डिजिटल युग में युवा रहे सावधान
आज का युग तकनीकी क्रांति का युग है। मोबाइल,इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और सोशल मीडिया ने जीवन को सरल ,तीव्र और सुविधाजनक बनाया है। चिकित्सा, व्यापार तथा संचार के क्षेत्र में नई औद्योगिक क्रांति से तीव्र गति से परिवर्तन हो रहा है। तकनीकी उपकरण हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गए हैं, किंतु तकनीकी उपकरणों का अंधाधुंध प्रयोग अनेक समस्याओं को भी जन्म दे रहा है ।इन उपकरणों से उत्पन्न तरंगों के कारण हमारे चारों ओर इलेक्ट्रो मैग्नेटिक एडिशन का एक संजाल बन गया है। जिसके कारण अनेक दुष्प्रभाव दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया से समय की बर्बादी, साइबर अपराध, ऑनलाइन तथा मानसिक तनाव जैसी अनेक चुनौतियों का शिकार युवा पीढ़ी हो रही है। इसके अत्यधिक प्रयोग से बच्चों और युवाओं के शयन से कुछ मिनट पहले तक वीडियो और मोबाइल गेम्स खेलते रहने से उनके दिमाग पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। देर रात तक टीवी या गेम्स खेलने का नुकसान यह होता है, कि शयन के लिए प्रयास करने के बाद भी देर तक दिमाग सजग रहता है। इससे तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। जो एड्रिनल ग्रंथि में बनने वाले तनाव हार्मोन के स्तर को बढ़ा देता है जिससे शरीर में तेजी से उत्तेजना बढ़ती है तथा मस्तिष्क को जरूरी आराम न मिलने से भी तंत्रिका तंत्र प्रभावित होता है, अत्यधिक डिजिटल के उपयोग से शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसके अधिक प्रयोग से आंखों की रोशनी और एकाग्रता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। इनसे निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन का स्तर इन उपकरणों के समीप बहुत ज्यादा होता है और उसका दायरा लगभग 2 से 3 फीट होना चाहिए ।यह रेडिएशन छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बीमार लोगों के लिए बहुत हानिकारक होता है। हालांकि इनका उपयोग करना पूर्ण रूप से बंद नहीं कर सकते, लेकिन कुछ विशेष सावधानियों से इन दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है जैसे मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप जैसे उपकरणों की बैटरी चार्ज करते समय इनका बिल्कुल उपयोग न करें एवं रात्रि में सोते समय अपने शरीर से दो से तीन फीट की दूरी पर रखें ।अनेक विद्वानों के अनुसार शोध कार्यों में इसकी पुष्टि हुई है ,कि तकनीकी साधनों का उपयोग करते समय शरीर से 6 से 8 इंच की दूरी बनाएं रखना आवश्यक है। लैपटॉप को कभी भी अपने पैरों पर या शरीर के ऊपरी हिस्से में प्रयोग ना करें क्योंकि अक्सर लोग आराम की अवस्था में अपने शरीर के ऊपरी हिस्से पर रखकर इनका उपयोग करते हैं ऐसा करने से हृदय रोगों के पनपने की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती हैं ।नासा के शोध संस्थान द्वारा संचालित फटीग काउंटर्स मेजर प्रोग्राम के पूर्व निदेशक मार्क रसिकंड जो एक विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक और नीति निर्माता ने औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्तियों के नींद और थकान के प्रभावों को समझने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा रात के समय मोबाइल, टैबलेट और कंप्यूटर आदि का प्रयोग नींद में बाधा पहुंचाता है । उस समय कमरे में चमकती हुई कोई भी चीज़ मेलेटोनिन के बनने की प्रक्रिया पर असर डालती है ।इस हार्मोन का काम नींद को नियंत्रित करना होता है। स्लीप ट्रैकर एप्स और हालिया सर्वेक्षणों जैसे भारत में लगभग 40000 लोगों पर हुए स्लिप सर्वे के अनुसार अधिकांश भारतीय रात में 6 घंटे से भी कम नींद लेते हैं जो स्वास्थ्य के लिए बहुत खतरनाक है। अक्सर लोग अपने कार्य स्थलों पर 9 घंटें कंप्यूटर के सामने बैठकर कार्य करते हैं ,लेकिन गलत मुद्रा में बैठकर लगातार की- बोर्ड का प्रयोग करने से कलाई की (माध्यिका तांत्रिका मीडियम नर्व) पर दबाव पड़ता है जिससे कार्पल टनल सिंड्रोम का खतरा बढ़ जाता है। गंभीर स्थिति होने पर इस सर्जरी से ही ठीक किया जाता है।सही रूप में शारीरिक मुद्राएं ही व्यक्ति को अनेक बीमारियों से बचा सकती है। इसीलिए तकनीकी कार्य करते समय बैठने की उचित व्यवस्था का विशेष ध्यान रखना चाहिए ।हमें किसी भी मुद्रा में आधा घंटे से ज्यादा नहीं बैठना है, इससे मांसपेशियों पर कम प्रभाव पड़ता है वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तकनीकी सुविधाओं के कारण बड़ी से बड़ी गणनाएं सरलता के साथ संभव हो सकती है इसके कारण अधिक सूचनाओं तक हमारी पहुंच बढ़ रही है। लेकिन इसका गलत प्रभाव भी हुआ है ,कि व्यक्ति छोटी-छोटी बातों को याद रखने के लिए तकनीकी उपकरणों पर निर्भर हो गया है जिससे स्मरण शक्ति प्रभावित हुई है इसके लिए दिमाग लगाने वाले खेल जैसे शतरंज ,क्रॉस वर्ल्ड आदि व्यक्तित्व विकास में पूर्ण रूप से सहायक हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीकी सुविधाओं के कारण आज युवाओं में एक ही समय पर अनेक कार्यों को करने से एकाग्रता में कमी हो गई है यदि कार्य कुशलता व क्षमता को बढ़ाना है। तो एक ही समय पर एक ही कार्य करने की आदत डालनी होगी। इससे कार्य क्षमता में वृद्धि होगी। इसके लिए युवाओं, बच्चों को योग ,ध्यान, प्राणायाम व व्यायाम करना आवश्यक है। क्योंकि यदि व्यक्ति के पास इन सबके लिए समय नहीं है, तो फिर उसे बीमारी के लिए समय निकालना पड़ेगा। अतः डिजिटल उपकरण हमारा जीवन के विकास का महत्व पूर्ण साधन है, इसका लाभ तभी संभव है जब इसका उपयोग विवेक ,संयम और जिम्मेदारी के साथ किया जाए। यही सुरक्षा व सजगता युवा पीढ़ी को स्वस्थ, सफल महत्वाकांक्षी भविष्यवक्ता बना सकती है।
— डॉ. पूर्णिमा अग्रवाल
