काया कंचन
आँखों से हिय में गया उतर,
अब मौन प्रीत हो गई मुखर।
वो छुवन दुपहरी धूप हुई,
काया कंचन-सी गई निखर।
नयनों में नूतन स्वप्न सजे,
साँसों में सुरमई साज़ बजे।
तपती दुपहरी शीतल हो,
जब संग प्रिये का रूप सजे।
धड़कन की गति पल-पल बढ़े,
चंदन-सी चाहत मन में चढ़े।
इस चंचल मन के आँगन में,
चाहत के मधुर चिराग जले।
चमकी चाहत की छाँव घनी,
हर साँस आज सर्वस्व बनी।
मीरा के मोहन मिल ही गए,
सुंदर-सी यह सांझ बनी।
— सविता सिंह मीरा
