सामाजिक

आत्म-सम्मान, ख़ामोशी और रिश्तों का कड़वा सच

जीवन का सफ़र बहुत लंबा और उतार-चढ़ाव से भरा हुआ है, और इस रास्ते पर चलते हुए हमारा कई तरह के लोगों से पाला पड़ता है। कुछ रिश्ते हमारी रूह में गहराई से उतर जाते हैं, तो कुछ वक्त के साथ केवल एक ऐसा बोझ बन कर रह जाते हैं जिसे ढोना मुमकिन नहीं होता। ऐसे में जब किसी ऐसे व्यक्ति को अपनी ज़िंदगी से हमेशा के लिए दूर करना पड़े जो कभी हमारे दिल के बेहद क़रीब हुआ करता था, तो यह फ़ैसला अत्यंत कठिन और दिल को चीर देने वाला होता है।  यह साफ़ है कि मानवीय संबंधों में आत्म-सम्मान और अलगाव की एक अपनी ही सच्चाई होती है।

जब किसी रिश्ते में दरार आ जाए और दूरियां आना पूरी तरह तय हो जाए, तो स्थिति को संभालने का सबसे बेहतर और परिपक्व रास्ता  पूर्ण ख़ामोशी को अपनाना होता है। किसी रिश्ते को ख़त्म करने के बाद उस इंसान पर कीचड़ उछालना, समाज में उसे बुरा-भला कहना या उस पर बेवजह इल्जाम लगाना हमारे अपने संस्कारों, शालीनता और बड़प्पन को कम करता है। बेशुमार चाहत और बेइंतिहा मोहब्बत होने के बावजूद अगर कोई आपकी भावनाओं की कद्र नहीं करता, तो यह कड़वी सच्चाई जान लेनी चाहिए कि उस इंसान को न तो आपकी मौजूदगी की कोई परवाह है और न ही आपकी इस बेपनाह मोहब्बत की कोई ज़रूरत है।

इस परिस्थिति में स्वतंत्रता और जाने देने का फ़लसफ़ा सबसे ज़्यादा मायने रखता है, जैसा कि कहा गया है कि ऐसे व्यक्ति को रोकना तो दूर, यह सवाल भी बिल्कुल मत करें कि वह आख़िर क्यों दूर हुआ, बल्कि उसे पूरी तरह से आज़ाद कर दें। जब कोई शख़्स अपनी मर्ज़ी से आपसे दूर जाना चाहे या आपके एहसासों को अहमियत देना छोड़ दे, तो उसे जबरन रोकने की कोशिश करना ख़ुद को मानसिक यातना और प्रताड़ना देने के समान है। उसे उसकी राह पर अकेला छोड़ देना ही बेहतर है, ताकि वह जहां और जिसके साथ भी रहना चाहे, अपनी मर्ज़ी से जी सके।

प्यार में जब कोई इंसान अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है और बदले में उसे केवल उपेक्षा, नजर अंदाज़गी और दर्द मिलता है, तो उसका मन अंदर से पूरी तरह टूट जाता है। ऐसे हालात में, उस क़द्र न करने वाले इंसान के लिए सबसे बड़ी और क़रारी सज़ा यही होती है कि आप उसे अपनी जिंदगी से इस तरह बाहर कर दें कि  उसे आपका साया भी नसीब न हो । जो व्यक्ति आपकी क़ीमत नहीं समझता, उसे आपकी ग़ैर-मौजूदगी का अहसास कराना ही उसके सुधरने की उम्मीद या उसके उदासीन रवैये का सबसे बड़ा जवाब होता है।

अंततः, यह जीवन बहुत अनमोल है और इसे उन लोगों के पीछे रो-रोकर बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए जो हमारी भावनाओं और हमारे वज़ूद की कोई क़द्र नहीं करते। जिस रिश्ते को छोड़ना मजबूरी या वक्त की मांग बन जाए, उसे पूरे सम्मान के साथ विदाई दें, अपनी ख़ामोशी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाएं और अपने स्वाभिमान व आत्म-सम्मान को हमेशा सर्वोपरि रखें।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

Leave a Reply