काबा गाने वालों की हार से पश्चिमी देश परेशान! बंगाल के जनादेश से ‘वेस्ट मीडिया’ टेंशन में क्यों?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत पर दुनिया भर में चर्चा हो रही है. न्यूयॉर्क टाइम्स, The Guardian, अल-जजीरा, बीबीसी, रॉयटर, Washington Post जैसे कथित इंटरनेशनल मीडिया संस्थानों ने इसपर लंबा-चौड़ा लेख लिखा है. बीजेपी की बंगाल विजय का विश्लेषण किया है. लेकिन इस विश्लेषण का सुर निष्पक्ष नहीं है.
विश्लेषण में इन मीडिया संस्थानों का पक्षपात वाला नैरेटिव है. पत्रकारिता के नाम पर अपना एजेंडा और भारत विरोधी नैरेटिव का विस्तार करने वाले ऐसे अखबारों और मीडिया संस्थानों को आज हम असली पत्रकारिता का मतलब समझाएंगे. आज हम उन्हें बताएंगे की इन मीडिया संस्थानों को बंगाल में बीजेपी की जीत के फिक्र करने के बजाए किस बात पर चिंता करनी चाहिए. अब हम हेडलाइन मैनेजमेंट का वैश्विक विस्तार करनेवाला मीडिया संस्थानों की वैचारिक मरम्मत करेंगे.
पश्चिम बंगाल के चुनाव में दुनिया की मीडिया में चर्चा
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत एक बड़ी राजनीतिक घटना है. पश्चिमी मीडिया संस्थानों ने भी बंगाल में हुए इस बड़े राजनीतिक बदलाव को जगह दिया है. लेकिन उन्होंने ऐसा खबर या भारतीय लोकतंत्र का सकारात्मक पहलू दिखाने के लिए नहीं किया है.
सबसे पहले अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने बीजेपी के बंगाल विजय पर क्या लिखा वो आपको दिखाते हैं. न्यूयॉक टाइम्स के खबर की हेडलाइन है Modi’s Hindu Nationalists Conquer a Bastion of India’s Opposition, यानी मोदी के हिंदू राष्ट्रवादियों ने भारत में विपक्ष के एक गढ़ पर कब्जा कर लिया है. दो शब्दों पर ध्यान दिया आपने, हिंदू राष्ट्रवादियों और कब्जा. इन शब्दों के प्रयोग से आप न्यूयॉर्क टाइम्स की मंशा समझ सकते हैं.
ब्रिटेन के अखबारों ने किया कवर
ब्रिटेन के अखबार The Guardian ने लिखा है कि बीजेपी की जीत “enhances the Hindu nationalist party’s unimpeded authority”. यानी बंगाल जीत से हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी और मजबूत हुई है. द गार्जियन यहीं नहीं रुकता. आगे लिखता है कि बीजेपी की जीत भारत को धर्मनिरपेक्ष से हिंदू राष्ट्र बनाने का एजेंडा है. द गार्जियन ने unimpeded authority जैसे शब्द का प्रयोग कर लोकतांत्रिक जीत को तानाशाही का नाम दिया है.
भारत को नैतिकता का उपदेश देने का पाखंड करनेवाले यूरोप, अमेरिका, अरब के मीडिया संस्थान कैसे अपने देश के असल मुद्दों की अनदेखी कर रहे हैं, हम आपको बताएंगे, लेकिन उससे पहले एक बार फिर हम आपको NEWS WALL पर इन विदेशी मीडिया संस्थानों के वैचारिक पाखंड का साक्ष्य दिखाते हैं. इन सभी विदेशी मीडिया संस्थानों ने बंगाल के विवेकशील मतदाता के जनमत को SIR की गड़बड़ी, मुस्लिम विरोधी चुनावी रणनीति जैसे शब्दों से परिभाषित किया है.
यही नहीं चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल भी उठाए हैं।
पहले भी फैलाया गया भारत विरोधी नैरेटिव
पहली बार नहीं है जब भारत विरोधी नैरेटिव का काला चश्मा पहन कर इन मीडिया संस्थानों ने हेडलाइन बनाई है। हम इन विदेशी मीडिया संस्थानों से कहना चाहते हैं कि ये पत्रकारिता नहीं है, पक्षकारिता है। इसलिए आज इनकी आंखों से पक्षकारिता और अंध भारत विरोध का चश्मा उतारना जरूरी है. भारत की छवि को मलीन करने की साजिश करनेवालों को आज हम बताएंगे की उन्हें कैसी हेडलाइन बनानी चाहिए. सबसे पहले बात न्यूयॉर्क टाइम्स की करते हैं. अमेरिका के इस बड़े अखबार को बंगाल की नहीं आम अमेरिकियों की दुश्वारी की चिंता करनी चाहिए थी. न्यूयॉर्क टाइम्स की हेडलाइन होनी चाहिए थी.
न्यूयॉर्क टाइम्स की एडिटोरियल टीम में बैठे बुद्धिविलासियों सुनो आज हम पत्रकारिता के नजरिए से आपको बता रहे है कि ऐसी हेडलाइन आपको क्यों लगानी चाहिए. क्योंकि अमेरिका में 30 साल बाद सरकारी बॉन्ड पर ब्याज दर 5% को पार कर गया है. ये 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के जैसा खतरनाक स्तर है. ईरान युद्ध के कारण अमेरिका में तेल महंगा हुआ है. इससे महंगाई बढ़ी है. बैंक ऑफ अमेरिका ने अमेरिका की GDP ग्रोथ रेट का अनुमान घटाकर 2.3 प्रतिशत कर दिया है. वहीं महंगाई दर बढ़कर 3.6 प्रतिशत होने की आशंका है.
कई संस्थानों ने चेतावनी दी है कि ईरान विवाद अगर जल्द खत्म नहीं हुआ तो अमेरिका का संकट पूरी दुनिया को मंदी की तरफ ले जाएगा. अमेरिका में महंगाई आसमान पर है. अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है. ब्याज दरें खतरनाक स्तर पर पहुंच गई हैं. कुल मिलाकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था बेपटरी हो गई है. लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स को इसकी चिंता नहीं है. उन्हें किसकी चिंता है. पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत की. न्यूयॉर्क टाइम्स के कथित बुद्धिजीवी अमेरिका को छोड़कर, अपने देश की खबरें छोड़कर बंगाल को हेडलाइन बना रहे हैं. मतलब ये कैसा दिमागी दिवालियापन है.
इसी विवेकहीन ज्ञान का प्रदर्शन ब्रिटिश मीडिया अखबार द गार्जियन और बीबीसी ने भी किया है. इन्हें भी आज ये बताना जरूरी है कि असल में सही एडिटोरियल सोच कैसी होती है. लंदन में द गार्जियन और बीबीसी के आलीशान हेडक्वार्टर में बैठे मित्रों आपको अपने अखबार और वेबसाइट के लिए हेडलाइन ये बनाना चाहिए कि मंदी के कगार पर ब्रिटेन खाद्य पदार्थों की कीमत 50% तक बढ़ेंगी. यानी ब्रिटेन मंदी के मुहाने पर है. खाद्य पदार्थों की कीमतें 50% तक बढ़ने वाली है। वहां के प्रधानमंत्री ने 6% महंगाई की चेतावनी दी है।
ब्रिटेन में अर्थव्यवस्था जमीन पर है, महंगाई आसमान पर है. लोग घर का बिल चुकाने के लिए कर्ज ले रहे हैं. ऐसे समय में द गार्जियन और बीबीसी हेडलाइन क्या बना रहे हैं. पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत हिंदू राष्ट्रवाद का विस्तार है. अरे भाई. आप अपनी फिक्र किजिए ना. बंगाल को छोड़ दिजिए, हम बंगाल की खबर अपने लोगों को बता देंगे. आप अपने देश की समस्याएं अपने लोगों को बताएं. उन्हें सावधान करें कि आगे बुर वक्त आनेवाला है.
पाखंड का मुखौटा लगाए बैठे कई अखबार
पाखंड का यही मुखौटा अल जजीरा ने भी लगा रखा है. क्योंकि कतर के इस मीडिया संस्थान का अपना स्वार्थ, अपना एजेंडा है. कट्टरपंथियों का मुखपत्र बन चुके अल जजीरा को पश्चिम बंगाल नहीं अरब के हालात पर हेडलाइन बनानी चाहिए. अब उनकी बुद्धि और विवेक तो को नैरेटिव वाला वायरस संक्रमित कर चुका है. उन्हें पत्रकारिता की समझ तो रही नहीं.
इन सभी कथित मीडिया संस्थानों को बंगाल की कथित चिंता क्यों हैं. क्योंकि इन्हें एक खास तरह का भारत विरोधी नैरेटिव चलाना है. ये बंगाल को लेकर इसलिए फिक्रमंद हैं क्योंकि भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है. इनमें से किसी मीडिया संस्थान ने ये नहीं बताया कि भारत दुनिया से अपना सोना वापस मंगा रहा है. अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भारत की ग्रोथ रेट का अनुमान 6.5 प्रतिशत से 7.5 प्रतिशत तक लगाया है. समझ रहे हैं अमेरिका से यूरोप और अरब तक ग्रोथ रेट दो प्रतिशत भी नहीं है. लेकिन भारत की ग्रोथ रेट साढ़े सात प्रतिशत तक रह सकती है. इसलिए इन्हें भारत से भारतवासियों से ईष्या हो रही है. ये भारत की छवि को कलंकित करने की साजिश रच रहे हैं.
