Traditional Ecological Knowledge – TEK) को आधुनिक पर्यावरण-प्रबंधन में शामिल किया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र के जैव-विविधता सम्मेलन (CBD) में TEK को आधिकारिक मान्यता प्राप्त है, किंतु व्यवहार में अभी भी इसे उपेक्षित किया जाता है। आदिवासी समुदायों के पवित्र वनों, नदी-रक्षा प्रथाओं और जल-संरक्षण तकनीकों को वैज्ञानिक अनुसंधान और सरकारी नीतियों में समाहित किया जाना चाहिए।

उपसंहार : एक पुनः संकल्प

इस लेख की यात्रा वेदों के उद्घोष से शुरू हुई और आज के पर्यावरण संकट तक पहुँची। रास्ते में हमने देखा कि चाहे हिंदू धर्म हो या इस्लाम, बौद्ध धर्म हो या ईसाई, जैन हो या सिख — सभी में प्रकृति के प्रति श्रद्धा और उसके संरक्षण का आदेश मौजूद है। यह कोई संयोग नहीं। जिन समाजों ने हजारों वर्षों तक एक ही भूमि पर निवास किया और उसी से जीवन पाया, उन्होंने अनुभव से जाना कि यदि प्रकृति का दोहन होता रहा, तो वे स्वयं नष्ट हो जाएंगे। इस ज्ञान को उन्होंने धर्म का रूप दिया ताकि वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहे।

आज का मनुष्य तकनीक के मद में इतना उन्मत्त हो गया है कि उसे लगता है कि वह प्रकृति को नियंत्रित कर सकता है। किंतु COVID-19 महामारी, जो एक सूक्ष्मजीव से फैली और जिसने दुनिया की सबसे ताकतवर सभ्यताओं को घुटनों पर ला दिया, एक कटु स्मरण था कि प्रकृति के समक्ष मनुष्य कितना असहाय है। पर्यावरण संकट इससे भी बड़ा और धीमा, किंतु अधिक विनाशकारी खतरा है।

हमें उस ज्ञान की ओर लौटना होगा जो हमारे ऋषियों, पैगंबरों, बुद्धों और संतों ने हमें दिया। उस ज्ञान को आधुनिक विज्ञान की भाषा में अनूदित करना होगा और उसे नीतियों में ढालना होगा। यह काम कठिन है, किंतु असंभव नहीं। क्योंकि जब करोड़ों लोगों के भीतर यह विश्वास जागे कि पृथ्वी की रक्षा ईश्वर की आज्ञा है, तो कोई भी नीति या कानून उतना प्रभावी नहीं हो सकता जितना कि एक जागरूक, प्रेरित और नैतिक रूप से प्रतिबद्ध समाज।

अंततः, पर्यावरण संरक्षण केवल एक तकनीकी या राजनीतिक समस्या नहीं है — यह एक आध्यात्मिक और नैतिक संकट है। और इस संकट का उत्तर उसी स्थान पर है जहाँ से हमारी सभ्यता का प्रारंभ हुआ था — उस गहरी आंतरिक अनुभूति में कि हम इस पृथ्वी के स्वामी नहीं, उसकी संतान हैं। ‘माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:’ — यह केवल एक वैदिक श्लोक नहीं, यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे 21वीं सदी को फिर से जीना होगा, यदि इस पृथ्वी पर जीवन को बचाना है।

— पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

संस्थापक-निदेशक न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन’ एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन ईमेल: Founder@SrijanSansar..com मोबाइल: +91-9312053330