भारतीय ज्ञान प्रणाली के संदर्भ में भारतीय भाषाएं
शोध सारांश : भारत एक प्राचीन राष्ट्र है, जहाँ भाषाई वैविध्यता-सामाजिक संगम का अद्भुत मिश्रण है। भारत की प्राचीन परंपरा को संजोए आज विशालकाय रूप में भारतीय ज्ञान प्रणाली हमारे समक्ष खड़ी है। भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) में भारतीय भाषाएं सदियों से ज्ञान के संरक्षण, सृजन और प्रसार के वाहक रही है, जो प्राचीन ग्रंथों के जरिए दर्शन, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान, गणित, चिकित्सा, आध्यात्म, योग, संस्कृति तथा अन्य कई पहलुओं की जानकारी देती है। भारतीय ज्ञान प्रणाली में भाषा ‘ज्ञान का प्रकाश’ है, जिसके बिना किसी भी विषय का बोध असंभव है। आज भारत सरकार विभिन्न नीतियों, कार्यक्रमों और पहलों के ज़रिए भारत की भाषाई विरासत के संरक्षण और संवर्धन के लिए लगातार काम कर रही है। आज भारत सरकार भारतीय भाषाओं को ‘शास्त्रीय भाषा’ के रूप में मान्यता देने में इसलिए तत्पर है ताकि उसके प्राचीन ज्ञान, दर्शन और मूल्यों को संरक्षित और प्रसारित किया जा सके। आज भारतीय ज्ञान प्रणाली के जरिए भारतीय भाषाओं की महत्ता और उसके योगदान की चर्चा को अपने शोध पत्र के द्वारा केंद्र में लाने का मक़सद यह है ताकि उसे संरक्षित, संवर्धित किया जा सके और आगे के अध्ययन के प्रयासों में बढ़ावा मिल सके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जा सके कि समय के साथ दुनिया में उसकी प्रासंगिकता बनी रहे। आज भारत सरकार ज्ञान प्रणाली को नई शिक्षा नीति २०२० में लागू करने के उद्देश्य से अलग-अलग स्तर पर अपने तरीक़े से कार्य कर रही है।
कुंजी शब्द : भारतीय ज्ञान प्रणाली, भारतीय भाषाएँ, मातृभाषा, नई शिक्षा नीति 2020, शास्त्रीय भाषाएँ, क्षेत्रीय भाषाएँ, भाषा दर्शन, भाषाई विविधता।
भूमिका : भारत एक विविधतापूर्ण देश है, जहां अलग-अलग जातियों, धर्मों, संप्रदायों और संस्कृतियों के लोग वास करते हैं। देश भर में अलग-अलग प्रकार की भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं। भारतीय भाषाएँ क्षेत्रीय विविधताओं को प्रतिबिंबित करती हैं और इन भाषाओं के माध्यम से विभिन्न समुदायों की जीवनशैली, इतिहास, संस्कृति, परंपराएँ और मूल्य संरक्षित रहते हैं। भारतीय भाषाएँ विभिन्न जातियों और समुदायों के बीच संवाद स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम बनती हैं। ये भाषाएं भारतीय समाज की विविधता, संघर्ष, और समृद्धि को प्रतिबिंबित करती हैं। यह भाषाएं केवल हमारे ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विरासत को नहीं दर्शाती है, बल्कि समाज के विभिन्न पक्षों को उजागर करने में भी अपनी भूमिका दर्शाती है। भारत की अनेकता में एकता की अवधारणा का मुख्य आधार भाषाई विविधता है। भारतीय भाषाओं ने सदियों से भारतीय समाज की सोच को एक आकार देने का कार्य किया है। ये भाषाएं साक्षरता, विचार-क्षमता, विश्लेषण क्षमता और आलोचनात्मक दृष्टि को संपोषित करने का कार्य है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक भारतीय भाषाओं ने भारतीयता की परिभाषा को एक नया आयाम प्रदान किया है। आज आधुनिकता और वैश्वीकरण के जबरजस्त प्रभाव के चलते भारतीय भाषाओं को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यही वजह है कि आज भारतीय भाषाओं का अध्ययन-विश्लेषण, शोध-अनुसंधान तथा वैज्ञानिक नज़रिया पैदा किया जा रहा है। आज भारतीय भाषाओं का पुनरुद्धार और सुदृढ़ीकरण प्राचीन ज्ञान प्रणालियों के प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता हुआ नज़र आ रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०२० में भारतीय भाषाओं के पुनर्स्थापन पर बल दिया गया है, जिसमें मातृभाषा में मातृभाषा में शिक्षा, बहुभाषिकता, और त्रिभाषा फॉर्मूला जैसे उपायों की सिफारिश की गई है। इस नीति के द्वारा भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा की गुणवत्ता और सांस्कृतिक संरक्षण को सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त ३ अक्टूबर २०२४ तक, भारत सरकार ने कुल ११ – तमिल(2004), संस्कृत(2005), कन्नड(2008), तेलुगु (2008), मलयालम(2013), उड़िया(2014), मराठी(2024), पाली(2024), प्राकृत(2024), असमिया(2024) और बंगाली(2024) आदि भारतीय भाषाओं को ‘शास्त्रीय भाषा’ (Classical Language) का दर्जा प्रदान किया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय ज्ञान प्रणाली के जरिए भारतीय भाषाओं को संरक्षित करने में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं।
विश्लेषण : भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge System) विश्व की प्राचीनतम और समृद्ध ज्ञान परंपराओं में से एक है। भारत की ज्ञान प्रणाली ईश्वर केंद्रित नहीं अपितु मानव केंद्रित है, जो मानव जीवन की सफलता और मानव कल्याण के लिए लोगों को प्रेरित करता है। हालांकि भारतीय ज्ञान प्रणाली की जड़ें भारतीय भाषाओं में गहराई से निहित हैं। प्राचीन काल से लेकर आज़ के समय तक भारतीय भाषाओं ने ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों— दर्शन, साहित्य, कला, व्याकरण, विज्ञान, गणित, भाषा विज्ञान, खगोल विज्ञान, चिकित्सा और सामाजिक चिंतन को संरक्षित और विकसित करने में अपनी अपार क्षमता दर्शाया है। भारतीय ज्ञान प्रणाली में भारतीय भाषाओं का योगदान अत्यंत प्रगाढ़ और बहुआयामी है। भारतीय ज्ञान प्रणाली की ‘आत्मा’ ही भारतीय भाषाओं में व्याप्त है, क्योंकि ज्ञान का सृजन, संरक्षण, संप्रेषण और विकास भाषा के जरिए से ही मुमकिन होता है। आज़ हम भारतीय ज्ञान प्रणाली में भारतीय भाषाओं के महत्व बख़ूबी समझ रहे हैं यही वजह है कि उसके महत्व और उसके बहुमूल्य योगदान की चर्चा करने में अपना अहम योगदान दे रहे हैं। आज़ हम भारतीय ज्ञान प्रणाली में भारतीय भाषाओं के महत्व और उसके बहुमूल्य योगदान को इसलिए केंद्र में लाने का प्रयास कर रहे हैं ताकि भारतीय भाषाओं के जरिए ज्ञान की स्वदेशी परंपराओं को आज़ के संदर्भ में पुनर्जीवित किया जा सके।
भारतीय ज्ञान प्रणाली में भारतीय भाषाओं की विरासत
भारतीय ज्ञान प्रणाली के हज़ारों साल की पुरानी विरासत में भारतीय भाषाओं का योगदान मूलभूत, अनिवार्य और अतुलनीय रहा है। भारत में भाषाएँ सामाजिक पहचान का भी एक महत्वपूर्ण ज़रिया है। भारतीय भाषाएं भारत की समाज की सोच, परंपराओं, रीति-रिवाजों, और विश्वासों को पीढ़ी दर पीढ़ी अभिव्यक्त करने का एक ज़रिया है। अपनी अनूठी एवं प्राचीन परम्पराओं के चलते भारतीय भाषाएँ न केवल देश में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अलग छाप छोड़ने में सक्षम हुईं हैं। भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में २२ आधिकारिक भाषाएं हैं और समाज में हज़ारों बोलियां फैली हैं। भारतीय संविधान का भाग १७ और अनुच्छेद ३४३ से ३५१ मुख्य रूप से राजभाषा और अन्य भाषाओं के अधिकारों से संबंधित हैं। भारतीय भाषाओं के प्रचार समिति के अध्यक्ष पद्मश्री चमू कृष्ण शास्त्री कहते हैं कि “भारतीय भाषाओं के प्रचार समिति के अध्यक्ष पद्मश्री चमू कृष्ण शास्त्री ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा सभी भाषाओं में है। इसे देखते हुए एनईपी में संस्कृत ही नहीं कन्नड़, मलायम सहित सभी भारतीय भाषाओं को समान महत्व दिया गया है।”१ भारतीय संविधान में आधिकारिक भारतीय भाषाओं के संरक्षण और उनके प्रयोग के लिए व्यापक अधिकार दिए गए हैं। यह भाषाई विविधता ज्ञान के प्रसार को जन-जन तक पहुंचाने में सहायक होती है। प्राचीन काल में संस्कृत के साथ-साथ प्राकृत और पालि भाषाएँ भी विकसित हुईं, जिनका प्रभाव समय के साथ आधुनिक भारतीय भाषाओं पर पड़ा है। भारत में भाषाई विविधता का इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है। मध्यकालीन भारत में क्षेत्रीय बोलियों का विकास हुआ जिसने धीरे-धीरे हिन्दी, मराठी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ आदि जैसे अन्य कई आधुनिक भाषाओं का रूप धारण किया है। प्रत्येक भाषा ने अपने क्षेत्र की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक परंपराओं को गहराई से प्रतिबिंबित किया है। भाषाओं के विकास में राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आंदोलनों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत की प्राचीन भाषाओं में संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय भाषाओं में हिंदी, तमिल, बांग्ला, पंजाबी, मराठी, गुजराती, उर्दू, असमिया, कन्नड़, मलयालम, उड़िया, नेपाली, मणिपुरी, संथाली, बोडो आदि जैसी कई भारतीय भाषाएं विद्यमान हैं जो भारतीय ज्ञान प्रणाली को आगे ले जाने में अपनी बड़ी भूमिका दर्शा रहे हैं।
संस्कृत भाषा का योगदान
भारतीय ज्ञान प्रणाली में संस्कृत भाषा ‘प्राथमिक स्रोत भाषा’ है शायद इसी के चलते हम संस्कृत को अक्सर ‘ज्ञान की जननी’ भी कहते हैं। भारत के अधिकांश प्राचीन ग्रंथ संस्कृत में ही रचे गए। संस्कृत भाषा में उपलब्ध प्राचीन ग्रंथ, जैसे कि वेद, उपनिषद, और पुराण, भारतीय ज्ञान प्रणाली के मूल स्तंभ हैं। इन ग्रंथों में ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, साहित्य और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत जानकारी दी गई है। प्राचीन भारत की शिक्षा व्यवस्था में ‘गुरुकुल परंपरा’ को संस्कृत ही आगे बढ़ा रही थी। संस्कृत में ही भारतीय दर्शन और आध्यात्म की सभी प्रमुख धाराएँ विकसित हुईं हैं। संस्कृत का व्याकरण अत्यंत वैज्ञानिक और व्यवस्थित माना जाता है। पाणिनि की अष्टाध्यायी विश्व की सबसे उन्नत व्याकरणिक कृति मानी जाती है। यह भाषा विज्ञान (linguistics) के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया है। इस भाषा के ग्रंथों में ही गणित और खगोल विज्ञान का अद्भुत विकास हुआ है। भारतीय कला की शास्त्रीय परंपरा भी संस्कृत पर आधारित है। आयुर्वेदिक ज्ञान की प्रमुख भाषा संस्कृत रही है जो चिकित्सा विज्ञान को व्यवस्थित और संरक्षित करने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। संस्कृत ने भारतीय सौंदर्यशास्त्र (aesthetics) और साहित्यिक परंपरा को उच्च स्तर प्रदान किया है। संस्कृत ग्रंथों में सामाजिक जीवन के नियम और नैतिकता के कई पाठ देखने को मिल जाते हैं। संस्कृत भाषा भारतीय ज्ञान प्रणाली की ‘आत्मा’ है जो हर क्षेत्र में अपनी केंद्रीय भूमिका निभा रही है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारतीय ज्ञान प्रणाली के पुनरुत्थान में संस्कृत की संरचना उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
पाली भाषा का योगदान
पाली भाषा ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को लोकतांत्रिक, समावेशी और मानव-केंद्रित स्वरूप प्रदान किया है। पाली ने बौद्ध धर्म और दर्शन को जनमानस तक पहुँचाकर सामाजिक समानता स्थापित करने और वैश्विक स्तर पर भारतीय विचारों के प्रसार में केंद्रीय भूमिका निभाई है। यह भाषा उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें ज्ञान को सरल, सुलभ और लोकाभिमुख बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। इस प्रकार हम देखते हैं पाली भाषा ‘लोकज्ञान की भाषा’ के रूप में स्थापित हुई। पाली के अपने समृद्ध व्याकरण ग्रंथ हैं जैसे कच्चायन व्याकरण, मोग्गल्लान व्याकरण और सद्दनीति, जो भाषा की वैज्ञानिकता को दर्शाते हैं जो भारतीय भाषाओं के विकास में एक सक्रिय योगदान दिया है। पाली भाषा के माध्यम से भारतीय ज्ञान विश्व के अन्य देशों में पहुँचा है जो आज भारतीय ज्ञान प्रणाली को वैश्विक पहचान दिलाने में विशिष्ट भूमिका निभाई है। यह भाषा ने सामाजिक समानता, सामाजिक न्याय और बौद्धिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देने काफी मदद की है जिसके चलते ही आज भारतीय ज्ञान प्रणाली समावेशी की श्रेणी में खड़ा है। पाली ग्रंथों में मानव मन का गहरा विश्लेषण मिलता है जो आज के आधुनिक मनोविज्ञान के लिए अनुसंधान के सूत्र के रूप में काम कर सकता है। प्राचीन भारत के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए पाली का अध्ययन बेहद ज़रुरी है, क्योंकि इसके साहित्य में अतीत पर प्रकाश डालने वाली बहुमूल्य सामग्रियाँ हैं। कई पाली ग्रंथ अभी भी पांडुलिपियों में छिपे हुए हैं, जिनकी पहुँच मुश्किल है। श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड जैसे बौद्ध देशों और चटगाँव जैसे क्षेत्रों के साथ-साथ जापान, कोरिया, तिब्बत, चीन और मंगोलिया में भी पाली का अध्ययन जारी है, जहाँ अधिकांश बौद्ध रहते हैं। ऐतिहासिक रूप से देखें तो पाली भाषा भूमिका परिवर्तनकारी रही है जो आज भी बौद्ध अध्ययन और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रासंगिक बना हुआ है। इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय ज्ञान प्रणाली में पाली भाषा नैतिकता, मनोविज्ञान और ज्ञान के सिद्धांत से संबंधित विभिन्न विषयों पर गहराई से विचार और गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
प्राकृत भाषा का योगदान
भारतीय ज्ञान प्रणाली में प्राकृत भाषा ने भारतीय बौद्धिक परंपरा को व्यापक आधार प्रदान किया है। यह भाषा मध्यकालीन भारतीय-आर्य भाषाओं के समूह का प्रतिनिधित्व करती है। यह भाषा उन विविध परंपराओं और दर्शनों को भी समाहित करती है, जिन्होंने इस उपमहाद्वीप के ऐतिहासिक आख्यान को आकार दिया है। भाषा-व्याकरण को समृद्ध बनाने के लिए वररुचि ने ‘प्राकृतप्रकाश’ और आचार्य हेमचन्द्र ने ‘सिद्धहेमशब्दानुशासन’ लिखे थे। महात्मा बुद्ध और महावीर ने अपने उपदेशों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए प्राकृत का प्रयोग किया था। इसका प्रभाव क्षेत्रीय साहित्य में भी देखा जा सकता है, जहाँ ज्योतिष, गणित, भूविज्ञान, रसायन विज्ञान और वनस्पति विज्ञान जैसे क्षेत्रों में योगदान है। प्राकृत भारतीय भाषाविज्ञान और बोलियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और इसकी एक समृद्ध विरासत है। राष्ट्रभाषा हिंदी परंपरा प्राकृत-अपभ्रंश से विकसित हुई है। वैदिक भाषा में भी प्राकृत के महत्वपूर्ण तत्व विद्यमान हैं, जो भारत के भाषाई विकास को समझने के लिए इसके अध्ययन के महत्व को दर्शाते हैं। प्राकृत शिलालेख महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अभिलेखों के रूप में कार्य करते हैं, जो भारत के इतिहास की जानकारी देते हैं। मौर्य-पूर्व काल के शिलालेख, साथ ही सम्राट अशोक और कलिंग नरेश खारवेल के हाथीगुम्फा शिलालेख, मुख्यतः प्राकृत में लिखे गए हैं। आचार्य भरतमुनि ने अपनी मौलिक कृति ‘नाट्यशास्त्र’ में प्राकृत को बहुसंख्यक भारतीयों की भाषा माना है, जो कलात्मक अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक विविधता के लिहाज़ से काफी समृद्ध है। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राकृत भाषा ने भारतीय संस्कृति के उस ‘लोक-पक्ष’ को जीवटता प्रदान की जो जन साधारण के जीवन के अनुभवों और व्यावहारिक ज्ञान से जुड़ा हुआ था।
हिंदी भाषा का योगदान
हिंदी भाषा ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को एक व्यापक दृष्टिकोण से समृद्ध किया है। यह भाषा केवल ज्ञान का प्रसार नहीं करती है, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय पहचान का द्योतक भी है। हिंदी ने देश के विभिन्न हिस्सों को वैचारिक और आत्मीय रूप से जोड़ने का कार्य किया है। यह भारतीय ज्ञान परंपरा की ‘अखंडता’ और ‘समग्रता’ को बनाए रखने के लिए एक सशक्त माध्यम बनने का कार्य किया है। आधुनिक समय में हिंदी भाषा ज्ञान-विज्ञान, अनुवाद, आयुर्वेद, योग और तकनीकी शब्दावली के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। भारतीय ज्ञान प्रणाली विभाग और राजभाषा विभाग जैसे संस्थान पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक संदर्भों में हिंदी के जरिए ही प्रोत्साहित करने का कार्य कर रही है। अतः हम कह सकते हैं कि भारतीय ज्ञान प्रणाली में हिंदी भाषा वह ‘महानदी’ की धारा है जो प्राचीन ज्ञान के स्रोतों को आधुनिक समाज की आवश्यकताओं से जोड़ने में तत्पर दिखाई देती है।
बांग्ला (बंगाली) भाषा का योगदान
भारतीय ज्ञान प्रणाली में बांग्ला भाषा इस कदर स्थान रखती है कि प्राचीन वैदिक और बौद्ध ज्ञान को सहेजने के साथ-साथ उसे आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, शिक्षा, राष्ट्रवाद और सामाजिक न्याय को एक नया आयाम दिया है। मध्यकाल में बांग्ला साहित्य ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को ‘भक्ति मार्ग’ की नई दिशा प्रदान की है। मध्यकालीन बंगाल में ‘चैतन्य महाप्रभु’ के भक्ति आंदोलन ने ‘अचिंत्य भेदाभेद’ के दर्शन के माध्यम से भक्ति को एक शास्त्रीय आधार दिया है। कृत्तिवास ओझा (रामायण) और काशीराम दास (महाभारत) ने इन संस्कृत महाकाव्यों का बांग्ला में अनुवाद करके बंगाल की जनता तक पहुंचाने का कार्य किया है। 19वीं सदी के ‘बंगाल पुनर्जागरण’ (Bengal Renaissance) ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को आधुनिकता से जोड़ने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। ‘राजा राममोहन राय’ ने उपनिषदों का बांग्ला अनुवाद किया और भारतीय समाज सुधार के लिए ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना किया था। ‘ईश्वर चंद्र विद्यासागर’ ने शिक्षा को व्यवस्थित करने तथा ‘वर्णपरिचय’ के माध्यम से आधुनिक बांग्ला भाषा की नींव को सहारा दिया था। 19वीं सदी में ही रेवरेंड के.एम. बनर्जी ने ‘विद्याकल्पद्रुम’ नाम से बांग्ला में पहले विश्वकोष की रचना की, जिसमें विभिन्न विषयों के ज्ञान को संकलित करने का कार्य किया है। ‘जगदीश चंद्र बसु’ और ‘सत्येंद्र नाथ बसु’ जैसे वैज्ञानिकों ने बांग्ला में वैज्ञानिक लेखन कर विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। ‘रवींद्रनाथ टैगोर’ (एशिया के पहले नोबेल विजेता) और ‘बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय’ (वन्दे मातरम् के रचयिता) ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय मूल्यों और राष्ट्रीयता को वैश्विक पहचान दिलाई है। टैगोर द्वारा स्थापित ‘शांतिनिकेतन’ भारतीय शिक्षा पद्धति और कला के एक अद्वितीय केंद्र के रूप में उभरा है। बांग्ला भाषा ने रवींद्र संगीत और नजरुल गीति जैसी विशिष्ट संगीत शैलियों को जन्म दिया है, जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के रागों और लोक धुनों का अद्भुत मिश्रण है। बंगाल की कला और चित्रकला ने भी भारतीय सौंदर्यशास्त्र को पुनर्जीवित करने का कार्य किया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि बांग्ला भाषा भारतीय ज्ञान प्रणाली को जीवंत और प्रगतिशील स्वरूप प्रदान करती है।
तमिल भाषा का योगदान
तमिल को दुनिया की सबसे पुरानी जीवित शास्त्रीय भाषाओं में से एक माना जाता है। तमिल का ‘संगम साहित्य’ भारतीय ज्ञान प्रणाली में मानव जीवन और प्रकृति के संबंध को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है जो उस समय के समाज, राजनीति और नैतिकता का दर्पण है। तमिल भाषा का ‘तोल्काप्पियम’ (Tolkappiyam) केवल व्याकरण ग्रंथ नहीं है, बल्कि मनोविज्ञान, मानव व्यवहार और पारिस्थितिकी (Ecology) का गहन विश्लेषण है। इसमें ‘तिणै’ (Thinai) की अवधारणा है, जो मनुष्य और प्रकृति के बीच के संबंध को पांच भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित करती है। तमिल के संत ‘तिरुवल्लुवर’ द्वारा रचित ‘तिरुक्कुरल’ भारतीय ज्ञान प्रणाली का एक उत्कृष्ट स्तंभ है। यह ग्रंथ धर्म, अर्थ और काम पर आधारित है। यह प्रबंधन, मित्रता, राजनीति, अर्थशास्त्र, कृषि और व्यक्तिगत नैतिकता जैसे जीवन के कई पहलुओं पर मार्गदर्शन करता है जिसे ‘विश्व वेद’ (Universal Veda) कहकर भी संबोधित किया जाता है। भक्ति आंदोलन के ‘अलवारों’ (वैष्णव) और ‘नयनमारों’ (शैव) की रचनाओं ने भारतीय आध्यात्मिक चेतना को नई दिशा दी है और उनके भजनों को वेदों का सार माना जाता है। ‘तिरुमुलर’ जैसे सिद्धों ने ‘तिरुमंदिरम’ (Thirumandiram) जैसे ग्रंथों के माध्यम से योग दर्शन और ‘सिद्ध चिकित्सा पद्धति’ (Siddha medicine) का विस्तृत ज्ञान प्रदान किया है। काँचीपुरम के पास स्थित ‘उत्तरमेरुर शिलालेख’ (Uttiramerur Inscription) भारतीय ज्ञान प्रणाली में ‘लोकतंत्र’ और ‘स्वशासन’ का बेहतरीन प्रमाण है। ‘कुडावोलाई’ पद्धति के माध्यम से ग्राम परिषद के सदस्यों का चुनाव पारदर्शी तरीके से किया जाता था। इसमें 10वीं शताब्दी की चुनाव प्रक्रिया, उम्मीदवारों की योग्यता और भ्रष्ट अधिकारियों को हटाने के कड़े नियमों का उल्लेख है, जो आधुनिक लोकतंत्र की व्यवस्था को सुदृढ़ करता है। ‘चोल’, ‘चेर’, ‘पांड्य’ और ‘पल्लव’ राजाओं के अधीन तमिल वास्तुशिल्प ने जो ऊंचाइयां छुईं, वे भारतीय इंजीनियरिंग कौशल का प्रमाण हैं। दूसरी शताब्दी में कावेरी नदी पर बना यह बांध दुनिया के सबसे पुराने जल-नियमन ढांचों में से एक है, जो आज भी कार्यरत है। महाबलीपुरम के ‘रथ मंदिर’ और तंजावुर का ‘बृहदेश्वर मंदिर’ न केवल धार्मिक केंद्र थे, बल्कि खगोल विज्ञान और गणित के व्यावहारिक अनुप्रयोग के केंद्र भी थे। प्राचीन काल में तमिल भाषा दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापार और संस्कृति के आदान-प्रदान की मुख्य भाषा थी, जिसके प्रमाण इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों में मिलते हैं। तमिल संस्कृति में ‘अराम’ (Dharma), ‘पोरुल’ (Artha), ‘इनबम’ (Kama) और ‘वीडू’ (Moksha) के संतुलित विकास पर जोर दिया गया है, जो भारतीय पुरुषार्थ की अवधारणा के अनुरूप है। तमिल साहित्य के ‘शिलप्पदिकारम्’ और ‘मणिमेकलाई’ जैसे महाकाव्य के जरिए भारतीय ज्ञान प्रणाली को साहित्यिक और सौंदर्यात्मक समृद्धि मिली है। ‘भरतनाट्यम’ (शास्त्रीय नृत्य) और ‘कर्नाटक संगीत’ भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र का महत्वपूर्ण भाग रहा है। इस प्रकार हम देखते हैं कि तमिल भाषा भारतीय ज्ञान प्रणाली की वह धारा है जो प्राचीनता और आधुनिकता को जोड़ती है।
असमिया भाषा का योगदान
भारतीय ज्ञान प्रणाली में असमिया भाषा और साहित्य का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। पूर्वोत्तर भारत के ‘प्राग्ज्योतिषपुर’ (प्राचीन असम) की यह भाषा ज्ञान के साथ-साथ अध्यात्म, विज्ञान, चिकित्सा, नृत्य-कला, राजनीति और समाजशास्त्र जैसे विविध विषयों को जनसाधारण तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई है। ‘श्रीमंत शंकरदेव’ की ‘कीर्तन-घोषा’, ‘भक्ति-रत्नावली’ के माध्यम से भारतीय ज्ञान प्रणाली के आध्यात्मिक और नैतिक आयाम को एक नई दिशा दी है। अहोम राजाओं के शासनकाल में घटनाओं का तिथि-वार और वस्तुनिष्ठ विवरण लिखने की परंपरा शुरू हुई। मध्यकालीन भारत के अन्य हिस्सों में इतिहास अक्सर कविताओं और अतिशयोक्ति में लिखा जा रहा था, वहीं भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा में असमिया भाषा की ‘बुरंजी’ द्वारा यथार्थ चित्रण मिलता है जो मध्यकालीन राजनीति, कूटनीति और युद्ध कौशल के अध्ययन का प्रमुख स्रोत है। ‘सुकुमार बरकाइथ’ द्वारा रचित ‘हस्तिविद्यार्णव’ (Hasti-Vidyarnava) ग्रंथ हाथियों के प्रकार, उनके रोगों और उपचार का एक सचित्र वैज्ञानिक विश्वकोश है। यह प्राचीन भारतीय पशु-चिकित्सा विज्ञान का उत्कृष्ट उदाहरण है। असम के जनजातीय और ग्रामीण समुदायों के पास जड़ी-बूटियों का जो ज्ञान था, उसे असमिया ‘बेज-मुष्टि’ (वैद्यों के नुस्खे) के रूप में संकलित किया गया है। यह ‘आयुर्वेद’ की एक स्थानीय और समृद्ध शाखा के रूप में भारतीय ज्ञान प्रणाली को मज़बूती प्रदान करता है। ‘सत्रों’ (मठों) की स्थापना की में असमिया भाषा ने बड़ी भूमिका निभाई है, जो आज भी संगीत, नृत्य (सत्रीय नृत्य) और नाटक (अंकिया नाट) के माध्यम से भारतीय ज्ञान प्रणाली को जीवंत बनाने में योगदान दे रही है।
निष्कर्ष: भारतीय भाषाओं ने आधुनिक ज्ञान और विज्ञान को भी बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज संविधान में भारतीय भाषाओं को संरक्षण का दर्जा देने के साथ-साथ भारतीय भाषाओं को आधिकारिक मान्यता प्रदान की गई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०२० में उल्लिखित शैक्षिक ढांचे में भारतीय भाषाओं की मान्यता और संवर्धन न केवल सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करता है, बल्कि भारत में अधिक समावेशी, अभिनव और जुड़े हुए शैक्षिक परिदृश्य का मार्ग भी प्रशस्त करता है। राष्ट्रीय भाषा नीति, नई शिक्षा नीति २०२० एवं भाषा संवर्धन के कार्यक्रम इन प्रयासों में शामिल हैं। विश्वविद्यालयों और भाषा संस्थानों में भारतीय भाषाओं के पाठ्यक्रम एवं अनुसंधान परियोजनाएँ चलाई जा रही हैं। इनसे नई पीढ़ी में भाषा के प्रति जागरूकता एवं संवेदना बढ़ रही है। डिजिटल मीडिया, मोबाइल एप्स, ऑनलाइन पुस्तकालय एवं ई-पुस्तक परियोजनाओं ने भारतीय भाषाओं के साहित्य को व्यापक दर्शकों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साहित्य सम्मेलन, पुस्तक मेलों, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय भाषाओं का प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण सुनिश्चित किया जा रहा है। अतः हम कह सकते हैं कि भारतीय ज्ञान प्रणाली के माध्यम से भारतीय भाषाएँ निश्चय ही भविष्य में अपनी समृद्धि एवं जीवंतता को क़ायम करने में सक्षम होगी।
संदर्भ सूची :
- https://www.jagran.com/uttar-pradesh/varanasi-city-source-of-knowledge-lies-in-indian-languages-discussions-in-all-india-national-education-conference-in-varanasi-22874809.html
— आनंद दास
