कविता

युवा पीढ़ी क्यों गांवों को भूलती जा रही

एक दिन वह गांव का घर भी छूट जाएगा
वह शहर का घर भी नहीं बचा पायेगा
जाना तो पड़ेगा अकेले उस मंजिल की ओर
जहां से फिर कोई वापिस नहीं आएगा

घर का आंगन मिट्टी से भरा हुआ
वह कच्ची दीवारें भी मिट्टी में समा जाएंगी
एक एक ईंट पत्थर जोड़ कर बनाया था जिहोने
उनकी यादे भी धीरे धीरे धुंधली नज़र आएंगी

सब मस्त हैं सब की अपनी अपनी ज़िंदगी है
बचपन के यार दोस्त कोई अब नहीं बुलाते
कहाँ गए वह सुंदर लम्हें वह अनमोल समय
नाम लेकर दूर से अब कोई आवाज़ नहीं लगाते

सुनसान आंगन में लगे पत्थर अब भी करते हैं याद
एक दूसरे के पीछे दौड़ते कितना होता था वाद विवाद
ऐसा क्या हुआ वक्त ने कैसी यह करवट बदली
हर कोई क्यों चाह रहा गांव से होना आज़ाद

शहर की ज़िंदगी क्यों सभी को रास आ रही
एकदूसरे से अनजान ऐसी ज़िन्दगी क्यों भा रही
गांव अब वैसे नहीं रहे तेजी से हो रहा विकास
फिर भी युवा पीढ़ी क्यों गांवों को भूलती जा रही

शहर तो शहर है कभी किसी का अपना न हुआ
युवा पीढ़ी को चाहिए बना लो गांव में भी एक ठाँव
कोरोना जैसी महामारी से जो हो गया फिर सामना
तो फिर याद आएगा अपना वही छोटा सा गांव

— रवींद्र कुमार शर्मा

*रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं जिला बिलासपुर हि प्र

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