मेज़ों पर पानी का राज़
गरीब देश की ऊँची कुर्सी, अफसरशाही का अंदाज़,
जनता प्यासी, सूखे हलक, मेज़ों पर पानी का राज़।
कहीं नलों में पानी गायब, कहीं सूखें खेत-खलिहान,
कहीं घड़ों में दरारें पड़तीं, कहीं ‘बोतलों’ का सम्मान।
500 रूपये लीटर की चर्चा, बोतल कीमत आसमान,
इस देश में हर बूँद की कीमत, इतना महँगा जलपान!
चुनावों की बड़ी-बड़ी बैठक, लोकतंत्र का भारी काम,
जनता के विश्वास की खातिर, हर दिन है नया पैगाम।
ना विरोध किसी के जल का, ना किसी सुविधा से बैर,
जनता के धन का हिसाब हो और पारदर्शिता की खैर।
कुर्सी चाहे जितनी ऊँची हो, जनता से ऊँचा कोई नहीं,
सेवा-संकल्प जीवित हो, वहाँ दिखावे की जगह नहीं।
500 लीटर या पाँच बोतल, प्रश्न उठे तो जवाब भी दो,
जनता के विश्वास की खातिर, हर खर्च का हिसाब दो।
लोकतंत्र की ये पुकार है, जनता ही असली सरकार है,
पानी की हरेक बूँद बचाने में, देश का सच्चा संस्कार है!
— संजय एम तराणेकर
