ग़ज़ल
वो मेरी आंख का आंसू तेरी पलकों पे जब ठहरा
हमारे प्यार का रिश्ता हुआ कुछ और भी गहरा
रक़ीबों ने लगाया था हर उसकी राह पर पहरा
मुसाफ़िर प्यार का लेकिन नहीं ठहरा नहीं ठहरा
जो हरदम दिल में रहता है, मेरी सांसों में पलता है
यक़ीनन जानती हूं मैं मेरी मां का है वो चहरा
मेरे सोए हुए दिल को कभी जिसने जगाया था
सपेरे मेरी ख़्वाहिश है सुना दे फिर वोही लहरा
तेरी तीर-ए-निगाही ने मेरी नींदें उड़ा डालीं
मैं अब महसूस करती हूं निशाना दिल पे जा ठहरा
जिसे चाहा है तुम उसको शरीक-ए- ज़िंदगी कर लो
उसे ले जाओ अपने साथ सर पे बांध कर सहरा
— नमिता राकेश
