राजनीति

कंकाल से उपजते व्यवस्था पर सवाल

ओडिशा के क्योंझर जिले से आई कंकाल ढोने की खबर ने देश की सामूहिक चेतना को इस कदर झकझोर दिया कि उसने आधुनिक भारत के विकास और डिजिटल साक्षरता के दावों पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। यह घटना केवल एक व्यक्ति के निजी दुख या उसकी अज्ञानता की कहानी नहीं है बल्कि यह उस अमानवीय स्थिति का जीवंत चित्रण है जहाँ एक निर्धन और असहाय नागरिक को अपनी मृत बहन के कंकाल को लेकर बैंक की दहलीज तक जाना पड़ा। 19402 रुपये की एक ऐसी राशि जो किसी संपन्न व्यक्ति के लिए बहुत मामूली हो सकती है पर एक गरीब के लिए वह उसके जीवन भर की संचित पूंजी थी। इस छोटी सी राशि को प्राप्त करने के लिए एक भाई का यह भयावह कदम समाज की संवेदनहीनता और हमारे प्रशासनिक ढांचे की चरम विफलता का एक ऐसा प्रमाण है जिसे इतिहास कभी भुला नहीं पाएगा। यह घटना स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि जब सरकारी नियम और कानून मानवीय संवेदनाओं से ऊपर हो जाते हैं तो व्यवस्था किस प्रकार एक नागरिक को अपमानित और लाचार बना देती है। बहन की मृत्यु के लगभग 2 महीने बीत जाने के बाद भी जब वह व्यक्ति अपनी छोटी सी जमा राशि को प्राप्त करने के लिए दर-दर भटकता रहा तो उसकी गहरी हताशा ने उसे इस मार्ग को चुनने पर विवश कर दिया। वह व्यक्ति लगभग 3 किलोमीटर की लंबी दूरी तय करते हुए उस कंकाल को कंधे पर लादकर बैंक तक पहुंचा ताकि वह वहां बैठे अधिकारियों को यह अंतिम और अकाट्य प्रमाण दे सके कि उसकी बहन अब वास्तव में इस दुनिया में नहीं है। इस दृश्य ने न केवल वहां उपस्थित लोगों को स्तब्ध कर दिया बल्कि इसने पूरे देश के प्रशासनिक और बैंकिंग तंत्र की खामियों को भी सार्वजनिक रूप से नग्न कर दिया।

इस घटना की पृष्ठभूमि में यदि हम गहराई से उतरें तो यह स्पष्ट होता है कि भारत में एक मृत्यु प्रमाण पत्र केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं है बल्कि यह एक ऐसा कानूनी दस्तावेज है जिसके बिना व्यक्ति का अस्तित्व समाप्त होने के बाद भी उसकी संपत्तियां और अधिकार एक कानूनी जाल में फंसे रहते हैं। भारत के नियमों के अनुसार किसी भी व्यक्ति की मृत्यु का पंजीकरण 21 दिनों के भीतर कराना अनिवार्य होता है। यह अवधि बीत जाने के बाद प्रक्रिया और भी जटिल हो जाती है जिसमें शपथ पत्र और विभिन्न स्तरों पर सत्यापन की आवश्यकता होती है। क्योंझर के उस आदिवासी व्यक्ति के पास न तो शिक्षा थी और न ही उसे इन जटिल कानूनी प्रक्रियाओं का कोई ज्ञान था। उसके लिए उसकी बहन की मृत्यु एक अपूरणीय क्षति थी लेकिन व्यवस्था के लिए वह केवल एक आंकड़ा भर थी जिसके लिए दस्तावेजों की पूर्ति अनिवार्य थी। जब वह व्यक्ति पहली बार बैंक गया होगा तो शायद उसे नियमों का हवाला देकर लौटा दिया गया होगा। उसके पास मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं था और न ही वह कानूनी उत्तराधिकारी होने का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत कर पा रहा था। यहाँ बैंकिंग प्रणाली की सुरक्षा और पारदर्शिता के तर्क तो सही हो सकते हैं लेकिन जिस संवेदनशीलता के साथ ऐसे मामलों का निपटारा किया जाना चाहिए था उसका वहां पूर्ण अभाव दिखा। बैंक अधिकारियों का यह कहना कि उन्होंने केवल कानूनी दस्तावेजों की मांग की थी और कभी भी मृत शरीर की उपस्थिति नहीं मांगी थी तकनीकी रूप से सही हो सकता है लेकिन एक अशिक्षित व्यक्ति की दृष्टि से यह उसकी असफलता और निराशा का अंत था।

यह त्रासदी तीन मुख्य स्तरों पर हुई विफलता का परिणाम है। पहला स्तर प्रशासनिक है जहाँ स्थानीय प्रशासन और पंचायत स्तर पर उस व्यक्ति को कोई सहयोग प्राप्त नहीं हुआ। यदि स्थानीय प्रशासन ने समय पर मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने में उसकी सहायता की होती या उसे सही दिशा दिखाई होती तो शायद उसे इस अपमानजनक स्थिति से नहीं गुजरना पड़ता। दूसरा स्तर जागरूकता की कमी है जो हमारे देश के सुदूर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। सरकारें भले ही डिजिटल इंडिया का नारा देती हों लेकिन धरातल पर आज भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसे यह नहीं पता कि एक सामान्य प्रमाण पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया क्या है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण स्तर संस्थागत संवेदनशीलता का है। बैंक जैसे वित्तीय संस्थानों में नियम अत्यंत कठोर होते हैं क्योंकि वहां धन की सुरक्षा का प्रश्न होता है। लेकिन क्या नियमों की इस कठोरता में मानवीय विवेक के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए? जब एक व्यक्ति बार-बार आकर अपनी विवशता बता रहा था तो क्या बैंक प्रबंधक या स्थानीय अधिकारी किसी वैकल्पिक सत्यापन की प्रक्रिया को नहीं अपना सकते थे?

इस पूरी घटना का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि जिस प्रशासनिक तंत्र ने उस व्यक्ति को महीनों तक चक्कर कटवाए उसी तंत्र ने इस घटना के तूल पकड़ते ही मात्र कुछ घंटों के भीतर सारे दस्तावेज तैयार कर दिए। जैसे ही यह मामला समाचारों की सुर्खियों में आया और उच्च अधिकारियों तक पहुंचा तो उसी दिन मृत्यु प्रमाण पत्र और कानूनी उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र जारी कर दिए गए। यहाँ तक कि बैंक ने भी तुरंत 19402 रुपये की राशि संबंधित वारिसों को हस्तांतरित कर दी। यह गतिशीलता इस बात का प्रमाण है कि हमारी व्यवस्था अक्षम नहीं है बल्कि वह उदासीन है। जब तक कोई मामला राष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का कारण नहीं बनता तब तक फाइलों के पहिए नहीं घूमते। यदि यही सक्रियता दो महीने पहले दिखाई गई होती तो उस व्यक्ति को अपनी बहन के अवशेषों के साथ 3 किलोमीटर तक पैदल चलकर समाज को अपनी विवशता का यह भयावह प्रदर्शन नहीं करना पड़ता।

इस मामले में कानूनी उत्तराधिकार का प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कानून के अनुसार उत्तराधिकार की श्रेणियां निर्धारित होती हैं और अक्सर भाई या अन्य रिश्तेदारों को प्रथम श्रेणी का वारिस नहीं माना जाता जब तक कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियां न हों। यह कानूनी बारीकियां एक आम आदमी की समझ से परे होती हैं। वह व्यक्ति केवल इतना जानता था कि उसकी बहन का पैसा बैंक में है और उसे उसकी आवश्यकता है। समाज में मौजूद आर्थिक असमानता यहाँ एक और बड़ा कारक बनकर उभरती है। एक निर्धन व्यक्ति के लिए कानूनी प्रक्रिया की लागत और समय दोनों ही उसकी क्षमता से बाहर होते हैं। वह वकील नहीं कर सकता और न ही वह कचहरी के चक्कर काटने के लिए अपनी मजदूरी छोड़ सकता है। ऐसे में उसके पास केवल निराशा ही शेष रह जाती है।

यह घटना हमें यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि क्या हमारी बैंकिंग और सरकारी प्रणालियाँ केवल साक्षर और शहरी जनसंख्या को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं? ग्रामीण भारत की वास्तविकताएं शहरों से बिल्कुल अलग हैं। वहाँ पहचान के संकट से लेकर भाषा और प्रक्रियागत बाधाएं कदम-कदम पर खड़ी होती हैं। इस घटना के बाद राजनीतिक गलियारों में भी चर्चाएं हुईं और जांच के आदेश भी दिए गए लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई बुनियादी बदलाव किए जाएंगे? केवल जांच करना या किसी कर्मचारी को निलंबित कर देना इस समस्या का स्थाई समाधान नहीं है। समाधान तब होगा जब हमारी व्यवस्था प्रत्येक नागरिक को एक संख्या के बजाय एक इंसान के रूप में देखना शुरू करेगी।

अंत में यह कहना उचित होगा कि क्योंझर की यह घटना एक व्यक्ति की अज्ञानता से कहीं अधिक एक पूरे तंत्र की सामूहिक हार है। यह हमें यह सबक देती है कि नियम समाज की सुविधा के लिए होने चाहिए न कि समाज को प्रताड़ित करने के लिए। 19402 रुपये की उस राशि ने उस दिन केवल एक खाते का निपटारा नहीं किया बल्कि उसने हमारे आधुनिक समाज के चेहरे पर एक ऐसा दाग लगा दिया जो लंबे समय तक हमें हमारी जिम्मेदारियों की याद दिलाता रहेगा। विकास का अर्थ केवल ऊंची इमारतें या तेज इंटरनेट नहीं है बल्कि विकास का असली अर्थ तब है जब समाज का सबसे अंतिम व्यक्ति भी सम्मान के साथ अपना अधिकार प्राप्त कर सके और उसे अपनी सच्चाई साबित करने के लिए किसी कंकाल का सहारा न लेना पड़े। जब तक संवेदनशीलता को प्रशासन का अनिवार्य अंग नहीं बनाया जाएगा तब तक ऐसी हृदयविदारक घटनाएं व्यवस्था की पोल खोलती रहेंगी और हम केवल मूकदर्शक बनकर रह जाएंगे। हमें एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है जहाँ नियम मानवीय गरिमा के साथ सामंजस्य बिठा सकें ताकि कोई भी व्यक्ति स्वयं को इतना अकेला और लाचार महसूस न करे कि उसे अपनी मर्यादा और मृत अपनों के सम्मान को दांव पर लगाना पड़े।

— महेन्द्र तिवारी 

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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