डॉक्टर बनने की राह में संवेदनाएँ कहाँ खो जाती हैं?
देश में जब भी नीट (NEET) परीक्षा होती है, उसके बाद केवल परिणामों की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की चर्चा शुरू हो जाती है। कभी पेपर लीक, कभी परीक्षा की पारदर्शिता, कभी आरक्षण, कभी कट-ऑफ और कभी लाखों विद्यार्थियों पर पड़ने वाले मानसिक दबाव को लेकर बहस छिड़ जाती है। हर वर्ष करोड़ों सपनों का भार इस एक परीक्षा पर टिका होता है। माता-पिता अपनी वर्षों की बचत दाँव पर लगा देते हैं, विद्यार्थी दिन-रात एक कर देते हैं और समाज उन सफल अभ्यर्थियों को भविष्य का जीवनरक्षक मानकर गर्व महसूस करता है।
लेकिन इन तमाम बहसों के बीच एक ऐसा प्रश्न है, जो शायद सबसे महत्वपूर्ण है, फिर भी सबसे कम पूछा जाता है। आखिर यही बच्चे, जो डॉक्टर बनने का सपना लेकर मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश करते हैं, उनमें से कुछ आगे चलकर ऐसे डॉक्टर क्यों बन जाते हैं जिनके व्यवहार को लेकर समाज में असंतोष दिखाई देता है? क्यों कभी-कभी मरीज को लगता है कि उसके सामने बैठा व्यक्ति पहले डॉक्टर नहीं, बल्कि एक व्यवसायी है? यह प्रश्न किसी पूरे चिकित्सक समुदाय पर आरोप नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पड़ताल है जो एक संवेदनशील विद्यार्थी को कभी-कभी संवेदनहीन पेशेवर में बदल देती है।
यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि देश के अधिकांश डॉक्टर आज भी पूरी ईमानदारी, निष्ठा और करुणा के साथ अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। कोरोना महामारी के दौरान हमने देखा कि हजारों चिकित्सकों ने अपनी जान की परवाह किए बिना मरीजों की सेवा की। दूर-दराज़ के ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित संसाधनों के बीच कार्य करने वाले डॉक्टर आज भी चिकित्सा सेवा की गरिमा बनाए हुए हैं। इसलिए कुछ लोगों की गलतियों के आधार पर पूरे चिकित्सक समुदाय का मूल्यांकन करना अन्याय होगा। लेकिन यदि समाज में डॉक्टरों के प्रति अविश्वास बढ़ रहा है, तो उसके कारणों पर गंभीरता से विचार करना भी उतना ही आवश्यक है।
समस्या की शुरुआत मेडिकल कॉलेज से भी पहले हो जाती है। आज डॉक्टर बनने की तैयारी एक प्रतियोगी उद्योग बन चुकी है। कोचिंग संस्थानों में विद्यार्थियों को सफलता का अर्थ केवल रैंक, अंक और सीट समझाया जाता है। चिकित्सा को सेवा नहीं, बल्कि उपलब्धि और प्रतिष्ठा का माध्यम मानने की मानसिकता धीरे-धीरे विकसित होने लगती है। जब लक्ष्य केवल किसी भी कीमत पर मेडिकल सीट प्राप्त करना रह जाए, तब संवेदनशीलता, सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय मूल्यों की चर्चा पीछे छूट जाती है।
इसके बाद यदि कोई छात्र अत्यधिक महँगे निजी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेता है, जहाँ शिक्षा पर लाखों नहीं बल्कि करोड़ों रुपये तक खर्च होते हैं, तो आर्थिक दबाव भी उसके भविष्य को प्रभावित करता है। कई परिवार कर्ज लेकर अपने बच्चों को डॉक्टर बनाते हैं। ऐसे में कुछ लोगों के मन में यह भावना जन्म लेती है कि अब इस निवेश की भरपाई करनी है। यह सोच चिकित्सा की मूल भावना के विपरीत है, लेकिन शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण ने इस मानसिकता को कहीं न कहीं जन्म दिया है।
मेडिकल शिक्षा स्वयं भी अत्यंत कठिन है। वर्षों तक लगातार अध्ययन, इंटर्नशिप की लंबी ड्यूटी, रातभर जागकर काम करना, गंभीर मरीजों से रोज़ सामना होना, मानसिक तनाव और कई बार कठोर प्रशिक्षण—यह सब एक युवा छात्र के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। यदि इस दौरान उसे भावनात्मक सहयोग, नैतिक चिकित्सा और मानवीय व्यवहार का पर्याप्त प्रशिक्षण न मिले, तो धीरे-धीरे मरीज एक इंसान नहीं, बल्कि एक “केस” बनकर रह जाता है।
सरकारी अस्पतालों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। एक-एक डॉक्टर को सैकड़ों मरीज देखने पड़ते हैं। सीमित संसाधनों, दवाओं की कमी और प्रशासनिक दबाव के बीच हर मरीज को पर्याप्त समय देना कई बार संभव नहीं होता। दूसरी ओर निजी अस्पतालों में कई स्थानों पर आय, पैकेज और लक्ष्य आधारित कार्य संस्कृति का दबाव रहता है। ऐसे माहौल में चिकित्सा सेवा और व्यापार के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।
समस्या केवल डॉक्टरों की भी नहीं है। स्वास्थ्य व्यवस्था का पूरा ढाँचा कई बार ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करता है जहाँ मानवीय संवेदनाएँ धीरे-धीरे थकने लगती हैं। लगातार तनाव, मुकदमों का डर, हिंसा की घटनाएँ, सोशल मीडिया पर बिना तथ्य के आरोप और हर परिस्थिति में चमत्कार की अपेक्षा—ये सभी बातें डॉक्टरों पर अतिरिक्त मानसिक दबाव डालती हैं। जब समाज और व्यवस्था दोनों किसी पेशे को लगातार तनाव में रखें, तो उसका असर व्यवहार पर पड़ना स्वाभाविक है।
इसके बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि कुछ डॉक्टरों द्वारा अनावश्यक जाँचें लिखना, कमीशन आधारित रेफरल देना, अत्यधिक शुल्क लेना या मरीज के साथ असम्मानजनक व्यवहार करना किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। चिकित्सा केवल ज्ञान का नहीं, बल्कि विश्वास का भी पेशा है। एक बार यदि यह विश्वास टूटता है तो उसकी भरपाई अत्यंत कठिन होती है।
सबसे बड़ी कमी शायद हमारी चिकित्सा शिक्षा में नैतिक प्रशिक्षण की है। मेडिकल विद्यार्थियों को शरीर की संरचना, रोगों की पहचान और आधुनिक उपचार पद्धतियाँ तो विस्तार से पढ़ाई जाती हैं, लेकिन करुणा, संवाद, सहानुभूति और चिकित्सा नैतिकता को उतनी प्राथमिकता नहीं मिलती, जितनी मिलनी चाहिए। जबकि मरीज को सबसे पहले दवा नहीं, विश्वास की आवश्यकता होती है। कई बार डॉक्टर का एक मधुर शब्द भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।
नीट पर होने वाली बहस केवल परीक्षा की निष्पक्षता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि हमें वास्तव में बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था चाहिए तो मेडिकल शिक्षा को केवल ज्ञान और तकनीक तक सीमित रखने के बजाय उसे मानवीय मूल्यों से भी जोड़ना होगा। मेडिकल कॉलेजों में नैतिक शिक्षा, सामुदायिक सेवा, ग्रामीण स्वास्थ्य शिविर, संवाद कौशल और मानसिक स्वास्थ्य को प्रशिक्षण का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। विद्यार्थियों को यह समझाना होगा कि चिकित्सा केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी है।
सरकार की भी बड़ी जिम्मेदारी है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने, निजी मेडिकल शिक्षा की फीस को अधिक न्यायसंगत बनाने, सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने और कार्य परिस्थितियों को बेहतर बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। जब व्यवस्था ही संतुलित होगी, तभी उससे निकलने वाले पेशेवर भी अधिक संतुलित होंगे।
समाज को भी आत्ममंथन करना चाहिए। डॉक्टर से चमत्कार की अपेक्षा करना, छोटी-सी असफलता पर हिंसा करना या बिना तथ्यों के पूरे समुदाय को कटघरे में खड़ा कर देना किसी समस्या का समाधान नहीं है। डॉक्टर और मरीज का संबंध विश्वास पर आधारित होता है और इस विश्वास की रक्षा दोनों पक्षों को मिलकर करनी होगी।
नीट की निष्पक्षता आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक यह सुनिश्चित करना है कि मेडिकल कॉलेज से निकलने वाला प्रत्येक डॉक्टर केवल सफल परीक्षार्थी न हो, बल्कि संवेदनशील इंसान भी हो। देश को ऐसे चिकित्सकों की आवश्यकता है जिनके हाथों में विज्ञान की दक्षता हो, मस्तिष्क में ज्ञान हो और हृदय में करुणा। क्योंकि चिकित्सा केवल एक पेशा नहीं, बल्कि मानवता की सबसे पवित्र सेवाओं में से एक है।
नीट के विवादों के बीच यदि हम इस बड़े प्रश्न पर भी गंभीरता से विचार कर सकें कि डॉक्टर बनने की यात्रा में संवेदनाएँ क्यों कमजोर पड़ जाती हैं, तो शायद भविष्य में हमें केवल उत्कृष्ट चिकित्सक ही नहीं, बल्कि ऐसे डॉक्टर भी मिलेंगे जिन पर मरीज बिना किसी भय और संदेह के अपना जीवन सौंप सके। किसी भी राष्ट्र की स्वास्थ्य व्यवस्था की असली पहचान उसकी मशीनों, भवनों या तकनीक से नहीं, बल्कि डॉक्टर और मरीज के बीच मौजूद विश्वास से होती है। उस विश्वास को बचाए रखना ही हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
