ग़ज़ल
कहां हो, कैसे हो जैसी कुछ रस्मी बातें होती हैं
अब कहां पहले जैसी उनसे मुलाकातें होती हैं
तुमने काटीं नहीं कभी तो तुमको कैसे पता चले
सदियों से भी ज़्यादा लंबी हिज़्र की रातें होती हैं
साथ तुम्हारे मेरे सारे सावन भादों चले गए
दिल में हूक सी उठती है अब जब बरसातें होती हैं
खामोशी से सुनो कभी तुम हैरत में पड़ जाओगे
दरवाज़ों की दीवारों से क्या क्या बातें होती हैं
अश्क, अज़ियत, बेचैनी, रुसवाई भी तनहाई भी
एक इश्क की देखो तो कितनी सौगातें होती हैं
— भरत मल्होत्रा
