परस्पर अभिवादन हेतु ‘नमन’ का श्रेष्ठ प्रकार
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहते हुए उसका अन्य व्यक्तियों से निरंतर संपर्क होता है और इस संपर्क की प्रथम अभिव्यक्ति अभिवादन के रूप में प्रकट होती है। अभिवादन केवल औपचारिक क्रिया नहीं है, बल्कि वह मनुष्य के संस्कार, संस्कृति, विनम्रता और पारस्परिक सम्मान का द्योतक है। भारतीय संस्कृति ने अभिवादन को केवल शिष्टाचार नहीं माना, अपितु उसे मानवीय संबंधों को जोड़ने वाली एक आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में देखा है।
हम जब किसी व्यक्ति को नमन करते हैं, तो वास्तव में उस व्यक्ति के प्रति अपने सम्मान और श्रद्धा की अभिव्यक्ति करते हैं। प्रश्न यह है कि नमन किस प्रकार किया जाए और उसका वास्तविक आधार क्या है? यदि हमारे मन में सम्मान की भावना ही न हो, तो केवल बाहरी औपचारिकता का कोई विशेष अर्थ नहीं रह जाता। इसलिए नमन का मूल आधार हमारी आंतरिक भावना है।
इसी संदर्भ में ऋग्वेद का एक सुंदर मंत्र है—
” नमो महद्भ्यो , नमो अर्भकेभ्यः, नमो युवेभ्यो , नमो आशिनेभ्यः।” – ऋग्वेद २७.१३
वेद की भाषा अत्यंत गूढ़ है, इसलिए उसका अर्थ समझना आवश्यक है। इस मंत्र का भाव यह है कि हम अपने से बड़े लोगों को नमन करें, अपने से छोटे लोगों को भी नमन करें, युवाओं का भी सम्मान करें और उन वृद्धजनों को भी प्रणाम करें जो हमें आशीर्वाद देने की क्षमता रखते हैं। अर्थात् नमन किसी विशेष आयु, पद या स्थिति तक सीमित नहीं है; यह प्रत्येक व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करने का माध्यम है।
“ नमन “ मूलतः हमारी एक शारीरिक चेष्टा है, जिसके द्वारा हम सामने वाले व्यक्ति के प्रति अपना आदर व्यक्त करते हैं। उदाहरण के लिए, जब कोई सम्माननीय व्यक्ति हमारे सामने आता है, तो हम उसके सम्मान में खड़े हो जाते हैं। हमने अभी तक कुछ कहा भी नहीं होता, किंतु केवल उठकर खड़े हो जाने से ही हमारे सम्मान का भाव प्रकट हो जाता है और सामने वाले व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि उसे उचित आदर दिया गया है। यह हमारी बॉडी लैंग्वेज द्वारा व्यक्त सम्मान है।
सम्मान प्रकट करने के अनेक तरीके :-
आज पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से लोग हाथ मिलाकर अभिवादन करते हैं। भारतीय परंपरा में दोनों हाथ जोड़कर “नमस्ते” या “प्रणाम” किया जाता है। कहीं हाथ उठाकर अभिवादन किया जाता है। यदि सामने वाला व्यक्ति अत्यंत श्रद्धेय हो, तो उसके चरण स्पर्श किए जाते हैं।
इन सभी प्रकारों में भी हमारी शारीरिक मुद्रा का विशेष महत्व है। कोई व्यक्ति केवल थोड़ा-सा झुककर नमस्कार करता है, तो कोई कमर झुकाकर। जापान जैसे देशों में लोग लगभग नब्बे डिग्री तक झुककर सम्मान व्यक्त करते हैं। देवप्रतिमा अथवा अत्यंत पूजनीय संत-महात्माओं के प्रति हम साष्टांग दण्डवत प्रणाम करते हैं। यदि ऐसा न भी करें, तो घुटनों के बल बैठकर भी श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया जाता है।
यदि किसी कारणवश शारीरिक रूप से नमन संभव न हो, तो वाणी द्वारा भी सम्मान व्यक्त किया जाता है। “नमस्कार”, “प्रणाम”, “वंदे”, “जय श्रीराम”, “राधे-राधे”, “सत् श्री अकाल” आदि अनेक अभिवादन इसी श्रेणी में आते हैं। कई स्थानों पर लोग गले मिलकर भी अपना स्नेह और सम्मान व्यक्त करते हैं। इन सभी प्रकारों का यदि सूक्ष्म विश्लेषण करें, तो तीन बातें विशेष रूप से सामने आती हैं।
नमन का मूल आधार मन में सम्मान की भावना है। यदि मन में सम्मान नहीं है, तो बाहरी क्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है।
कई बार जब हम अत्यंत श्रद्धा के साथ प्रणाम करते हैं, तो हमारी आँखें स्वतः बंद हो जाती हैं। यह हमारे पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। सामान्य औपचारिक अभिवादन में आँखें खुली रहती हैं, किंतु गहन श्रद्धा में मन भीतर की ओर केंद्रित हो जाता है।
यह निर्णय कि सामने वाले व्यक्ति के प्रति किस प्रकार सम्मान प्रकट किया जाए, हमारे विवेक पर आधारित होता है। ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि और विवेक प्रदान किया है। हमारी आत्मा उसी विवेक के माध्यम से हमें प्रेरित करती है कि सामने वाले व्यक्ति की आयु, गरिमा, संबंध और परिस्थिति के अनुसार कौन-सी भाव-भंगिमा उपयुक्त होगी। उसी के आधार पर हम हाथ जोड़ते हैं, चरण स्पर्श करते हैं, दण्डवत प्रणाम करते हैं, गले मिलते हैं अथवा वाणी से अभिवादन करते हैं।
नमन के प्रकार अनेक हो सकते हैं :-
यह सूची अंतिम या संपूर्ण नहीं है। जीवन की परिस्थितियों और संस्कृतियों के अनुसार इनके अनेक रूप मिलते हैं। किंतु इन सबका मूल तत्व एक ही है—जब भी हम किसी व्यक्ति को नमन करते हैं, तब उसके पीछे हमारी सच्ची भावना उस व्यक्ति के प्रति सम्मान, श्रद्धा और सद्भाव व्यक्त करने की होती है। यही नमन का वास्तविक अर्थ और उसकी आत्मा है।
यदि इस विषय को वैदिक दृष्टि से देखें, तो वेदों में अभिवादन के लिए मूलतः एक ही शब्द मिलता है—”नमस्ते”। आज प्रचलित अनेक प्रकार के अभिवादन बाद के काल में विकसित हुए हैं। वेद जिस आदिकालीन ज्ञान परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं, उस समय न श्रीराम का जन्म हुआ था, न श्रीकृष्ण का और न ही अन्य महापुरुषों का। वेद मानव-जाति के लिए ईश्वर द्वारा ऋषियों के माध्यम से प्रकट किया गया आचार-संहिता (Code of Conduct) हैं। इसलिए जहाँ भी अभिवादन का प्रसंग आता है, वहाँ “नमस्ते” शब्द का ही प्रयोग मिलता है।
यदि ” नमस्ते ” शब्द का संधि-विच्छेद करें, तो उसका अर्थ अत्यंत स्पष्ट हो जाता है। “नमः” का अर्थ है—सम्मानपूर्वक नमन करना, “ते” का अर्थ है—”आपको” अर्थात् “नमस्ते” का सीधा-सा अर्थ हुआ— “मैं आपको सम्मानपूर्वक नमन करता हूँ।”
इस वाक्य में ” मैं ” प्रत्यक्ष रूप से नहीं कहा गया है, क्योंकि वह कर्ता है और निहित रूप में उपस्थित है। सामने वाला व्यक्ति कर्म है और “नमन करना” क्रिया है। इस प्रकार “नमस्ते” एक अत्यंत संक्षिप्त, स्पष्ट और पूर्ण अभिवादन है। इसके साथ हमारी शारीरिक मुद्रा, हाथ जोड़ना अथवा अन्य भाव-भंगिमाएँ अलग विषय हैं; किंतु वाणी से उच्चारित “नमस्ते” सीधे-सीधे सामने वाले व्यक्ति तक हमारे सम्मान का संदेश पहुँचा देती है।
अब यदि अन्य अभिवादनों पर विचार करें, तो एक रोचक तथ्य सामने आता है। जब हम कहते हैं—”जय श्रीराम”, तब हम भगवान श्रीराम के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। सामने वाला भी “जय श्रीराम” कहकर उसी श्रद्धा को दोहराता है। किंतु विचार कीजिए कि इस आदान-प्रदान में सम्मान किसे मिला? भगवान श्रीराम को। सामने उपस्थित व्यक्ति को हमने प्रत्यक्ष रूप से क्या कहा? उसके प्रति हमारा सम्मान कहाँ व्यक्त हुआ?
इसी प्रकार जब हम “राधे-राधे” कहते हैं, तब भी हम श्रीराधा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। यह अत्यंत पवित्र और श्रद्धापूर्ण अभिवादन है, किंतु उसका केंद्र भी सामने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि आराध्य व्यक्तित्व है। इसलिए इन अभिवादनों का अपना आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व अवश्य है, परंतु वे प्रत्यक्ष रूप से सामने वाले व्यक्ति को संबोधित नहीं करते।
नमस्ते : एकमात्र पंथ निरपेक्ष अभिवादन
यही कारण है कि वैदिक परंपरा का “नमस्ते” किसी विशेष संप्रदाय, मत या पंथ से जुड़ा हुआ नहीं है। यदि कोई “जय जिनेन्द्र” कहता है, तो उससे जैन परंपरा का बोध होता है। “सत् श्री अकाल” से सिख परंपरा का, “अस्सलाम-वलेकुम” से इस्लामी परंपरा का और “गुड मॉर्निंग” या “गुड ईवनिंग” जैसे अभिवादनों से पाश्चात्य सांस्कृतिक परंपरा का संकेत मिलता है। अर्थात् अधिकांश अभिवादन किसी-न-किसी धार्मिक, सांस्कृतिक अथवा सामाजिक पहचान का परिचय देते हैं। सामान्यतः उन्हें यह अपेक्षा भी रहती है कि सामने वाला उसी शैली में उत्तर दे। यदि आप किसी मुस्लिम मित्र को “नमस्ते” कहें, तो संभव है कि वह उत्तर में “अस्सलाम- वलेकुम” कहे। वह आपका सम्मान तो कर रहा है, किंतु अपने धार्मिक-सांस्कृतिक अभिवादन के ही माध्यम से। इसी प्रकार प्रत्येक समुदाय अपनी-अपनी अभिवादन-परंपरा को व्यक्त करता है।
निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाए तो “नमस्ते” इन सबसे भिन्न है। यह किसी संप्रदाय, मत, पंथ अथवा धार्मिक पहचान का प्रतीक नहीं, बल्कि मनुष्य के प्रति मनुष्य के सम्मान का सार्वभौमिक अभिवादन है। इसलिए कहा जा सकता है कि जहाँ अनेक अभिवादन अपनी-अपनी परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं “नमस्ते” सम्पूर्ण मानव-जाति को एक सूत्र में जोड़ने वाला अभिवादन है।
नमस्ते की शारीरिक अभिव्यक्ति
यदि अब हम शारीरिक अभिव्यक्ति पर विचार करें, तो हाथ जोड़कर “नमस्ते” करना और हाथ मिलाकर अभिवादन करना—इन दोनों की तुलना भी रोचक है। कोरोना महामारी के समय पूरी दुनिया ने अनुभव किया कि हाथ मिलाने की परंपरा तत्काल समाप्त करनी पड़ी। लोग एक-दूसरे को स्पर्श करने से बचने लगे। उस समय विश्व के अनेक देशों में हाथ जोड़कर अभिवादन करने की भारतीय शैली को अपनाया गया। यह इस बात का प्रमाण है कि “नमस्ते” समय की कसौटी पर खरा उतरने वाला, सुरक्षित और सर्वस्वीकार्य अभिवादन है।
नमस्ते करने के लिए हाथ जोड़ने की मुद्रा का भी अपना गहरा प्रतीकात्मक अर्थ है। जब हम दोनों हथेलियों को जोड़ते हैं, तब हमारी दशों उँगलियाँ एकमत होकर एकता का प्रतीक बन जाती हैं। दोनों अँगूठे हृदय के समीप रहते हैं। इसका भाव यह है कि मेरी बुद्धि, मेरा हृदय, मेरी शक्ति और मेरा संपूर्ण व्यक्तित्व एकमत होकर आपके प्रति सम्मान प्रकट कर रहा है।
यह केवल हाथ जोड़ने की क्रिया नहीं है; यह मेरे अहंकार के विपरीत विनम्र होने का प्रतीक है। मेरे भीतर जितना भी सामर्थ्य, पराक्रम और व्यक्तित्व है, वह सब मेरे विवेक और हृदय की स्वीकृति के साथ आपके समक्ष विनम्र हो जाता है। इस भावना का सार यही है कि मैं आपके भीतर उसी दिव्यता का दर्शन करता हूँ, जिसका अनुभव अपने हृदय में करता हूँ। अर्थात् “नमस्ते” का वास्तविक संदेश है—”मैं आपके भीतर स्थित दिव्यता को प्रणाम करता हूँ।” यही इसकी सार्वभौमिकता है, यही इसकी आध्यात्मिक गरिमा है और यही भारतीय संस्कृति का शाश्वत संदेश है।
नमस्ते का इतिहास :
यदि हम अपने धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करें—चाहे वे वेद हों , पुराण हों, भगवद्गीता, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत, सत्यनारायण कथा अथवा दुर्गासप्तशती हों — जहाँ-जहाँ भी दो व्यक्तियों के परस्पर अभिवादन का प्रसंग आता है, वहाँ सामान्यतः “नमस्ते”, “नमः” अथवा “प्रणाम” जैसे शब्दों का ही प्रयोग मिलता है। किसी भी अन्यान्य विशिष्ट संप्रदाय का अभिवादन वहाँ सामान्यतः अभिवादन के रूप में नहीं मिलता। इसी तथ्य का एक आधुनिक उदाहरण भी है। लगभग सौ वर्ष पूर्व जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई और उसकी प्रार्थना की रचना की गई, तो उसकी पहली पंक्ति है—”नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे……”
ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रार्थना का आरंभ “नमस्ते” से किया गया। इसका कारण यही है कि “नमस्ते” एक वैदिक शब्द है और उसका संबंध किसी विशेष जाति, पंथ, भाषा अथवा संप्रदाय से नहीं है। हमारे उपरोक्त निवेदन की यह पुष्टि करता है की यह समस्त मानव-समाज के लिए समान रूप से स्वीकार्य अभिवादन है।
यदि आधुनिक इतिहास पर भी दृष्टि डालें, तो अनेक अवसरों पर “नमस्ते” को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान प्राप्त हुआ है। उदाहरण के लिए, सन् 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में, जिसमें स्वामी विवेकानन्द ने भाग लिया था, भारतीय अभिवादन-पद्धति ने विश्व का ध्यान आकर्षित किया। बाद के वर्षों में भी यही “नमस्ते” भारतीय संस्कृति की एक विशिष्ट पहचान के रूप में प्रतिष्ठित होता गया।
इसी प्रकार एक प्रसंग पंडित जवाहरलाल नेहरू के रूस-प्रवास से जुड़ा हुआ बताया जाता है। रूस की एक विशेषता यह रही है कि वहाँ अपनी भाषा को अत्यधिक सम्मान दिया जाता है। वे न तो स्वयं अनावश्यक रूप से अंग्रेज़ी का प्रयोग करते हैं और न ही सामने वाले से उसकी अपेक्षा करते हैं। कहा जाता है कि जब श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित वहाँ भारत की राजदूत बनकर पहुँचीं और उन्होंने अपने परिचय-पत्र अंग्रेज़ी में प्रस्तुत किए, तो उनसे पूछा गया कि क्या आपके देश की अपनी कोई भाषा नहीं है? इसी कड़ी में यह भी उल्लेख मिलता है कि जब पंडित नेहरू रूस गए, तो उन्होंने भारतीय परंपरा के अनुसार “नमस्ते” कहकर अभिवादन किया। इसी प्रकार हमारे निकटवर्ती देश नेपाल में भी लंबे समय से “नमस्ते” सामाजिक और सांस्कृतिक अभिवादन के रूप में व्यापक रूप से प्रचलित है।
इन उदाहरणों से यह निष्कर्ष निकलता है कि अनेक अभिवादन अपने-अपने धार्मिक या सांस्कृतिक समुदायों का परिचय देते हैं, जबकि “नमस्ते” व्यक्ति को किसी पहचान के आधार पर विभाजित नहीं करता, बल्कि मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। इसीलिए मेरा विनम्र आग्रह है कि यदि आप अपनी श्रद्धा के अनुसार “जय श्रीराम”, “राधे-राधे”, “सत् श्री अकाल”, “जय जिनेन्द्र” अथवा कोई अन्य धार्मिक अभिवादन कहना चाहें, तो अवश्य कहें। उसमें कोई आपत्ति नहीं है। किंतु उसके उपरांत यदि “नमस्ते” भी कह दिया जाए, तो सामने वाले व्यक्ति के प्रति आपका व्यक्तिगत सम्मान भी स्पष्ट रूप से व्यक्त हो जाता है। क्योंकि धार्मिक उद्घोषणा और व्यक्तिगत अभिवादन—दोनों का उद्देश्य अलग-अलग है। पहला हमारे आराध्य के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है, जबकि दूसरा सामने उपस्थित व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करता है।
‘ नमस्कार ‘ शब्द की विवेचना :
अब इसी प्रसंग में एक और प्रश्न विचारणीय है। बहुत-से लोग “नमस्ते” के स्थान पर “नमस्कार” शब्द का प्रयोग करते हैं। क्या इन दोनों में कोई अंतर है? क्या दोनों का अर्थ एक ही है अथवा इनके प्रयोग की दृष्टि से कोई सूक्ष्म भेद है? इस विषय पर भी थोड़ा विचार करना आवश्यक है। मेरे मत से “नमस्ते” अपने आप में एक पूर्ण वाक्य है। इसके भीतर क्रिया भी निहित है और संबोधन भी। “नमः” का अर्थ है—नमन या सम्मान, और “ते” का अर्थ है—आपको। अर्थात् “नमस्ते” का स्पष्ट अर्थ हुआ—”मैं आपको नमन करता हूँ।” यह एक पूर्ण अभिव्यक्ति है, जिसमें सम्मान सीधे सामने वाले व्यक्ति तक पहुँच जाता है।
इसके विपरीत “नमस्कार” शब्द केवल नमन करने की क्रिया का बोध कराता है। उसमें यह स्पष्ट नहीं होता कि यह नमन किसके प्रति है। जब तक सामने वाले के लिए स्पष्ट निर्देश नहीं है, तब तक वह व्यक्तिगत अभिवादन नहीं बनता। इसलिए मेरा मानना है कि “नमस्ते” अधिक पूर्ण, अधिक स्पष्ट और अधिक प्रत्यक्ष अभिवादन है।
सामाजिक दृष्टि से नमस्ते की विशिष्टताएं :
यह विश्लेषण हमारी भाषा की समृद्धि का भी परिचायक है। संस्कृत और हिन्दी में प्रत्येक शब्द का अपना विशिष्ट अर्थ और व्याकरणिक आधार है। इसलिए जहाँ पूर्ण और स्पष्ट अभिव्यक्ति उपलब्ध हो, वहाँ अनावश्यक संक्षेप या शिथिल प्रयोग से बचना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि “नमस्ते” किसी भी व्यक्ति के लिए समान रूप से प्रयोग किया जा सकता है। जैसा कि वैदिक मंत्र में कहा गया है—बड़े के लिए भी नमस्ते, छोटे के लिए भी नमस्ते, युवा के लिए भी नमस्ते और वृद्ध के लिए भी नमस्ते। इसमें आयु, सामाजिक स्थिति, पद, योग्यता अथवा किसी अन्य भेद का कोई स्थान नहीं है।
यही नहीं, यदि किसी ऐसे व्यक्ति से भी आपका सामना हो जाए जिसके प्रति आपके मन में किसी कारणवश कटुता हो, और वह पहले आपको “नमस्ते” कह दे, तो शिष्टाचार की दृष्टि से आपका भी उत्तर “नमस्ते” ही होना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि सामने वाला व्यक्ति चाहे मित्र हो या शत्रु, पूज्य हो या सामान्य, स्त्री हो या पुरुष, छोटा हो या बड़ा—”नमस्ते” सबके लिए समान रूप से सम्मान व्यक्त करने वाला अभिवादन है। “नमस्ते” किसी प्रकार का विभाजन नहीं करता, बल्कि सबको समान भाव से जोड़ता है।
इसे एक सरल उदाहरण से भी समझा जा सकता है। हमारी भारतीय परंपरा में लड्डू जैसी मिठाई बनाई जाती है, जो अनेक कणों को जोड़कर एक रूप देती है। इसके विपरीत आधुनिक पाश्चात्य परंपरा में जन्मदिन पर केक काटा जाता है। यह केवल एक सांकेतिक उदाहरण है कि भारतीय संस्कृति सामान्यतः जोड़ने की भावना को अधिक महत्व देती है। उसी प्रकार “नमस्ते” भी लड्डू की भांति मनुष्यों को जोड़ने वाला अभिवादन है, विभाजित करने वाला नहीं।
अंत में, नमस्ते की शारीरिक मुद्रा का भी उल्लेख करना आवश्यक है। जब हम दोनों हाथ जोड़कर हृदय के समीप नमस्ते करते हैं, तब हमारा शरीर, मन और बुद्धि एक साथ उस भाव में सहभागी होते हैं। इस मुद्रा में हमारे भीतर सम्मान, विनम्रता और सद्भाव की भावना जागृत होती है।
शरीर विज्ञान की दृष्टि से :
कुछ विद्वानों का यह मत है कि इस प्रकार की शांत, एकाग्र और श्रद्धापूर्ण मुद्रा मनुष्य के मानसिक एवं जैविक तंत्र पर भी सकारात्मक प्रभाव डालती है तथा शरीर में सकारात्मक भावनाओं से जुड़े हार्मोनों के स्राव को प्रोत्साहित करती है। यद्यपि इस विषय पर वैज्ञानिक अनुसंधान निरंतर चल रहे हैं, तथापि इतना निश्चित है कि सम्मान, विनम्रता और सद्भाव का भाव मनुष्य के मन और व्यवहार को सकारात्मक दिशा प्रदान करता है। इसीलिए कहा जा सकता है कि “नमस्ते” केवल एक शब्द नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का ऐसा सार्वभौमिक अभिवादन है जिसमें सम्मान, समता, विनम्रता, आत्मीयता और मानव-एकता का संदेश निहित है। यही कारण है कि इसे विश्व की श्रेष्ठतम अभिवादन-पद्धतियों में एक माना जाता है।
यदि हम अभिवादन की विभिन्न पद्धतियों पर शांत मन से विचार करें, तो स्पष्ट होता है कि “नमस्ते” केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक परंपरा है जिसके भीतर अनेक व्यावहारिक और मानवीय विशेषताएँ निहित हैं। सबसे पहले स्वच्छता की दृष्टि से देखें। हाथ मिलाने की परंपरा में प्रत्यक्ष शारीरिक संपर्क होता है। अनेक अवसरों पर इसे अस्वच्छ (Unhygienic) भी माना गया है। हमने देखा कि ब्रिटेन की महारानी भी अनेक सार्वजनिक अवसरों पर हाथ मिलाते समय दस्ताने पहनती थीं। इसका आशय यही है कि इस पद्धति में स्वास्थ्य संबंधी सावधानियों की आवश्यकता पड़ती है। कोरोना महामारी ने तो पूरी दुनिया को यह शिक्षा दे दी कि स्पर्श-आधारित अभिवादन हर परिस्थिति में उपयुक्त नहीं होता। उस समय हाथ मिलाना लगभग समाप्त हो गया और विश्व के अनेक देशों ने भारतीय शैली में हाथ जोड़कर “नमस्ते” करना प्रारंभ किया। इससे यह सिद्ध हुआ कि “नमस्ते” समय की कसौटी पर खरा उतरने वाला अभिवादन है।
इसी प्रकार गले मिलना भी हर परिस्थिति में संभव नहीं है। यह व्यक्ति-विशेष के साथ आत्मीयता, सामाजिक मर्यादा, परिस्थिति तथा पारस्परिक संबंधों पर निर्भर करता है। इसलिए इसे भी सार्वभौमिक अभिवादन नहीं कहा जा सकता। इसके विपरीत “नमस्ते” स्त्री-पुरुष, आयु, पद, जाति, भाषा अथवा देश—किसी भी भेद से परे समान रूप से स्वीकार्य है। अंग्रेज़ी में “Good Morning”, “Good Afternoon”, “Good Evening” अथवा “Good Night” जैसे अभिवादन समय-विशेष पर आधारित हैं। उन्हें बोलने के लिए समय का ध्यान रखना पड़ता है। प्रातःकाल, अपराह्न या रात्रि—परिस्थिति बदलते ही अभिवादन भी बदल जाता है। इस दृष्टि से वे समय-सापेक्ष हैं। जबकि “नमस्ते” दिन के किसी भी समय, किसी भी व्यक्ति के लिए समान रूप से प्रयोग किया जा सकता है।
सांस्कृतिक दृष्टि से :
उसी संदर्भ में इस विषय की पुष्टि के लिए मैं एक और वैदिक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहता हूँ। वैदिक संध्या में यजुर्वेद का एक अधोलिखित अत्यंत प्रसिद्ध मंत्र है। यह संभवतः “रुद्राष्टाध्यायी” एवं “श्री रुद्रम्” के पाठ में भी पाया जाता है।
“ओ३म! नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥” -यजु. १६/४१
इस मंत्र में बार-बार “नमः” शब्द का प्रयोग हुआ है। शम्भु को नमन , मयोभू को नमन , शंकर को नमन , मयस्कर को नमन , शिव को नमन तथा शिव से भी श्रेष्ठतर कल्याणकारी स्वरूप को नमन। अर्थात् नमन की यह प्रक्रिया किसी व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि परम कल्याणकारी सत्ता के विविध स्वरूपों के प्रति सम्मान व्यक्त करती है।
वेदों में नमन की यही भावना सार्वभौमिक, सार्वकालिक और सार्वजनिक थी। किंतु कालांतर में मनुष्य ने स्वयं अनेक सीमाएँ निर्मित कर लीं। पहले राष्ट्रों की सीमाएँ बनीं, फिर भाषाओं की, फिर मत, पंथ और मजहब की, और अंततः सामाजिक तथा अन्य अनेक प्रकार की सीमाएँ भी जोड़ दी गईं। इसलिए मेरा निवेदन केवल इतना है कि जो अभिवादन किसी विशेष पहचान से बंधा हुआ है, वह स्वभावतः सीमित हो जाता है; जबकि जो किसी भी प्रकार की सीमा से मुक्त है, वही वास्तव में सार्वभौमिक कहलाने का अधिकारी है। मेरे मत में “नमस्ते” ऐसा ही अभिवादन है।
नमस्ते के प्रत्यक्ष लाभ :
जब हम “नमस्ते” करते हैं, तब उससे हमें कम-से-कम तीन महत्वपूर्ण लाभ प्राप्त होते हैं।
पहला—हमारे स्वभाव में विनम्रता और कोमलता आती है। कठोर मन से सच्ची नमस्ते नहीं हो सकती। जब मन में आद्रता आती है, तभी हाथ अपने-आप जुड़ते हैं। यह मनुष्य के अहंकार को शिथिल करती है और उसके स्वभाव में सरलता तथा सौम्यता का संचार करती है।
दूसरा—यह शरीर की एक संतुलित और सजग मुद्रा है। जैसे कुछ लोग नमाज़ को शारीरिक व्यायाम की दृष्टि से भी उपयोगी मानते हैं, उसी प्रकार हाथ जोड़कर नमस्ते करने की मुद्रा भी शरीर को संयमित और संतुलित करती है।
तीसरा—कुछ विद्वानों का मत है कि सम्मान, श्रद्धा और सकारात्मक भाव से की गई यह मुद्रा मनुष्य के मानसिक एवं जैविक तंत्र पर भी अनुकूल प्रभाव डालती है तथा सकारात्मक मनोभावों को पुष्ट करती है। यद्यपि इस विषय पर वैज्ञानिक अनुसंधान अभी भी जारी हैं, तथापि यह निर्विवाद है कि विनम्रता और सद्भाव मनुष्य के व्यक्तित्व को अधिक संतुलित और सकारात्मक बनाते हैं।
इस प्रकार “नमस्ते” केवल अभिवादन नहीं है। यह लेने वाले और देने वाले—दोनों के मन को समान भावभूमि पर स्थापित करता है। इसमें न भाषा का बंधन है, न देश का, न जाति का, न पंथ का और न ही स्त्री-पुरुष का भेद। यह वास्तव में एक सर्वमान्य, सर्वस्वीकार्य और सार्वभौमिक अभिवादन है। यह मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है और उसके भीतर स्थित दिव्यता का सम्मान करता सिखाता है।
आज जब सम्पूर्ण विश्व को संवाद , सम्मान और समरसता की आवश्यकता है तब “ नमस्ते “ केवल भारतीय अभिवादन न रहकर सम्पूर्ण मानवता के लिए एक सार्वभौमिक सन्देश तथा मानव जाति के संगठन का ठोस पर्याय बन सकता है।
परिशिष्ट : जिज्ञासा-समाधान
प्रश्न 1 : यदि मैं “नमस्कार गुप्ता जी” कहूँ, तो क्या वह भी सामने वाले व्यक्ति के प्रति व्यक्तिगत अभिवादन नहीं होगा?
उत्तर- यह एक अत्यंत विचारणीय प्रश्न है। मेरा निवेदन केवल इतना था कि “नमस्ते” अपने आप में एक पूर्ण अभिव्यक्ति है। “नमः” और “ते” मिलकर सीधे सामने वाले व्यक्ति के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं—”मैं आपको नमन करता हूँ।”
यदि आप “नमस्कार गुप्ता जी” कहते हैं, तो निश्चय ही आपने संबोधन जोड़कर उसे व्यक्ति-विशेष से जोड़ दिया। व्यवहार की दृष्टि से वह व्यक्तिगत अभिवादन बन जाता है। मेरा आग्रह केवल भाषिक दृष्टि से था कि “नमस्ते” स्वयं में पूर्ण अभिव्यक्ति है, जबकि “नमस्कार” सामान्यतः नमन की क्रिया का बोध कराता है। यह व्याकरणिक विवेचन है; व्यवहार में दोनों शब्द सम्मान व्यक्त करने के लिए प्रचलित हैं।
प्रश्न 2 : जैन धर्म का “णमोकार मंत्र” तो “नमस्कार” पर आधारित है। उसमें किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि गुणों का वंदन है। तब “नमस्कार” को अधूरा कैसे कहा जा सकता है?
उत्तर: आपकी बात से मैं पूर्णतः सहमत हूँ। जैन धर्म का णमोकार मंत्र विश्व के महानतम मांगलिक मंत्रों में से एक है। उसमें किसी व्यक्ति-विशेष का नहीं, बल्कि अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु—इन पाँच परमेष्ठियों के गुणों को नमस्कार किया गया है। वहाँ “णमो” का प्रयोग अत्यंत व्यापक और दार्शनिक अर्थ में हुआ है। मेरा विवेचन दैनिक सामाजिक अभिवादन के संदर्भ में था, न कि धार्मिक मंत्रों के संदर्भ में। दोनों की भूमिकाएँ अलग-अलग हैं।
प्रश्न 3 : “जय जिनेन्द्र”, “राधे-राधे” या “जय श्रीराम” जैसे अभिवादन भी तो सम्मान ही व्यक्त करते हैं।
उत्तर: निश्चित रूप से ये सभी श्रद्धा से परिपूर्ण अभिवादन हैं। मेरा आशय इनके महत्व को कम करना नहीं है। मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि ऐसे अभिवादनों से व्यक्ति प्रमुख रूप से अपनी धार्मिक या पांथिक पहचान प्रकट करने का आग्रह रखता है। उदाहरण के लिए “जय जिनेन्द्र” जैन परंपरा का, “राधे-राधे” ब्रज संस्कृति का और “सत् श्री अकाल” सिख परंपरा का परिचायक है। इसके विपरीत “नमस्ते” किसी विशेष धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान का परिचय नहीं देता। यही कारण है कि मैं इसे सर्वाधिक रूप से सार्वभौमिक अभिवादन मानता हूँ।
प्रश्न 4 : भाषा तो निरंतर बदलती रहती है। शब्दों के अर्थ भी समय के साथ बदलते हैं। तब केवल “नमस्ते” को ही सर्वोत्तम क्यों माना जाए?
उत्तर: यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। निस्संदेह भाषा एक प्रवाहमान धारा है। शब्दों के अर्थ बदलते हैं, उनका व्यवहार भी बदलता है। समाज उन्हें स्वीकार भी करता है। मैं इस तथ्य से पूर्णतः सहमत हूँ। मेरा आग्रह केवल इतना है कि जब हम किसी शब्द के मूल अर्थ, उसकी व्युत्पत्ति और उसके दार्शनिक आधार की चर्चा करते हैं, तब हमें उसके मूल स्वरूप को भी समझना एवं संरक्षित करना चाहिए। बाद के पारम्परिक प्रयोग अपने स्थान पर मान्य हो सकते हैं, किंतु उनसे मूल अर्थ में परिवर्तन नहीं हो जाना चाहिए।
उदाहरण के लिए “धर्म” शब्द को अंग्रेज़ी में “Religion” कहा जाता है, परंतु दोनों शब्दों का अर्थ पूर्णतः समान नहीं है। उसी प्रकार किसी मूल संस्कृत शब्द के अनेक व्यवहारगत रूप हो सकते हैं, परंतु उसका मूल भाव वही रहता है। इसी दृष्टि से मेरा आग्रह है कि “नमस्ते” का मूल वैदिक स्वरूप अत्यंत व्यापक, सार्वभौमिक और निष्पक्ष है।
समापन : निष्कर्ष
यह चर्चा किसी अभिवादन को श्रेष्ठ और दूसरे को हीन सिद्ध करने के लिए नहीं थी। इसका उद्देश्य केवल यह समझना था कि वैदिक परंपरा में “नमस्ते” शब्द का दार्शनिक, भाषिक और सांस्कृतिक महत्व क्या है। अन्य सभी अभिवादन अपनी-अपनी परंपराओं में सम्माननीय हैं। किंतु यदि सम्पूर्ण मानव-समाज के लिए एक ऐसे अभिवादन की खोज की जाए, जो जाति, पंथ, भाषा, देश, काल और सामाजिक पहचान से ऊपर उठकर केवल मानव के प्रति सम्मान व्यक्त करे, तो वैदिक दृष्टि से “नमस्ते” उस आदर्श के अत्यंत निकट दिखाई देता है।
— आर्य रविदेव गुप्त
