मरने का इतिहास
सोचता हूँ कुछ ऐसा लिखूँ
कि अमर हो जाऊँ।
मरना तो एक दिन हमको भी है
तो क्यों न मरने का इतिहास लिख जाऊँ?
मगर इसमें सिर्फ एक ही मुश्किल है
कि मित्र यमराज को कहाँ बैठाऊँ?
लीजिए! नाम भर लिया और जनाब हाजिर हो गए
यार हैं, तो यार का फ़र्ज़ निभाने में जुट गए।
अपना सुझाव तर्क सहित समझाने लगे
कहने लगे -प्रभु!आप तो खुद इतिहास हो
तब इतिहास लिखकर क्या करोगे?
वैसे भी आप मेरे यार हो
अब इससे ज्यादा और क्या इतिहास लिखोगे?
मैंने उसे समझाया –
यार तेरे लिए ही तो इतिहास लिखना है,
क्योंकि सिर्फ तेरे सम्मान के लिए मुझे
मजबूरी में ही सही एक दिन तो मरना ही है।
यमराज झुँझलाया- बस कर यार!
तेरा विचार मुझे बिल्कुल नहीं भाया
इससे इतिहास भी बिल्कुल नहीं बनेगा।
एक बार तो सभी मरते हैं,
तुझे तो कई- कई बार मरना
और मरने का नया इतिहास लिखना है,
धरती लोक ही नहीं यमलोक में भी अमर होना है,
मेरे मित्र होने का विशेष लाभ भी तो लेना है।
फिर चाहे मरने से तलाक ले लेना
मगर पहले मरने का नोबेल पुरस्कार जरुर ले लेना
चाहे तो लेकर हमें ही समर्पित देना।
विश्वास कर, तेरा एहसान मानूंँगा
फिर जितनी बार मन करे, मरते रहना।
मैं तुझे बार-बार वाक ओवर देता रहूँगा
क्योंकि इसी बहाने मैं भी चर्चा में बना रहूँगा,
इतिहास के पन्नों में अमरता का सुख
तेरे साथ मैं भी तो पाता रहूँगा।
