गीत
एक आस की ज्योत जलाकर, शीश झुकाता आया हूँ,
मन के सारे अंधकार भस्म कर, धीर बँधाता आया हूँ
भोर भये जब आँखें खुलतीं, तेरी मूरत दिखती है,
जीवन की साँसों में सारी, तेरी सूरत दिखती है
जो दिया है तुमने मुझको, अर्पण करने आया हूँ
एक आस की ज्योत जलाकर, शीश झुकाता आया हूँ
मन के सारे अंधकार भस्म कर, धीर बँधाता आया हूँ
सुख-दुख की लहरें जीवन में, आती हैं और जाती हैं
जैसे बाती खुद को जलाकर, दीप उजाला लाती हैं
नित तेरे दर पर पूजा करता, दीप जलाता आया हूँ,
एक आस की ज्योत जलाकर, शीश झुकाता आया हूँ
मन के सारे अंधकार भस्म कर, धीर बँधाता आया हूँ
— अनुज मेहता
