बाप की खामोशी
सूनी सी शाम
बाप की चुप आँखों में
सपनों की धूप
पुराना आँगन
पैरों की आहट सुन
मुस्काए द्वार
मौन के पीछे
छिपा हुआ स्नेह सागर
बिना शब्दों के
थका हुआ तन
फिर भी देता छाया
बरगद जैसा
बूढ़े हाथों में
बचपन की यादें हैं
ममता की रेखा
रातें जागीं वो
मेरे कल की खातिर
खुद को भुलाकर
खामोश पिता
आँखों से कहते हैं
“तुम आगे बढ़ो”
नीला आकाश
बाप का आशीष बने
जीवन पथ पर
— डॉ. अशोक
