वो भी क्या दिन थे
वो गाँव की मिट्टी,
वो गाँव का आँगन,
वो बचपन के सुहाने दिन,
वो अपनों का दुलार और अपनापन।
कुएँ से पानी खींचना,
आम के पेड़ पर चढ़कर आम तोड़ना,
दोस्तों के संग खेलना-कूदना,
नन्हीं नावों को पानी में छोड़ना।
बारिश की बूंदों में बेफिक्र भीगना,
मिट्टी की खुशबू में मन का महकना,
न कोई चिंता, न कोई फिक्र थी,
हर छोटी खुशी ही तब बड़ी खुशी थी।
न मोबाइल था, न कोई भागदौड़,
न रिश्तों में था कोई मन का मोड़,
वो हँसी, वो मस्ती, वो प्यारा बचपन,
आज भी ढूँढ़ता है उन्हें मेरा मन।
वो दिन लौटकर अब नहीं आएँगे,
बस यादों में आकर हमें सताएँगे,
जब भी बीते दिनों को याद करेंगे,
आँखों में नमी और होंठों पर मुस्कान लाएँगे।
सच कहूँ तो दिल आज भी यही कहता है—
वो भी क्या दिन थे,
वो भी क्या दिन थे…
जो लौटकर अब कभी नहीं आएँगे,
बस याद बनकर दिल में रह जाएँगे।
— गरिमा लखनवी
