पुस्तक समीक्षा

उपन्यास ‘निज़ाम’ की समीक्षा

प्रस्तावना: हिंदी साहित्य में दलित साहित्य का उद्भव सामाजिक न्याय और समानता की आकांक्षा से जुड़ा हुआ है। यह साहित्य उन वर्गों की आवाज़ है जिन्हें सदियों तक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से हाशिए पर रखा गया। हिंदी दलित साहित्य ने भारतीय समाज की उस सच्चाई को शब्द दिए हैं, जिसे मुख्यधारा के साहित्य में लंबे समय तक उपेक्षित रखा गया। यह साहित्य यथार्थ के धरातल पर खड़ा होकर कल्पना के बनावटी आवरणों के स्थान पर समाज की कड़वी सच्चाइयों को प्राथमिकता दी है। इस साहित्य में कविता, कहानी, नाटक, आत्मकथा आदि जैसे विधाओं की तुलना में उपन्यास का कैनवास काफी विस्तृत है। हिंदी दलित साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों में से एक मोहनदास नैमिशराय का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। प्रकाशित मुख्य कृतियों में सफदर एक बयान (कविता-संग्रह) 1980, अदालतनामा (नाटक) 1989, क्या मुझे खरीदोगे (प्रथम उपन्यास) 1990, दलित उत्पीड़न विशेषांक 1990, भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर 1990, हिंदुत्व का दर्शन (डॉ. अंबेडकर द्वारा लिखित Philosophy of Hinduism का अनुवाद) 1991, आत्मदाह संस्कृति उद्भव और विकास 1991, अपने-अपने पिंजरे (आत्मकथा, पहला भाग) 1995, विरोधियों के चक्रव्यूह में डॉ. अंबेडकर 1997, डॉ. अंबेडकर और कश्मीर समस्या (मराठी से हिन्दी अनुवाद) 1997, उजाले की ओर बढ़ते कदम (मानसिक वधिता पर शोध पुस्तक) 1998. आवाजें (प्रथम कहानी-संग्रह) 1998, मुक्ति पर्व (उपन्यास) 1999, स्वतंत्रता संग्राम के दलित क्रांतिकारी 1999, आग और आंदोलन (कविता-संग्रह) 2000, हैलो कामरेड (नाटक) 2001, अपने-अपने पिंजरे (दूसरा भाग) 2001, भारत के अग्रणी समाज सुधारक (The Pioneering Social Reformers of India का अनुवाद) 2002, झलकारी बाई (उपन्यास) 2003, Caste and Race Comparative Study of Dr. B.R. Ambedkar and Martin Luther King 2003, जाति और नस्ल के संदर्भ में डॉ. अंबेडकर और मार्टिन लूथर किंग 2005, हमारा जवाब (दूसरा कहानी-संग्रह) 2005, आज बाजार बंद है (उपन्यास) 2004, बहुजन नायक कांशीराम 2008, 1857 की क्रांति में दलितों का योगदान 2009, Dalit Freedom Fighters 2009, हिंदी दलित साहित्य 2011, जख्म हमारे (उपन्यास) 2011, महानायक बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर (उपन्यास) 2012, भारतीय दलित आंदोलन का इतिहास (चार भागों में) 2012, दलित कहानियां (कहानी संग्रह) 2015, Dr. Ambedkar and Press, रंग कितने मेरे संग (आत्मकथा का तीसरा भाग), खिड़की (कहानी संग्रह) 2021, एक सौ दलित आत्मकथाएं इतिहास एवं विश्लेषण 2021, लगभग अस्सी से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। उन्हें डॉ. अंबेडकर स्मृति पुरस्कार 1993, डॉ. अंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार 1998, भारतीय दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, वाणिज्य हिंदी ग्रंथ पुरस्कार (आम आदमी की आय एक वाणिज्यिक सर्वेक्षण) 1995-96, वाणिज्य मंत्रालय, नई दिल्ली, डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल मिशन पुरस्कार कनाडा, गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार, के.हि.सं., आगरा 2006. बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर राष्ट्रीय सामाजिक विज्ञान संस्थान, महू (म.प्र.) 2010, उ.प्र. हिंदी संस्थान, लखनऊ से साहित्य भूषण जैसे सम्मानों से सुशोभित किया गया है। वर्तमान समय में नैमिशराय जी हिंदी मासिक ‘बयान’ पत्रिका का संपादन एवं स्वतंत्र लेखन का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से दलित समाज के जीवन-संघर्ष, सामाजिक विषमताओं, जातिगत उत्पीड़न और मानवीय गरिमा की लड़ाई को स्वर दिया है। मोहनदास नैमिशराय ने विभिन्न उपन्यासों के चरित्रों के जरिए सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक घटनाओं के उतार-चढ़ाव को बड़ी सूक्ष्मता के साथ जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया है। आज मोहनदास नैमिशराय जैसे व्यक्तित्व ने दलित साहित्य को समृद्ध बनाने के लिए एक और नया उपन्यास ‘निज़ाम’ नाम से दिया है। आज़ ‘निजाम’ हिंदी दलित साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण कृति बनकर उभर रही है, जो समाज के वंचित वर्गों के जीवन-संघर्ष को साहित्यिक संवेदना-आवेग के साथ प्रस्तुत किया है। यह उपन्यास केवल साहित्यिक पाठ नहीं होकर सामाजिक दस्तावेज बन गया है।
पुस्तक का विवरण और आवरण: मोहनदास नैमिशराय की ‘निज़ाम’ उपन्यास अमन प्रकाशन, कानपुर द्वारा प्रथम संस्करण 2025 में प्रकाशित किया गया है, जिसका I.S.B.N. : 978-93-48352-55-2 है, जिसका मूल्य 375 रु. रखा गया है। लेखक ने इस उपन्यास को 144 पृष्ठ के अंदर समेटने का प्रयास किया है। मोहनदास नैमिशराय की यह पुस्तक अन्य दूसरे उपन्यासों के आवरण–पृष्ठ सज्जा से भिन्न है। आवरण और पृष्ठ सज्जा ‘निज़ाम’ उपन्यास के कथावस्तु के अनुरूप किया गया है। इस उपन्यास का आवरण इसकी कथा–व्यथा को बतलाता है। इसके आवरण में जेल की छाई-सफ़ेद रंग की सलाखें हैं, उन सलाखों को लाल रंग के हाथ से पकड़ा है, उसके बैक्ग्राउण्ड में काले रंग का सिर है, उस सिर के अंदर सफ़ेद रंग का छोटा सा व्यक्ति दौड़ रहा है। यानि शासक वर्ग जेल की सलाखों में पड़े लोगों को अपने ‘निज़ाम’ से जकड़ा हुआ है, जिसे जेल में पड़े कैदी उससे मुक्त होना चाहता है या पीछा छुड़ाकर भागना चाहता है। इस प्रकार का आवरण प्रस्तुत करके न्याय तो किया ही है; साथ ही पुस्तक पढ़ने से पहले पाठक वर्ग को संदेश देने का कार्य भी किया है। यह पुस्तक खोलने के बाद अंदर की तरफ गत्ते के ऊपर कवर पर भूमिका के मुख्य कथनों को दर्शाया गया है। पुस्तक के पीछे वाले कवर पर लेखक का परिचय और उनकी कृतियों के बारे में बताया गया है।
पुस्तक लिखने की प्रेरणा और उद्देश्य: सृजन कला नवाचार को दर्शाता है। ऐसे में उपन्यास प्रभावपूर्ण तरीक़े से लिखना कोई मामूली बात नहीं है। मोहनदास नैमिशराय एक सक्षम लेखक हैं जो इन सब भूमिकाओं बख़ूबी निभा सकते हैं। वह पुस्तक की भूमिका में बताते हैं कि 2019 में अजय नावरिया हंस पत्रिका में कहानी छापने के लिए उनसे मांगे थे। इस प्रसंग वह अपनी भूमिका में लिखते हैं- “खैर मैंने जो थोड़ा बहुत काम जेल से सम्बन्धित विषय पर किया था, उसी आधार पर लिखना शुरू कर दिया। लगभग एक माह बाद वह कहानी पूरी कर चुका था। टाइटल दिया ‘निज़ाम’ शुक्र है कि अतिथि संपादक के साथ अन्य साथियों को भी मेरी यह कहानी पसंद आई। कहानी छप जाने के बाद दस-बारह साथियों के फोन आए। बाद में अमन प्रकाशन से भी इस कहानी को उपन्यास के रूप में विस्तार देने की बात हुई। यही नहीं उन्होंने कुछ धनराशि एडवांस में भी दे दी। अब मैंने गंभीरता से लिखना शुरू किया।”1 इस प्रकार उन्हें उपन्यास लिखने की प्रेरणा मिलती है। वह उपन्यास कोई मनोरंजन के लिए या रस निष्पत्ति के लिए नहीं लिखते हैं बल्कि समाज के उस सच को बाहर निकालना चाहते हैं जिसे पहले दलित उपन्यासों ने छुआ नहीं था। वह लिखते हैं कि “जेल जीवन सचमुच यातना घर होते हैं। पर अगर सदियों से चले आ रहे निज़ाम को बदल दिया जाए तो वे ही यातना के घर सुधार गृह बन सकते हैं। जहाँ रहते हुए किसी भी व्यक्ति में अच्छी बातें जुड़ सकती हैं। वह न सिर्फ अपने जीवन को बदल सकता है बल्कि दूसरों के लिए भी बहुत कुछ कर सकता है। यही ‘निज़ाम’ नाम से इस उपन्यास का संदेश है। उसी उद्देय की पूर्ति के लिए मैंने भरसक प्रयास किया है।”2 वह पुस्तक की भूमिका में बहुत सारी ऐसी बता जाते हैं जिनमें यह पुस्तक लिखने का उद्देश्य भी निहित है।
‘निज़ाम’ शीर्षक की सार्थकता: ‘निज़ाम’ शब्द का अर्थ है — व्यवस्था, शासन या सिस्टम। यह शीर्षक बहुस्तरीय अर्थ लिए हुए है। अरबी में ‘निज़ाम’ (Nizam) का अर्थ ‘व्यवस्था’ या ‘क्रम’ (Order) से भी होता है। इसी से ‘निजाम-ए-हुकूमत’ (शासन की व्यवस्था) शब्द बना है। यह एक अरबी शब्द है जिसका उपयोग भारत में मुगल और अन्य मुस्लिम शासकों के लिए किया जाता था। भारत में, निजाम शब्द का उपयोग विशेष रूप से हैदराबाद के शासकों के लिए किया जाता था, जो निजाम-उल-मुल्क के नाम से जाने जाते थे। इस विषय में थोड़ा और गहराई से देखें तो यह शब्द सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक भारी-भरकम पदवी थी। वह ‘निज़ाम’ शब्द का प्रयोग उपन्यास के संदर्भ में करते हुए लिखते हैं – “मेरे ‘निज़ाम’ नाम से उपन्यास के अधिकांश पात्र दलित और पिछड़े समाज से हैं। जिन्हें तोड़ने का प्रयास किया जाता रहा है असली जीवन में भी।”3 ठीक इसी प्रकार जेल के प्रसंग में कहते हैं – “जेल तो जेल थी और जेल का मालिक जेलर था। जिसका अपना निजाम था। उसी निजाम के तहत न जाने कितने टूटे होंगे, बिखरे होंगे। कुछ को जिन्दगी भी खोनी पड़ी होगी।”4 लेखक ने बड़े ही तीखे अंदाज में सवाल उठाया है कि क्या लोकतंत्र वास्तव में हाशिए पर खड़े व्यक्ति के लिए अपना ‘निज़ाम’ बन पाया है? इस प्रकार हम देखते हैं कि उपन्यास का शीर्षक ‘निज़ाम’ अपने आप में एक बड़ा प्रतीक है जो उस व्यवस्था को दर्शाता है जो सदियों से बदला नहीं है। भले ही चेहरे बदल गए हों, लेकिन दलितों के प्रति व्यवस्था का क्रूर और उपेक्षापूर्ण नजरिया वैसा ही बना हुआ है।
पात्रों की चर्चा: प्रस्तुत उपन्यास में पात्रों का चरित्र बहुआयामी दिखता है। पात्रों की संघर्षशीलता, संवेदनशीलता और आत्मसम्मान बोध उसे जीवंतता प्रदान करती है। उपन्यास के पात्र काल्पनिक होते हुए भी बेहद यथार्थवादी लगते हैं जो समाज की विभिन्न मानसिकताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसमें पात्र न तो पूर्णतः आदर्शवादी है और न ही निराशावादी; बल्कि परिस्थितियों के अनुरूप जूझता हुआ एक सामान्य मनुष्य है, जिससे कथा विश्वसनीय बनता है। पात्र परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय प्रतिरोध का मार्ग अपनाता है, प्रश्न खड़े करता है और चुनौती देता है। ‘निज़ाम’ उपन्यास में प्रभात कुमार, ज्योति, माँ, जेलर (सी.एल. दुबे), इंस्पेक्टर, वार्डन, हवलदार, ममदू डोम, मंगतू, रहमत चाचा, बुलाकी राम, लाजवंती, इतवारी, सुमेर, अब्दुल, खालिक, सुक्खा, हीरा, वीरा, चमरू, सुरजा, बुद्ध, किसना, चतरू, हरू, बिल्ला, पलटू, झम्मन, भरतू, खैराती, भोला, चोखा, गंगरू, जुम्मन, हजारी, मंगत, झांगी, राशन, रजक, उज्जड़ सिंह, विधायक रामकृपाल मौर्य, चंचल पांडे रिपोर्टर, संगीता कपूर रिपोर्टर, बलराम यादव, दिनू, बिरमो, अख्तरी, लक्ष्मी, तपन, गौतम, बनर्जी, कमली, कुमार स्वामी, राकेश कुमार मौर्य, रामकुमार, हीरा लाल, रानी, सुलेमान, आदि जैसे पात्रों ने इस उपन्यास को पूरा करने में विशेष सहयोग दिया है। हर पात्र अपने हिसाब से अपने रंग में दिखाई देता है जो पाठकों को कथा के करीब ले जाने में अहम भूमिका निभाता है। पात्र अपने अनुभवों से सीखता है और व्यवस्था की जकड़न को समझने लगता है।
कथावस्तु: मोहनदास नैमिशराय की ‘निज़ाम’ उपन्यास दलित चेतना और यथार्थवादी चित्रण का एक सशक्त माध्यम है। यह उपन्यास भारतीय न्याय व्यवस्था, जेल प्रशासन और समाज में व्याप्त जातिवाद की जड़ों पर गहरा प्रहार करता है। उपन्यास का कथानक बुरहानपुर के पास स्थित जेल से शुरू होती है। उपन्यासकार के शब्दों में – “बुरहानपुर रेलवे स्टेशन से पूर्व की ओर चलें तो शहर की बसापत से दूर लगभग दस मील चलने पर पुरानी जेल थी। जिसे 1857 की क्रांति से पहले अंग्रेजों ने बनाया था। एक तरफ नदी, दूसरी ओर दलदल में परिवर्तित हो चुकी जमीन, तीसरी दिशा में घना जंगल।”5 वह ऐसे परिवेश में स्थित रहता है कि कभी–कभी क़ैदी ख़ुद भी डर जाते हैं। नैमिशराय ने मुख्य रूप से जेल की चारदीवारी के भीतर के शोषण को उजागर किया है। उपन्यास के जरिए यह स्पष्ट करते हैं कि जेल जैसी जगह ‘सुधार गृह’ बनने की बजाय दलितों और पिछड़ों के लिए ‘यातना गृह’ बनी हुई है।
जातिवाद से जुड़ी कई घटनाएँ थी जो इस उपन्यास का केंद्र बिन्दु है। प्रभात जेल में रहने के दौरान ज्योति जब जेल में मिलने आती है तब प्रभात कहता है ज्योति से “जेल में भी जातिवाद होता है। मैं अगर जेल नहीं आता तो कैसे पता चलता?”6 जेलर सी.एल.दुबे का जातिवादी व्यवहार, ममदू डोम को न छूने की वजह से डॉक्टर द्वारा ना इलाज़ करने की घटना, ममदू पढ़ा लिखा होने के बावजूद पाखाना साफ कराने की घटना, अपनी माँ से मिलने जाने के लिए जेल से भागने की कोशिश पर रजक की मौत, उज्जड़ सिंह की जातिवादी धौंस, चंचल पांडे का वह पुछे जाने वाले प्रश्न, जुम्मन, हजारी, मंगत के साथ अन्याय होने वाली घटनाएं, बिरमो, अख्तरी और लक्ष्मी की दिल को छू लेने वाली घटनाएं, रानी और सुलेमान की हृदयस्पर्शी घटना, बिना क़सूर के बहुजन समाज के लोगों को जेल में डाल देने वाली घटनाएं, प्रभात का महानिदेशक बनने का प्रसंग, दलितों के साथ नेताओं के व्यवहार जैसी कई मार्मिक घटनाएँ हैं जो हमें इंसानियत के प्रश्न पर सोचने के लिए बाध्य करती है।
जेल में विषम परिस्थिति होने के बावजूद प्रभात जैसे पात्र पूरे बहुजन समाज के लिए एक आशा की किरण बनकर सामने आता है। निज़ाम उपन्यास इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह आशा न सिर्फ़ किरण है बल्कि पूरे बहुजन समाज के लिए प्रेरणा का स्त्रोत भी है। उपन्यास में कुछ इस प्रकार का दृश्य देखने को मिलता है -“अरे भई, हमें तो फक्र होगा ही। आखिर आप बहुजन कुनबे से हो ना अब दलित अकेला नहीं है। अलग-अलग जातियां मिल कर बहुजन समाज बन गई हैं।”7 इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रभात कुमार जो देश की स्थिति पर आत्ममंथन करता है और यह सवाल उठाता है कि क्या देश में ऐसी कोई जगह है जहाँ दलितों के साथ अन्याय न होता हो? प्रभात कुमार अपने कठोर परिश्रम के जरिए समाज को बदलने का अथक प्रयास करता है साथ ही सदियों से चली आ रही निज़ाम को भी तोड़ता है। यह उपन्यास सत्ता के गलियारों में होने वाली साजिशों और उसके निचले तबके पर पड़ने वाले प्रभावों का सजीव चित्रण है।
भाषा और शैली: मोहनदास नैमिशराय ने ‘निज़ाम’ उपन्यास में सरल, संप्रेषणीय, संवादधर्मी, प्रवाहमयी और मर्मभेदी भाषा प्रयुक्त किया है। इस उपन्यास में गाली गलौज़ या अपशब्द का व्यवहार कहीं नहीं हुआ है। यह उपन्यास यह उदाहरण पेश करने में सक्षम हुआ है कि दलित साहित्य की रचना केवल गाली साहित्य नहीं है। लेखक ने बनावटी-आडंबरपूर्ण भाषा का प्रयोग नहीं किया है। यह उपन्यास पढ़ते वक़्त जहज महसूस होता है। किसी घटना या पात्र को समझने के लिए शब्दों को बार-बार नहीं पढ़ना पड़ता है। यह उपन्यास पढ़ते वक़्त भाषा और वाक्य सरल और सीधा महसूस होता है। पात्रों के सामाजिक पृष्ठभूमि के अनुरूप संवाद स्वाभाविक नज़र आता है। एक ओर भाषा में लोक-जीवन का गंध है तो वहीं दूसरी ओर सामाजिक व्यंग्य भी है, जो व्यवस्था की विसंगतियों को उजागर करता है। स्थानीय बोलचाल, मुहावरों, आंचलिक, अंग्रेजी, उर्दू, भोजपुरी, मराठी शब्दों और वास्तविक संदर्भों में प्रयोग कर उपन्यास को जीवंत बनाया है। पुरानी कहावत का प्रयोग कुछ इस प्रकार करते हैं-
“खुदी को कर
बुलंद इतना
कि एक दिन ख़ुदा भी पूछे
बंदे तेरी रज़ा क्या है?”8
नैमिशराय जी शेरों-शायरी का प्रयोग कर इस उपन्यास को भाषिक दृष्टि भी जान डाल देते हैं। मोहनदास नैमिशराय की भाषा बिना लाग-लपेट के सीधी और मारक है, जो पाठकों को पात्रों के दर्द से सीधे जोड़ती है। लेखक ने अपनी शैली में आक्रोश और संवेदना के सामंजस्य को दर्शाया है। उनकी शैली वर्णनात्मक होने के साथ-साथ विश्लेषणात्मक भी है। वे केवल घटनाओं का चित्रण नहीं करते, बल्कि उनके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आयामों को भी उजागर करते हैं। उपन्यास में ‘निज़ाम’ स्वयं एक बड़ा प्रतीक है। इसके अतिरिक्त कई प्रसंग ऐसे हैं जो व्यवस्था की कठोरता और दलित जीवन की विडंबनाओं को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं। उपन्यास में कई बिंब सामाजिक असमानता और अवसरों की कमी को दर्शाते हैं। वहीं शिक्षा और जागरूकता आशा के प्रतीक के रूप में सामने आता है।
निष्कर्ष: हिंदी दलित उपन्यास की परंपरा में ‘निज़ाम’ एक महत्वपूर्ण कड़ी है। ‘निज़ाम’ हिंदी उपन्यास विधा में एक मील का पत्थर है क्योंकि यह सिर्फ दुख-दर्द का रोना नहीं रोता है, बल्कि प्रतिरोध की भाषा बोलता है। यह उपन्यास असमानता और मानवीय गरिमा की गाथा है। यह उस क्रूर प्रशासनिक तंत्र का पर्दाफाश किया है जो जाति के आधार पर न्याय का निर्धारण करता है। मोहनदास नैमिशराय ने अत्यंत निर्भीकता के साथ दलितों की दयनीय और अपमानित स्थिति को उजागर करते हुए उनके आन्दोलनात्मक रुख को स्वर दिया है। यह कृति पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वास्तव में कानून के सामने सब बराबर हैं? नैमिशराय ने इस कृति के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि आज़ाद भारत में भी ‘निज़ाम’ या ‘व्यवस्था का ढांचा’ बदला नहीं है। अतः यह कृति सामाजिक व्यवस्था पर कड़ा प्रहार है और अस्मिता की तलाश को दर्शाता है।
संदर्भ सूची

  1. नैमिशराय मोहनदास, निज़ाम, अमन प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2025, कानपुर,
    पृष्ठ संख्या-8.
  2. वही, पृष्ठ संख्या-9.
  3. वही, पृष्ठ संख्या-9.
  4. वही, पृष्ठ संख्या-63.
  5. वही, पृष्ठ संख्या-11.
  6. वही, पृष्ठ संख्या-31.
  7. वही, पृष्ठ संख्या-139.
  8. वही, पृष्ठ संख्या-137.

— आनन्द दास

आनन्द दास

आनन्द दास भारत के मूलत: हिन्दी भाषी प्रदेश से हैं पर उनका जन्म कोलकाता में हुआ। उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा राष्ट्रभाषा विद्यालय, सर्वोदय विद्यालय तथा एस. बी. मॉडर्न हाई स्कूल से प्राप्त की हैं। उन्होंने कोलकाता के ऐतिहासिक और विश्व विख्यात प्रेसिडेंसी कॉलेज (प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय) से हिन्दी में स्नातक की हैं। उन्होंने हिन्दी में स्नातकोत्तर कलकत्ता विश्वविद्यालय से तथा शिक्षाशास्त्र में स्नातकोत्तर सी.डी.एल.यू.,सिरसा से की हैं। इसके अलावा यू.जी.सी. नेट(हिंदी) और स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद) इग्नू से की हैं। कोलकाता के ए.जे.सी. बोस कॉलेज (बी.एड. विभाग) में अतिथि प्रवक्ता के तौर पर कार्य कर चुके हैं। पश्चिमबंग प्राथमिक शिक्षा पर्षद द्वारा संचालित प्रशिक्षण (प्राथमिक कार्यरत शिक्षकों के लिए) कार्यक्रम में बतौर प्रशिक्षक भी कार्य कर चुके हैं। आनन्द दास की हिन्दी में 15 से अधिक संपादित पुस्तकों में शोध लेख प्रकाशित हैं साथ ही हिन्दी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आनन्द दास की रचनाएं निरन्तर प्रकाशित होती रहती हैं। वर्तमान में श्री रामकृष्ण बी. टी. कॉलेज (Govt. Aided B.Ed. College), दार्जिलिंग में सहायक प्राध्यापक हैं तथा रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय में शोधरत (पी.एच.डी.) हैं। संपर्क - श्री रामकृष्ण बी. टी. कॉलेज, दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल सरकार के अंतर्गत), 27 गांधी रोड, बागमारी हाउस, दार्जिलिंग - 734101, पश्चिम बंगाल, भारत, संपर्क - 9804551685, anandpcdas@gmail.com

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