धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

भाग्य, पुरुषार्थ और नियति

भाग्य : भाग्य, प्रारब्ध, संचित कर्म-फल

जन्म के समय जीव कोई पुरुषार्थ नहीं करता यद्यपि उसका जन्म किस कुल (परिवार) में, किस क्षेत्र और किस काल में होगा यह निश्चित होता है।
यह सब पूर्व कृत पुरुषार्थ/ कर्मों के संचित फल सत्कर्म/ अपकर्म के प्रति स्वरूप होता है।
यह भाग्याधीन होता है। जैसे कर्म, वैसा फल, वैसा प्रारब्ध = वैसा भाग्य।

जैन धर्म में कर्मों के फल अनुसार भाग्य का निर्माण होना माना जाता है, आत्मा के अपने पिछले जन्म या जन्मों के संचित कर्म के कर्म फल के उदय के अनुसार उसकी गति और जन्म होना माना जाता है और संचित कर्मों के शुभ और अशुभ परिणामों को भोगना पड़ता है।

अन्य पंथ या धर्मों में सर्वशक्तिमान द्वारा पद्धत किया हुआ पूर्व निर्धारित जो उनके द्वारा निर्धारित लिखा है, वही होता है ऐसा माना जाता है। इसे भाग्य कहते हैं।

भाग्य / भाग्यदोष का उदाहरण :

अनंत अंबानी का मुकेश अंबानी के यहां जन्म (भाग्य/सौभाग्य)।
जन्म साथ न्यून स्वास्थ्य (भाग्यदोष)।

अन्य उदाहरण :
कर्ण :
जिसके पिता सूर्य थे, माता कुन्ती सती कुमारी,
उसका पलना हुआ धार पर बहती हुई पिटारी।
सूत-वंश में पला, चखा भी नहीं जननि का क्षीर,
निकला कर्ण सभी युवकों में तब भी अद्भुत वीर।

पुरुषार्थ :
पूर्व कृत कर्मों के संचित फलों को भोगते हुए किए जाने वाले पुरुषार्थ से शुभ और अशुभ कर्मफल की प्राप्ति होती है।
सीधे शब्दों में वर्तमान में किए पुरुषार्थ के फल वर्तमान में और भविष्य में प्राप्त होते रहते हैं।

पुरुषार्थ चार प्रकार के हैं :
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ।

नैतिकता के साथ अर्थ उपार्जन करना और गृहस्थ जीवन जीना धर्म, अर्थ और काम के पुरुषार्थ हैं।
इन पुरुषार्थ से सुखी जीवन जीते जीते भी कभी कभी निम्न और दुखी जीवन भी जीना पड़ता है। कभी वांछित सफलता नहीं मिल पाती। इज्जत, शौहरत धन वैभव नहीं मिल पाता। यह भी पूर्व कृत शुभ अशुभ कर्म के उदय के कारण पुरुषार्थ करते हुए भी कई बार संभव नहीं होता है।

इसमें अधर्म, अनैतिक, छल, प्रपंच द्वारा किए पुरुषार्थ के परिणाम/फल दुखों के रूप में भी उपस्थित होते हैं और कभी कभी ऐश्वर्य, सत्ता आदि भी मिल जाते हैं, अहंकारी उसे भी सुख मान लेते हैं।

पुरुषार्थ का चौथा और अंतिम मनोरथ मोक्ष है। अध्यात्म की राह पर चलते हुए जीवन का समाधि मरण करना। मोक्ष के लिए प्रयत्नशील रहना। इस प्रकार
आत्मा के जन्म और मृत्यु के बीच इन चारों में से एक दो पुरुषार्थ चलते रहते हैं।
तप, जप, स्वाध्याय आदि मोक्ष मार्ग के पुरुषार्थ हैं।

जिन पुरुषार्थ का फल इस जन्म में नहीं मिल पाता है अगले जन्मों में मिलता है वो अगले जन्मों का भाग्य बन जाता है।

करम प्रधान ये जीवन है, करता चल करम सुजान,
फल कैसा, कब आवेगा,
मत दे चिंता में जान।

कर्ण जैसा पुरुषार्थ अन्यत्र दुर्लभ मिलता है पर फिर भी वह शापित हो जाता है :

“सह सकता जो कठिन वेदना,
पी सकता अपमान वही,
बुद्धि चलाती जिसे, तेज का कर सकता बलिदान वही।

‘तू अवश्य क्षत्रिय है, पापी! बता, न तो, फल पायेगा,
परशुराम के कठिन शाप से अभी भस्म हो जायेगा।’

बड़ी निष्ठा से विद्या ग्रहण करने आया कर्ण गुरु को कोई कष्ट न पहुंचे इस कारण कीड़े के जांघ में काटने की पीड़ा को सहता रहा और लहू की तप्त धार जब परशुराम जी के पीठ पर लगी और वो उठ खड़े हुए क्रोधित हुए की कर्ण तू क्षत्रिय है। कर्ण ने विद्या सीखने के लिए झूठ बोला कि वो ब्राह्मण है पर नहीं था और भयानक शाप पाया अंत समय में विद्या भूलने का। पुरुषार्थ में कमी नहीं, फिर भी ….

एक अन्य उदाहरण :
कर्ण श्रीकृष्ण को कहते हैं :

“कुल-गोत्र नहीं साधन मेरा,
पुरुषार्थ एक बस धन मेरा.
रण मे कुरूपति का विजय वरण,
या पार्थ हाथ कर्ण का मरण,
हे कृष्ण यही मति मेरी है,
तीसरी नहीं गति मेरी है.”

राज सिंहासन को ठोकर मार कर मृत्यु को गले लगाने वाला महा पुरुषार्थी था कर्ण।

वर्तमान में महा पुरुषार्थी के दो ज्वलंत उदाहरण: भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी जी और योगी जी हैं
और हम जानते हैं कि
उनके पुरुषार्थ प्रारब्ध परिणाम लाते हैं।

नियति :
“नियत” का शाब्दिक अर्थ है “निश्चित”।
नियति वह स्थिति है जिसका होना निश्चित है। जो पूर्व-निर्धारित हो, अर्थात् जिसे बदला नहीं जा सकता। जिसका संचालन अदृश्य शक्ति जिसे हम ईश्वर, प्रकृति या ब्रह्मांडीय व्यवस्था मान सकते हैं, द्वारा पूर्व से ही निश्चित माना जाता है, जिसे मनुष्य की इच्छा, पुरुषार्थ या भाग्य के बल से भी बदला नहीं जा सकता।

इसके उदाहरण :

प्राकृतिक घटनाएं।
अतिवृष्टि, अल्पवृष्टि, भूकंप, सुनामी, प्रचंड गर्मी – शीत।
महामारी। सभ्यताओं का विलुप्त हो जाना।

युद्ध :
महाभारत, विश्व युद्ध।

विरंचि रचना रचते हैं,
हम कुछ समझ नहीं पाते हैं,
स्वयं कृष्ण (भगवान) कौरव को समझाते हैं,
फिर भी महाभारत होते हैं,
विरंचि = ब्रह्मा जी

अन्य उदाहरण :
(व्यक्ति भी नियति के व्यूह चक्र में फंस जाता है)

अगम की राह, पर, सचमुच, अगम है,
अनोखा ही नियति का कार्यक्रम है ।
न जानें न्याय भी पहचानती है,
कुटिलता ही कि केवल जानती है ?

क्षुधा जागी हाय उसी की भू को,
कहें क्या मेदिनी मानव-प्रसू को ?
रुधिर के पङक में रथ को जकड़ क़र,
गयी वह बैठ चक्के को पकड़ क़र ।

  1. जो कर्ण अर्जुन के रथ को जिस रथ के सारथी स्वयं कृष्ण हों और उसकी ध्वजा पर स्वयं हनुमान जी विराजमान हो उस रथ को एक बाण से दो कदम पीछे कर सकता है। वही कर्ण लोहू के कीचड़ में फंसे रथ चक्र को नहीं निकाल सका, यह नियति की विडंबना है।
  2. असमय सूर्यास्त का होना (सूर्यग्रहण होना) और जयद्रथ का सामने आना फिर सूर्य का निकल आना और जयद्रथ का वध होना। यह नियति ही कर सकती है।

दुःख-सुख की हर इक माला,कुदरत ही पिरोती है
हाथों की लकीरों में, ये जागती-सोती है

— पुखराज छाजेड़

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