80वाँ स्वतंत्रता दिवस : नीट यूजी, सीबीएसई और ओएसएम में सुधार की आवश्यकता
15 अगस्त 2026 को भारत अपना 80वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। यह अवसर केवल आज़ादी के अमृत इतिहास को याद करने का ही नहीं, बल्कि भविष्य के भारत की दिशा तय करने का भी है। यदि भारत को वर्ष 2047 तक एक विकसित, आत्मनिर्भर और ज्ञान-आधारित राष्ट्र बनाना है, तो शिक्षा व्यवस्था में व्यापक और दूरदर्शी सुधार अनिवार्य हैं। विशेष रूप से नीट यूजी , सीबीएसई और ओपन स्कूलिंग मॉडल ( ओएसएम )में समयानुकूल परिवर्तन आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुके हैं।
पिछले कुछ दशकों में भारत की शिक्षा व्यवस्था ने उल्लेखनीय प्रगति की है। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी है तथा उच्च शिक्षा तक पहुँच भी पहले की तुलना में अधिक हुई है। इसके बावजूद शिक्षा प्रणाली कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। अत्यधिक परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था, कोचिंग संस्थानों पर बढ़ती निर्भरता, रटने की प्रवृत्ति, अवसरों की असमानता, मानसिक तनाव तथा रोजगारोन्मुखी कौशलों की कमी आज भी चिंता का विषय हैं। अब समय आ गया है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना न होकर विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर केंद्रित हो।
नीट यूजी देश में चिकित्सा शिक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षा है। हर वर्ष लाखों विद्यार्थी सीमित मेडिकल सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर एक समान परीक्षा होने से चयन प्रक्रिया में एकरूपता आई है, लेकिन इसके साथ कई समस्याएँ भी सामने आई हैं। अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, महंगी कोचिंग, परीक्षा सुरक्षा, पेपर लीक की आशंकाएँ और विद्यार्थियों पर बढ़ता मानसिक दबाव लगातार चर्चा का विषय रहे हैं। इसलिए आवश्यक है कि नीट यूजी को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और छात्र-केंद्रित बनाया जाए। केवल तथ्यों को याद रखने के बजाय वैज्ञानिक सोच, तार्किक क्षमता, संचार कौशल, नैतिक मूल्यों और समस्या-समाधान की योग्यता को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
सीबीएसई ने हाल के वर्षों में क्षमता-आधारित शिक्षा और योग्यता-आधारित मूल्यांकन की दिशा में कई सकारात्मक कदम उठाए हैं। यह पहल स्वागतयोग्य है, लेकिन इसे और व्यापक बनाने की आवश्यकता है। विद्यालयों में रटने की संस्कृति समाप्त कर विद्यार्थियों में जिज्ञासा, रचनात्मकता, आलोचनात्मक चिंतन, नवाचार, सहयोग और नेतृत्व क्षमता का विकास किया जाना चाहिए। परियोजना-आधारित शिक्षा, व्यावहारिक गतिविधियाँ, सतत मूल्यांकन तथा अनुभवात्मक अधिगम को बढ़ावा देकर शिक्षा को अधिक प्रभावी और जीवनोपयोगी बनाया जा सकता है।
ओपन स्कूलिंग मॉडल ( ओएसएम) उन विद्यार्थियों के लिए आशा की किरण है जो किसी कारणवश नियमित विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते। आर्थिक कठिनाइयाँ, भौगोलिक दूरी, खेल, कला, रोजगार अथवा अन्य व्यक्तिगत परिस्थितियाँ कई छात्रों को लचीली शिक्षा की आवश्यकता देती हैं। ओएसएम को आधुनिक डिजिटल संसाधनों, गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री, ऑनलाइन शिक्षण, व्यावसायिक पाठ्यक्रमों तथा बेहतर करियर मार्गदर्शन से सशक्त बनाया जाना चाहिए। समाज में भी यह धारणा बदलनी होगी कि ओपन स्कूलिंग किसी प्रकार से नियमित शिक्षा से कमतर है।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), डिजिटल पुस्तकालय, वर्चुअल प्रयोगशालाएँ और स्मार्ट कक्षाएँ शिक्षा का स्वरूप बदल रही हैं। इन तकनीकों का उपयोग विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता बढ़ाने और शिक्षकों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच डिजिटल सुविधाओं का अंतर कम हो, ताकि प्रत्येक विद्यार्थी समान अवसर प्राप्त कर सके।
शिक्षा सुधारों में विद्यार्थियों का मानसिक स्वास्थ्य भी सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए। परीक्षा का दबाव, असफलता का भय और भविष्य की चिंता अनेक विद्यार्थियों को तनाव और अवसाद की ओर ले जाती है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में परामर्श सेवाओं, खेलकूद, कला, संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। सफलता का मापदंड केवल अंक नहीं, बल्कि व्यक्तित्व, संवेदनशीलता और जीवन कौशल भी होने चाहिए।
इसके साथ-साथ कौशल-आधारित शिक्षा को भी मजबूत करना आवश्यक है। उद्योगों के साथ साझेदारी, इंटर्नशिप, उद्यमिता शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण युवाओं को भविष्य की बदलती अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करेंगे। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं, बल्कि रोजगार सृजित करने की क्षमता विकसित करना भी होना चाहिए।
विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब देश का प्रत्येक बच्चा—चाहे वह किसी भी सामाजिक, आर्थिक या भौगोलिक पृष्ठभूमि से आता हो—उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त कर सके। शिक्षा नीति का केंद्र समान अवसर, गुणवत्ता, नवाचार, नैतिकता और समावेशिता होना चाहिए।
80वाँ स्वतंत्रता दिवस हमें यह संदेश देता है कि अब केवल स्वतंत्रता का उत्सव मनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को भी नई दिशा देना आवश्यक है। नीट यूजी, सीबीएसई और ओएसएम में दूरदर्शी एवं समयानुकूल सुधार करके ही भारत ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित कर सकता है जो ज्ञान के साथ-साथ कौशल, चरित्र, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्माण करे।
जब प्रत्येक विद्यार्थी को अपनी प्रतिभा के अनुसार आगे बढ़ने का समान अवसर मिलेगा, तब स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ साकार होगा। 80वें स्वतंत्रता दिवस पर यही संकल्प होना चाहिए कि भारत की शिक्षा व्यवस्था ऐसी बने जो हर युवा को आत्मविश्वासी, सक्षम, नवाचारी और जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए प्रेरित करे। यही विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव होगी।
— डॉ. विजय गर्ग
