अमेरिका में इंडिया डे : भारतीय प्रतिभा और परिश्रम का वैश्विक सम्मान
अमेरिकी राज्य मैसाचुसेट्स द्वारा 15 अगस्त को ‘इंडिया डे’ घोषित किया जाना महज एक प्रतीकात्मक घटना नहीं है, बल्कि यह व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीक के क्षेत्र में भारतीय समुदाय के विशेष योगदान को दी गई एक बड़ी आधिकारिक मान्यता है। यह घोषणा इस बात का प्रमाण है कि स्वतंत्रता दिवस का जश्न अब केवल भारतीयों की भावनाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक प्रमुख अमेरिकी राज्य द्वारा भारतीयों की अनवरत मेहनत और असाधारण प्रतिभा के प्रति प्रकट किया गया गहरा सम्मान भी है।
अमेरिका को लंबे समय से अवसरों की भूमि कहा जाता रहा है। दुनिया के लगभग हर हिस्से से लोग एक बेहतर भविष्य की तलाश में वहां पहुंचे और अपनी कड़ी मेहनत तथा बौद्धिक क्षमता से उस महान राष्ट्र की प्रगति में समान भागीदार बने। इन्हीं तमाम प्रवासी समुदायों के बीच भारतीय मूल के अमेरिकी आज सबसे प्रभावशाली और सम्मानित समूहों में गिने जाते हैं। उनकी आबादी अमेरिका की कुल जनसंख्या का केवल डेढ़ प्रतिशत के आसपास है, लेकिन जब बात अर्थव्यवस्था, विज्ञान, चिकित्सा, अत्याधुनिक तकनीक, शिक्षा, उद्यमिता और राजनीति की आती है, तो उनका प्रभाव उनकी संख्या के अनुपात से कहीं अधिक विशाल और स्पष्ट दिखाई देता है। यह स्थिति केवल कुछ व्यक्तियों की आर्थिक सफलता की कहानी भर नहीं है। यह इस तथ्य का एक जीवंत प्रमाण है कि शिक्षा, अथक परिश्रम और निरंतर नवाचार किसी भी समाज को अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक ले जाने की क्षमता रखते हैं।
भारतीय मूल के लोगों का अमेरिका की ओर रुख करना कोई नई परिघटना नहीं है। बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में भी कुछ भारतीय वहां पहुंचे थे, लेकिन इस दिशा में वास्तविक और बड़ा बदलाव साल 1965 के बाद देखने को मिला, जब अमेरिका ने अपने आव्रजन कानूनों में ऐतिहासिक संशोधन किए। इन बदलावों के बाद बड़ी संख्या में भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, प्रोफेसर और अन्य उच्च शिक्षित पेशेवर अमेरिका की धरती पर पहुंचे। समय बीतने के साथ उनकी दूसरी और तीसरी पीढ़ी भी वहीं पली बढ़ी और उस नई पीढ़ी ने अमेरिकी समाज के लगभग हर महत्वपूर्ण क्षेत्र में अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान स्थापित की।
आज के समय में भारतीय मूल के लोगों की आबादी पचास लाख के करीब मानी जाती है और यह समुदाय अमेरिका के सबसे शिक्षित तथा सर्वाधिक आय अर्जित करने वाले गिने चुने समुदायों में शीर्ष पर विराजमान है। भारतीय अमेरिकी समुदाय की इस अपार सफलता की सबसे बड़ी और मूल शक्ति उनकी शिक्षा के प्रति गहरी निष्ठा है। उच्च शिक्षा और पेशेवर डिग्रियां प्राप्त करने वाले भारतीयों का अनुपात अन्य तमाम प्रवासी समुदायों की तुलना में बहुत अधिक है। इंजीनियरिंग, चिकित्सा विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, वित्त, कानून और गहन अनुसंधान जैसे जटिल क्षेत्रों में भारतीयों ने उत्कृष्ट उपलब्धियां हासिल की हैं और यही मुख्य कारण है कि उनकी औसत घरेलू आय अमेरिका की राष्ट्रीय औसत आय के आंकड़े से काफी ऊपर है। यह शानदार आर्थिक सफलता केवल व्यक्तिगत समृद्धि के दायरे तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भारी मात्रा में कर भुगतान, निवेश, उपभोग और नए रोजगार सृजन के माध्यम से यह सीधे तौर पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को एक बहुत मजबूत आधार प्रदान करती है।
भारतीय अमेरिकी केवल बड़े पदों पर नौकरी करने या कॉर्पोरेट जगत में उच्च वेतन प्राप्त करने तक ही सीमित नहीं रहे हैं। उन्होंने उद्यमिता और व्यापार के क्षेत्र में भी दुनिया को अपनी क्षमता का लोहा मनवाया है। अमेरिका के विशाल होटल और मोटल उद्योग में भारतीय मूल के उद्यमियों की एक बेहद मजबूत और स्पष्ट उपस्थिति है। इस क्षेत्र में विशेष रूप से गुजराती समुदाय ने असाधारण सफलता हासिल कर एक मिसाल कायम की है। आज अमेरिका में हजारों होटल और मोटल भारतीय परिवारों द्वारा सफलतापूर्वक संचालित किए जा रहे हैं, जिनके माध्यम से वहां के लाखों स्थानीय लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला है। इसी तरह सूचना प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स, वित्तीय सेवाओं और उभरते हुए स्टार्टअप जगत में भी भारतीय उद्यमियों ने अनेक सफल कंपनियों की नींव रखी है। इन कंपनियों ने न केवल अमेरिका की अर्थव्यवस्था को एक नई गति दी है, बल्कि पूरे विश्व में नवाचार और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ावा दिया है।
अगर स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें, तो वहां भी भारतीय मूल के डॉक्टरों और चिकित्सा विशेषज्ञों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और जीवनदायी रहा है। अमेरिका के बड़े अस्पतालों, चिकित्सा संस्थानों और उन्नत शोध केंद्रों में आज हजारों भारतीय डॉक्टर अपनी निस्वार्थ सेवाएं दे रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार अमेरिका में कार्यरत प्रत्येक दस डॉक्टरों में से लगभग एक डॉक्टर भारतीय मूल का होता है। हाल ही में जब पूरी दुनिया कोविड महामारी के गंभीर संकट से जूझ रही थी, तब भारतीय मूल के चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों ने अपनी जान की परवाह किए बिना अग्रिम पंक्ति में खड़े रहकर बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनकी विशेषज्ञता और कार्य के प्रति समर्पण ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया कि भारतीय समुदाय केवल आर्थिक सफलता अर्जित करने में ही नहीं, बल्कि मानवीय सेवा और परोपकार के क्षेत्र में भी सबसे आगे खड़ा रहता है।
तकनीकी जगत और डिजिटल दुनिया में तो भारतीय अमेरिकी समुदाय का प्रभाव और भी अधिक चकित करने वाला है। आज दुनिया की सबसे बड़ी और प्रभावशाली तकनीकी कंपनियों का नेतृत्व भारतीय मूल के अधिकारियों के सुरक्षित हाथों में है। गूगल की मूल कंपनी अल्फाबेट के प्रमुख सुंदर पिचाई, माइक्रोसॉफ्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सत्य नडेला, आईबीएम के प्रमुख अरविंद कृष्णा और एडोबी के प्रमुख शांतनु नारायण जैसे नाम आज वैश्विक नेतृत्व और नवोन्मेष के प्रतीक बन चुके हैं। इन दिग्गज नेताओं ने यह भली भांति सिद्ध कर दिया है कि सच्ची प्रतिभा और नेतृत्व क्षमता किसी भी भौगोलिक सीमा या राष्ट्रीयता की मोहताज नहीं होती। उन्होंने तकनीकी नवाचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड कंप्यूटिंग और पूरे विश्व के डिजिटल परिवर्तन के क्षेत्र में एक नई वैश्विक दिशा निर्धारित करने में सबसे अहम भूमिका निभाई है। सिलिकॉन वैली जिसे पूरी दुनिया का सबसे बड़ा तकनीकी केंद्र माना जाता है, वहां भारतीय इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की उपस्थिति के बिना किसी भी बड़े प्रोजेक्ट की कल्पना करना मुश्किल है। इसके साथ ही कई भारतीय वैज्ञानिक नासा जैसे अंतरिक्ष संस्थानों, प्रमुख विश्वविद्यालयों और रक्षा अनुसंधान केंद्रों में अति महत्वपूर्ण परियोजनाओं का नेतृत्व कर रहे हैं।
शिक्षा और अकादमिक अनुसंधान के क्षेत्र में भी भारतीय अमेरिकी समुदाय की भूमिका बहुत ही गौरवशाली रही है। अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय, एमआईटी, स्टैनफोर्ड और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भारतीय छात्र, प्रोफेसर और शोधकर्ता बहुत बड़ी संख्या में कार्यरत हैं। इन विद्वानों ने विज्ञान, गणित, कंप्यूटर विज्ञान और चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर कई नई और युगांतरकारी उपलब्धियां हासिल की हैं। इसके अलावा भारतीय समुदाय का प्रभाव अब केवल शिक्षा और तकनीक के दायरे से बाहर निकलकर अमेरिकी राजनीति में भी मजबूती से दिखाई देने लगा है। कमला हैरिस का अमेरिका की उपराष्ट्रपति के पद तक पहुंचना भारतीय मूल के समुदाय के लिए एक बहुत ही ऐतिहासिक और गर्व करने वाली उपलब्धि रही है। इसके साथ ही कई भारतीय मूल के सांसद अमेरिकी कांग्रेस में बहुत सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं और निक्की हेली या विवेक रामास्वामी जैसे नेताओं ने राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल होकर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय मूल के नागरिक अब अमेरिकी राजनीति की मुख्यधारा के नेतृत्व का एक अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। प्रशासनिक व्यवस्था, न्यायपालिका और विभिन्न नीति निर्माण संस्थाओं में भी भारतीय मूल के विशेषज्ञों की निरंतर बढ़ती संख्या यह साबित करती है कि उन्होंने अमेरिका में केवल धन ही नहीं, बल्कि वहां के समाज का गहरा विश्वास और सम्मान भी अर्जित किया है।
इस पूरी सफलता के बीच एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू भारतीय समुदाय की अपनी सांस्कृतिक पहचान को सहेज कर रखना भी है। भारतीय अमेरिकियों ने अपने त्योहारों, भाषाओं, पारंपरिक संगीत, नृत्य, योग, आयुर्वेद और अपने सुदृढ़ पारिवारिक मूल्यों को सात समंदर पार भी पूरी तरह से जीवित रखा हुआ है। आज दीपावली, होली और स्वतंत्रता दिवस जैसे उत्सव केवल भारतीय समुदाय के घरों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अमेरिकी समाज के अन्य तमाम वर्ग भी पूरे उत्साह के साथ इनमें भाग लेने लगे हैं। यह सांस्कृतिक स्वीकार्यता विश्व पटल पर भारत की बढ़ती हुई सॉफ्ट पावर का एक बहुत बड़ा और प्रत्यक्ष प्रमाण है।
मैसाचुसेट्स राज्य द्वारा 15 अगस्त को इंडिया डे घोषित किया जाना इसी गहरे सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभाव का एक बहुत ही सुंदर परिणाम है। हार्वर्ड और एमआईटी जैसे संस्थानों वाले इस राज्य में यह घोषणा केवल एक सांकेतिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह उस दीर्घकालिक और बहुमूल्य योगदान की सार्वजनिक स्वीकृति है जिसने पूरे अमेरिका के विकास में अपनी एक बहुत ही अमिट छाप छोड़ी है। भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान, और हरित ऊर्जा जैसे नए क्षेत्रों में भी भारतीय मूल के विशेषज्ञों का यह प्रभाव और अधिक बढ़ने की प्रबल संभावना है। अंततः यह कहानी केवल प्रवासियों की सफलता की नहीं है, बल्कि यह कड़े परिश्रम, गहरे सांस्कृतिक मूल्यों और वैश्विक स्तर पर मिले अवसरों के बेहतरीन समन्वय की वह प्रेरणादायक दास्तान है जो यह साबित करती है कि भारतीय प्रतिभा पूरे विश्व को एक नई दिशा देने में पूरी तरह से सक्षम है।
— महेन्द्र तिवारी
