लघुकथा

समुद्र हूॅं

खेती -किसानी के साथ-साथ साहित्य सृजन का कार्य वह कड़ी मेहनत व दिल लगाकर करता था । बाहर कम ही लोगों से मिलता -जुलता । मोबाइल स्क्रॉल, रील और सोशल मीडिया पर सीमित समय खर्च करता, लेकिन पुस्तकें, पत्र -पत्रिकाएं खूब पढ़ता । डाकिया झोला भर- भरकर डाक लाता था…  आसपास के लोग आश्चर्य करते कि ये आदमी क्या करता है कि हमारी समझ में ही नहीं आता ?

ताश नहीं खेलता, किसकी बहू किसके साथ नैन मटक्का कर रही है, फलां की लड़की किसके साथ भाग गई, अमुक का लड़का इस साल भी नौकरी नहीं पा सका । इन बातों में वह कोई रस नहीं लेता था । वह हमेशा अपने ही विचारों व सिद्धांतों में खोया रहता था । कुल मिलाकर अपने काम से काम ।

 एक दिन खेत पर जा रहा था । गांव के एक श्रीमान ने व्यंग्य करते हुए कहा- ‘ओरे मुकेशा ! एक जगह पर रुकी हुई नदी का पानी सड़कर बास मारने लगता है ।’

वह कुछ समय मौन रहा फिर थोडा मुस्कुराया और धीरे से बोला -‘महानुभाव ! मैं रुकी हुई नदी नहीं… समुद्र हूॅं,  बस दिखता हूॅं कि एक जगह रुका हुआ हूॅं । मेरी लहरें निरंतर हिलोरें लेती रहती हैं ।’

समुद्र ! शांत, अनंत, रहस्यमयी और विशाल ।

— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा 

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नाम - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा एम.ए., आई.डी.जी. बाॅम्बे सहित अन्य 5 प्रमाणपत्रीय कोर्स पत्रकारिता- आर्यावर्त केसरी, एकलव्य मानव संदेश सदस्य- मीडिया फोरम आॅफ इंडिया सहित 4 अन्य सामाजिक संगठनों में सदस्य अभिनय- कई क्षेत्रीय फिल्मों व अलबमों में प्रकाशन- दो लघु काव्य पुस्तिकायें व देशभर में हजारों रचनायें प्रकाशित मुख्य आजीविका- कृषि, मजदूरी, कम्यूनिकेशन शाॅप पता- गाँव रिहावली, फतेहाबाद, आगरा-283111

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