शाश्वत की सुगंध
ओस की बूँद,
भोर मुस्काए,
सुगंध अमर।
वन की साँस,
पत्ते गुनगुन,
जीवन जागे।
नभ निर्मल,
चिड़िया का स्वर,
मन महके।
शांत सरिता,
लहरें बोलें,
काल ठहरे।
फूल झरें,
स्मृति मुस्काए,
प्रेम रहे।
दीप जले,
अंतर उजले,
सत्य खिले।
धरा हँसे,
ऋतु मुस्काए,
शाश्वत गंध।
— डॉ. अशोक
