समुद्र हूॅं
खेती -किसानी के साथ-साथ साहित्य सृजन का कार्य वह कड़ी मेहनत व दिल लगाकर करता था । बाहर कम ही लोगों से मिलता -जुलता । मोबाइल स्क्रॉल, रील और सोशल मीडिया पर सीमित समय खर्च करता, लेकिन पुस्तकें, पत्र -पत्रिकाएं खूब पढ़ता । डाकिया झोला भर- भरकर डाक लाता था… आसपास के लोग आश्चर्य करते कि ये आदमी क्या करता है कि हमारी समझ में ही नहीं आता ?
ताश नहीं खेलता, किसकी बहू किसके साथ नैन मटक्का कर रही है, फलां की लड़की किसके साथ भाग गई, अमुक का लड़का इस साल भी नौकरी नहीं पा सका । इन बातों में वह कोई रस नहीं लेता था । वह हमेशा अपने ही विचारों व सिद्धांतों में खोया रहता था । कुल मिलाकर अपने काम से काम ।
एक दिन खेत पर जा रहा था । गांव के एक श्रीमान ने व्यंग्य करते हुए कहा- ‘ओरे मुकेशा ! एक जगह पर रुकी हुई नदी का पानी सड़कर बास मारने लगता है ।’
वह कुछ समय मौन रहा फिर थोडा मुस्कुराया और धीरे से बोला -‘महानुभाव ! मैं रुकी हुई नदी नहीं… समुद्र हूॅं, बस दिखता हूॅं कि एक जगह रुका हुआ हूॅं । मेरी लहरें निरंतर हिलोरें लेती रहती हैं ।’
समुद्र ! शांत, अनंत, रहस्यमयी और विशाल ।
— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
