कविता

काया कंचन

आँखों से हिय में गया उतर,
अब मौन प्रीत हो गई मुखर।
वो छुवन दुपहरी धूप हुई,
काया कंचन-सी गई निखर।

नयनों में नूतन स्वप्न सजे,
साँसों में सुरमई साज़ बजे।
तपती दुपहरी शीतल हो,
जब संग प्रिये का रूप सजे।

धड़कन की गति पल-पल बढ़े,
चंदन-सी चाहत मन में चढ़े।
इस चंचल मन के आँगन में,
चाहत के मधुर चिराग जले।

चमकी चाहत की छाँव घनी,
हर साँस आज सर्वस्व बनी।
मीरा के मोहन मिल ही गए,
सुंदर-सी यह सांझ बनी।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com

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