पर्यावरण

हवा की परीक्षा में शहर टॉप, साँसों की कॉपी कौन जाँचेगा?

लखनऊ ने करोड़-प्लस आबादी वाले शहरों में स्वच्छ वायु सर्वेक्षण का नंबर-एक तमगा हासिल कर लिया है। बधाई! अब शायद हवा भी सरकारी प्रमाणपत्र लेकर चलेगी—देखिए, मैं देश की सबसे साफ हवा हूँ। खबर खुशी देती है, मगर पीछे एक कड़वी हँसी भी सुनाई देती है। हमारे यहाँ रैंकिंग का बड़ा जलवा है। नंबर मिलते ही उपलब्धि, प्रमाणपत्र मिलते ही समस्या खत्म! लखनऊ स्वच्छ वायु का सम्राट घोषित है। मगर असली सवाल दरबार के बाहर खड़ा है—यह ताज हवा के लिए है या रिपोर्ट के लिए? नागरिक हवा साँस में भरता है, व्यवस्था उसे आंकड़ों में।

एक समय था जब शहर अपनी तहजीब, संस्कृति और पहचान से जाने जाते थे। अब महानगरों की नई पहचान है—कौन कितनी जहरीली हवा देता है। दिल्ली इस दौड़ में लंबे समय से चर्चित रही, मुंबई, कोलकाता और कानपुर भी पीछे नहीं रहे। ऐसे माहौल में लखनऊ का नंबर-एक पर पहुँचना सुखद है। विशेषज्ञों के अनुसार साफ परिवहन, धूल नियंत्रण, बेहतर कचरा प्रबंधन और हरियाली बढ़ाने के प्रयासों ने यह उपलब्धि दिलाई है। इन प्रयासों का स्वागत होना चाहिए। लेकिन सड़क पर निकलते ही एक दूसरा विशेषज्ञ मिलता है—आम नागरिक। उसकी आँखों में धूल, नाक में धुआँ और साँस में जलन है। वह पूछता है—अगर हवा सचमुच साफ हो गई है, तो मेरा अनुभव अब भी इतना धुँधला क्यों है?

सरकारों को रैंकिंग से बड़ा प्रेम है। नंबर-एक मिलते ही भाषणों के फूल खिलते हैं, कैमरे चमकते हैं और उपलब्धियों की सूची लंबी हो जाती है। लगता है, जैसे प्रदूषण ने खुद आत्मसमर्पण कर दिया हो। मगर शहर की असली परीक्षा सभागार में नहीं, रिक्शा खींचते आदमी की साँस में होती है। स्कूल जाते बच्चे के सीने में होती है। उस बुजुर्ग की सुबह की सैर में होती है, जिसे थोड़ी दूर चलते ही खाँसी घेर लेती है। सवाल सीधा है—क्या उनकी साँस अब आसान हुई? अगर नहीं, तो रैंकिंग खुशी की खबर जरूर है, पर सफलता की मुहर अभी बाकी है।

हमारी व्यवस्था की अद्भुत कला है—बीमारी मिटाने से पहले उसकी रिपोर्ट सुधार देना। आदमी बीमार हो तो दवा चाहिए, मगर थर्मामीटर बदल देने से कागज पर बुखार जरूर उतर सकता है। प्रदूषण के मामले में खतरा यही है। आंकड़े सुधरें, अच्छी बात है; मगर हवा सुधरे, असली बात यह है। जिस बच्चे को अस्थमा की दवा चाहिए, उसके सामने नंबर-एक की रैंकिंग रख देने से सीना स्वस्थ नहीं होगा। जिस माँ को बच्चे को स्कूल भेजते समय मास्क पहनाना पड़े, उसके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार कोई पदक नहीं, बच्चे की बेफिक्र साँस है। आंकड़ा तभी सार्थक है, जब उसका असर इंसान की जिंदगी में दिखे।

हरियाली बढ़ाने की घोषणाएँ हुईं, पेड़ लगाए गए। मगर सवाल है—कितने पेड़ बने और कितने सिर्फ तस्वीरों में खड़े रह गए? धूल रोकने के लिए सड़कों पर पानी छिड़का जाता है। पानी सूखते ही धूल फिर नाचने लगे तो यह इलाज नहीं, धूल को थोड़ी देर की छुट्टी है। कचरा प्रबंधन के वाहन दौड़ते हैं, मगर नाले कचरे से पटे रहें तो सफाई अधूरी है। इलेक्ट्रिक बसें प्रदूषण घटाने की अच्छी पहल हैं, लेकिन पूरा शहर ट्रैफिक जाम में फँसा हो तो समस्या सिर्फ बस के इंजन की नहीं, पूरी यातायात व्यवस्था की है। हवा साफ करनी है तो एक स्रोत नहीं, प्रदूषण की पूरी श्रृंखला पर प्रहार करना होगा।

हमने जीवन को आंकड़ों में बदलने की ऐसी आदत डाल ली है कि अब खुशहाली का सूचकांक है और हवा की भी रैंकिंग। संख्या जरूरी है, क्योंकि मापे बिना सुधार का पता नहीं चलता। मगर संख्या को जीवन का पर्याय मान लेना भूल है। लखनऊ का नागरिक अखबार में पढ़ता है कि उसके शहर की हवा नंबर-एक है और उसी सुबह धूल से बचकर सड़क पार करता है। रात को खाँसी आए तो अखबार की वह खबर गले नहीं उतरती। यहीं आंकड़े और अनुभव आमने-सामने खड़े होते हैं। शहर सेंसर और सर्वेक्षण से नहीं, उसमें बसने वाले लोगों की साँस से सचमुच साफ साबित होता है।

फिर भी लखनऊ की उपलब्धि को कमतर आँकना उचित नहीं। किसी शहर ने प्रदूषण के विरुद्ध कदम उठाए हैं तो उसकी सराहना होनी चाहिए। साफ परिवहन, धूल नियंत्रण, कचरा प्रबंधन और हरियाली की दिशा में हुए कामों को और मजबूत करना होगा। मगर नंबर-एक को मंजिल मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी। यह पुरस्कार उत्सव से अधिक जिम्मेदारी का प्रमाण बने। ताज मिल गया है तो अब उसे चमकाने से ज्यादा उसके नीचे के सिर को सुरक्षित रखने की चिंता होनी चाहिए। वरना तस्वीर वही रहेगी—सिर पर सोने का मुकुट और फेफड़ों में धूल।

स्वच्छ वायु का सबसे सच्चा सर्वेक्षण किसी कार्यालय में नहीं, हर नागरिक के सीने में होता है। जब बच्चा बिना खाँसे खुले मैदान में खेल सके, बुजुर्ग बिना साँस फूले सुबह टहल सके, मजदूर दिनभर मेहनत करके भी हवा को अपना दुश्मन न समझे—तभी मानिए लखनऊ सचमुच नंबर-एक है। रैंकिंग उपलब्धि है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू हुई है। लखनऊ ने कागज पर पहला स्थान पा लिया; अब उसे यह स्थान लोगों की साँस में दर्ज करना है। कागज की जीत पर तालियाँ बज सकती हैं, मगर दिल तभी खुश होता है जब साँस बेखौफ हो। शहर की सबसे बड़ी रैंकिंग यही है—उसके नागरिक कितनी आजादी से साँस लेते हैं।

— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

प्रो. आरके जैन 'अरिजीत'

बड़वानी (मप्र)

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