सामाजिक

जीतने की संस्कृति में जीने की जगह बची है क्या?

दस सितंबर केवल आत्महत्या निवारण दिवस नहीं, हमारी संवेदना की परीक्षा है। हर वर्ष हम संकल्प लेते हैं, संदेश दोहराते हैं—‘दृष्टिकोण बदलो’; पर सवाल है, क्या हम उस मौन को सुनते हैं, जो संकट में घिरे मन के भीतर उठता रहता है? त्रासदी अकेले पड़े व्यक्ति में नहीं, उस भीड़ में है जो पास होकर भी उसका दर्द नहीं देखती। चमकते भारत के नीचे स्क्रीन की नीली रोशनी, अंधी प्रतिस्पर्धा, बेरोजगारी, कर्ज, टूटते रिश्ते और संस्थागत चुप्पी एक ऐसी अनदेखी थकान बुन रहे हैं, जिसका संकट अक्सर दिखाई देने से पहले ही गहरा चुका होता है। शायद निवारण की पहली शर्त यही है कि किसी के टूटने की खबर मिलने से पहले हम उसके भीतर उठती हल्की-सी दरार को पहचानना सीखें।

जब अंक विद्यार्थी की पहचान बन जाएं, तो शिक्षा के बीच से मनुष्य गायब होने लगता है। आईआईटी जैसे संस्थानों की हाल की घटनाओं को केवल परीक्षा-तनाव कह देना आसान है, पर असली सवाल इससे बड़ा है—क्या हमारी श्रेष्ठ शिक्षा-व्यवस्था श्रेष्ठ मनुष्य गढ़ रही है या केवल बेहतर प्रदर्शनकर्ता? जब मेधा अंकपत्र में सिमट जाए और मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था औपचारिकता बनकर रह जाए, तब संकट की जड़ अनदेखी ही रहती है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित राष्ट्रीय टास्क फोर्स ने समस्या की गंभीरता को राष्ट्रीय चिंता बनाया है, फिर भी मूल प्रश्न कायम है—क्या हमारी व्यवस्था विद्यार्थी से सफल होने की अपेक्षा करने से पहले उसे अपनी पीड़ा कहने की जगह देती है?

वर्दी देश की रक्षा करती है, मगर उसके भीतर धड़कता मन भी थकता है। सीआरपीएफ जैसे बलों में 2025 में दर्ज सबसे अधिक आत्महत्या की घटनाएं बताती हैं कि रक्षक भी मानसिक दबाव से अछूते नहीं। लंबी ड्यूटी, निरंतर तनाव, परिवार से दूरी और मनोवैज्ञानिक सहारे का अभाव ऐसा बोझ बन जाते हैं, जिसे केवल अनुशासन नहीं उठा सकता। राष्ट्र जवान से साहस मांगता है, तो उसे यह भरोसा भी देना होगा कि मदद मांगना कमजोरी नहीं। जांच और रिपोर्टों से आगे संस्थागत संवेदना जरूरी है; क्योंकि जो व्यवस्था अपने रक्षकों की थकान नहीं सुनती, वह केवल हथियारों और आदेशों से सुरक्षा मजबूत नहीं कर सकती।

मोबाइल ने दुनिया हथेली पर रख दी, पर मनुष्य को कई बार अपने ही भीतर से दूर कर दिया। सोशल मीडिया के चमकीले दर्पण में दूसरों की सफलता दिखती है, अपनी जद्दोजहद नहीं; यही अंतर युवा मन को लगातार तुलना में धकेलता है। बेरोजगारी, कर्ज, पारिवारिक तनाव और टूटते रिश्ते जुड़ें तो अकेलापन भावना नहीं, सामाजिक संकट बन जाता है। कर्नाटक में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को अस्पतालों से निकालकर समुदाय और पंचायतों तक ले जाने के प्रयास इसी दिशा में जरूरी कदम हैं। क्योंकि समाधान केवल विशेषज्ञ के कमरे में नहीं, समाज के बीच भी होना चाहिए। हेल्पलाइन जरूरी है, पर सबसे पहली मदद वही है—जब एक मन दूसरे मन के लिए सचमुच मौजूद हो।

सबसे खतरनाक दीवार ईंटों की नहीं, उदासीनता की होती है—‘मैंने तो कुछ देखा ही नहीं।’ मीडिया की जिम्मेदारी भी यहीं से शुरू होती है। किसी त्रासदी को सनसनी बनाना संवेदना का सौदा है, और उसे अनदेखा करना जिम्मेदारी से पलायन। पत्रकारिता को घटना के रोमांच से अधिक उसके सामाजिक कारण और असर देखने होंगे। घरों में भी संवाद सूख रहा है—हम पूछते हैं, ‘कितने अंक आए?’, ‘काम कैसा चल रहा है?’, पर कम ही पूछते हैं, ‘मन कैसा है?’ कभी मिलना-जुलना, उत्सव, सत्संग और पड़ोस का अपनापन सहारा देते थे; अब उनकी जगह अक्सर औपचारिक संदेशों ने ले ली है। टेली-मानस जैसी सेवाएं जरूरी हैं, पर घर और समाज की सुनने वाली संवेदना का कोई विकल्प नहीं।

किसी एक व्यक्ति का संकट अक्सर पूरे समाज के बिगड़ते स्वास्थ्य का संकेत होता है। उसे निजी बीमारी मान लेना वैसा ही है जैसे बुखार देखकर कारण भूल जाना। ये घटनाएं बता रही हैं कि हमें प्रतिस्पर्धा से सहयोग, अंकों से समग्र विकास और मौन से संवाद की ओर लौटना होगा। शिक्षा में मानसिक स्वास्थ्य जीवन-कौशल बने, कार्यस्थलों पर नियमित संवाद और भरोसेमंद सहायता मिले, और परिवार समझें कि हर चुप्पी शांति नहीं, हर मुस्कान सुख नहीं। केवल जागरूकता के पोस्टर नहीं, व्यवस्था का ढांचा बदलना होगा।

संकट अक्सर दस्तक देकर नहीं आता, व्यवहार की एक महीन दरार बनकर दिखता है। मित्र का अचानक अलग-थलग पड़ना, विद्यार्थी का कक्षा से कटना या सहकर्मी का असामान्य रूप से चुप हो जाना—इन्हें ‘निजी मामला’ कहकर टाल देना हमारी सामूहिक चूक है। हर समस्या का उत्तर हमारे पास हो, यह जरूरी नहीं; किसी की बात सुनने के लिए समय होना जरूरी है। बिना निर्णय सुनाए सुनना भी सहारा है। मदद मांगना कमजोरी नहीं, जीवन के प्रति जिम्मेदारी है। इसलिए निवारण किसी एक अभियान से नहीं, रोजमर्रा की संवेदना से शुरू होगा। जिस दिन कोई अपनी परेशानी कहने में शर्म नहीं, भरोसा महसूस करेगा—उसी दिन दृष्टिकोण सचमुच बदल जाएगा।

दस सितंबर की असली परीक्षा दस सितंबर को नहीं, ग्यारह सितंबर की सुबह होगी। पोस्टर उतर जाएंगे, भाषण थम जाएंगे, खबरें बदल जाएंगी—तब क्या घरों में संवाद, विद्यालयों में संवेदना, संस्थाओं में सहारा और मीडिया में जिम्मेदारी बची रहेगी? यदि नहीं, तो यह दिवस भी कैलेंडर की एक औपचारिक तारीख बनकर रह जाएगा। आत्महत्या निवारण दिवस का अर्थ एक दिन याद करना नहीं, पूरे वर्ष यह समझना है कि किसी जीवन को थामने की शुरुआत संकट की आखिरी घड़ी में नहीं, उससे बहुत पहले किसी के पास बैठ जाने से होती है। दृष्टिकोण शब्द बदलने से नहीं, मनुष्य को उसकी उपलब्धियों से पहले मनुष्य मानने से बदलता है। समाज की सबसे बड़ी संवेदना यही होगी कि वह किसी की खामोशी को ‘कुछ नहीं’ समझकर आगे न बढ़े।

— कृति आरके जैन

कृति आरके जैन

बड़वानी (मप्र) संपर्क: 79992 40375 ईमेल: kratijainemail@gmail.com

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