कविता

अभी उड़ान बाकी है

जितना रोकना था रोक चुके,
जितना टोकना था टोक चुके,
अभी बनाना पहचान बाकी है,
बिटिया की लंबी उड़ान बाकी है।
देवी,देवता,आस्था,संस्कार,
थामे हुए थी आपकी संसार,
मान्यता,धागा,डोरी,पाखंड,
करते रहे हो उन्हें खंड-खंड,
कितनी उड़ेगी देखना एक दिन
पाने को पूरा आसमान बाकी है।
झाड़ू-पोछा,बर्तन,चूल्हा-चौका,
हर स्तर पर टोका न दे मौका,
देहरी से किंचित क्या निकला कदम,
कुत्ते चुप रहे हर बार तूने भौका,
टूटेगी जिस दिन तेरा उच्चता भाव,
गिरेगा भरभराकर तमतमाता ताव,
दुनिया के हर ग्रंथों का होगा चीरफाड़
होना स्त्री का पूरा आख्यान बाकी है।
जब तक न दोगे पूर्ण रूप से तवज्जो
उनके नजरिये से संपूर्ण समाधान बाकी है।
जितना रोकना था रोक चुके,
जितना टोकना था टोक चुके,
अभी बनाना पहचान बाकी है,
बिटिया की लंबी उड़ान बाकी है।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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