डिफॉल्ट

कुण्डलिया छंद

सोचो समझो फिर करो, अपना आज सुधार।

क्योंकि  मिलता  है  नहीं, ये तो कहीं  उधार।।

ये तो  कहीं  उधार,   हृदय  में  रखना  धीरज।

सबसे  है  आसान,   आपका  बनना  नीरज।।

कहें मित्र यमराज,  किसी को तुम मत कोंचो।

सबसे उत्तम  बात,    यही  है   प्यारे    सोचो।।१९१

जीवन के आधार से, जुड़कर रहिए आप।

नहीं  दूर  होना  कभी, होगा  भारी  पाप।।

होगा भारी पाप, समझना मुश्किल  होगा।

पूछो  उनसे  आप, दंड  इसका  हो होगा।।

कहें मित्र यमराज, बनेगा  हर पल  पावन।

जुड़े  रहे  आधार,  बने  सुखदाई  जीवन।।१९२

कोशिश मैं करता रहा, बिना किए ही आह।

जो  मेरी  चाहत  रही,   पूरी  हुई  न चाह।।

पूरी  हुई  न  चाह, बताओ क्या  है  रास्ता।

या फिर  मेरी  चाह, मानते  इतना सस्ता।।

कहें मित्र  यमराज, लगा है  कैसा  बंदिश।

नहीं मानता हार, करूँगा आगे  कोशिश।।१९३

कितना  भी  चिंतन  करें, बिन मन के हम आप।

इससे  अच्छा तो भला,   आओ  कर  लें  पाप।।

आओ  कर  लें  पाप, लाभ  निश्चित कुछ  होगा।

तब फिर हमको कौन, भला कह सकता गोगा।।

कहें  मित्र  यमराज,   करें  हम  चिंतन  जितना।

सोचो  मिलना आज,  कहाँ  से  यारों  कितना।।१९४

मोदी   योगी   राज   में,    फैल   रहा   उल्लास।

चहुँदिश में है दिख रहा, जन-मन नया प्रभास।।

जन-मन नया  प्रभास, हुए  दुश्मन  बहुत  सारे।

बेचारे       मजबूर,    देखते    दिन  में     तारे।।

कहें   मित्र  यमराज,     आज   मीडिया   ग़ोदी।

चीख   रहे   हैं   रोज,   नाम  ले   योगी  मोदी।।१९५

सच्चा होता  मौन  भी, अब  रहने  दो  यार।

हमको कुछ कहना नहीं, बंद करो तकरार।।

बंद करो तकरार, बात  को  नया  मोड़  दो।

तुमसे बढ़कर कौन, पूछना  आप छोड़ दो।।

कर इतना अहसान, समझ तू हमको बच्चा।

कहता नहीं मैं झूठ, भाव रखता  हूँ सच्चा।।१९६

नेतागीरी   खेल  में,    होता   कितना   पाप।

फिर भी गायन हो रहा, सुचिता माला जाप।।

सुचिता  माला  जाप, दिखावा  नित है होता।

पर जनमानस  खूब, रोज  दिखता है  रोता।।

भेदभाव   से   दूर,    नहीं   जाता   है   चेता।

क्योंकि   बुनते  जाल,   हमारे   प्यारे   नेता।।१९७

इसमें कहाँ विभेद है, उलझन  सबकी  एक।  

फिर सुलझाते क्यों नहीं, रखें भावना नेक।।

रखें  भावना  नेक, स्वार्थ  सबके  हैं  अपने।

देखें  सारे  लोग,  लाभ  निज  सारे  सपने।।

कहें  मित्र  यमराज, भरम इतना है किसमें।

कितना होता लाभ, देखते हम सब  इसमें।।१९८

चर्चा  चहुँदिश  हो रही, कैसी  हो  सरकार।।

सबके अपने तर्क हैं, सबके अलग  विचार।।

सबके अलग विचार, यही है  सबको करना।

जैसा किया है काम, वही तो हमको भरना।।

कहें  मित्र  यमराज,  करें हम  अपना खर्चा।

करें नहीं अब आप, और  आगे  की  चर्चा।।१९९

भूली बिसरी बात  से, भला  बचा  है  कौन।

फिर रहते हो क्यों नहीं, आप मित्रवर मौन।।

आप मित्रवर  मौन, बनो मत  इतना  ज्ञानी।

सुने कौन अब आज, सुनाते राम  कहानी।।

नहीं  समझते आप,  चढ़े हो  नाहक  शूली।

कहें मित्र  यमराज, गजब है बिसरी भूली।।२००

जिनको इतना है पता, प्रेम जगत  का सार।

सबसे ज्यादा  ही वही, करते  झूठ  प्रचार।।

करते  झूठ  प्रचार,   बने  हैं  बड़का  ज्ञानी।

जाने कितने लोग, कहें उनको अभिमानी।।

कहें मित्र यमराज, कौन क्या कहता उनको।

पड़े नहीं कुछ फर्क, शर्म ठुकराती जिनको।।२०१

कुदरत  का  संकेत  जो, उस पर  भी दो ध्यान।

इसके  आगे  व्यर्थ  है,     ज्ञान  और  विज्ञान।।

ज्ञान  और  विज्ञान,   दंभ  पड़  जाय  न  भारी।

खुद को खुद ही आप, दीजिए कल को गारी।।

कहें  मित्र  यमराज,  भले  मत  होना  सहमत।

मगर नहीं उपहास, कभी करना  तुम कुदरत।।२०२

सावन  में है  दिख  रही, हरियाली  चहुँओर।

फिर भी अब वो है नहीं,   पहले वाला शोर।।

पहले  वाला  शोर,        नहीं  है  बाग-बगीचे।

शासन  का  है  जोर, खूब  फाइल  में  सीँचें।।

कहें मित्र यमराज,  कृत्रिमता जग की पावन।

बेशक जन खुशहाल, मनाते हम सब सावन।।२०३

लहराता है  गगन  में,    अपनी  पूरी  शान। 

बना हुआ है राष्ट्र का , स्वाभिमान सम्मान।। 

स्वाभिमान  सम्मान,  तिरंगा  सबसे  प्यारा। 

हर भारतवासी कहे, यही  है प्राण  हमारा।। 

कहें मित्र यमराज, प्रगति  के गीत  सुनाता। 

विश्व झुकाता शीश, तिरंगा  जब लहराता।।२०४

सारी दुनिया  को पता, जाना  खाली हाथ। 

फिर भी रहे समेटता, मार कुण्डली साथ।।

मार  कुण्डली  साथ, हाथ जो भी आ जाए।

टपक  रही है  राल, रहें  हरदम  मुँह बाए।।

कहें  मित्र  यमराज, गजब  की  है  तैयारी। 

रखें भला क्यों याद, मूर्ख है दुनिया सारी।।२०५ 

जाता  खाली  हाथ  है,   इसमें  कैसा  रंज। 

नाहक ही हम कर रहे, इक-दूजे  पर तंज।।

इक-दूजे  पर  तंज,  सोचना  पड़ता  भारी।

बिना वजह हम आप, मुफ्त में सहते गारी।

कहें मित्र यमराज, और हमको क्या आता।

झूठी  है ये  बात, कौन  खाली  है  जाता।।२०६

अब अपनों की बात भी, कौन मानता आज।

सबको ऐसा  लग रहा, बस उनका  है राज।।

बस उनका  है राज, समय अब  ऐसा आया।

जिनका बड़ा प्रभाव, दिखाते काली काया।।

बोल बड़े अनमोल, सत्य कहता है अब कब।

समझ गये हम आज, व्यर्थ में वाणी है अब।।२०७

साधक  बैठा  ध्यान  में,    त्यागा  जग  का‌ मोह।  

नाम  सुमिर  मन एक में, मिटा  हृदय  का  द्रोह॥  

मिटा  हृदय  का  द्रोह, चैन तब  उसको  आया।  

भूख प्यास सब भूल, भजन का रस मन भाया॥  

गुरू-कृपा  से  पंथ,     कौन  बनता  है  बाधक।  

देते  प्रभु  जी  साथ,   बने  वो  सच्चा  साधक॥२०८

साधक  उठता  भोर  में,   लेकर  सेवा  भार। 

स्नान  ध्यान  के  साथ में, करे  ईश से प्यार।।

करे  ईश  से  प्यार,  प्रभो  जग पीड़ा  हरना।

भूखे  को  दे  अन्न,   कंठ  सूखे का  तरना।। 

कहें मित्र यमराज, सभी जन-मन आराधक। 

कृपा कीजिए आप, बनें सब सच्चे साधक।।२०९

चुनकर  काँटे साथ में,  चलता अपनी  राह। 

पुष्प  बिखेरे  डगर  में, व्यर्थ मानता  वाह।। 

व्यर्थ  मानता  वाह,  नहीं  करता  है  निंदा। 

लेता उतना आधार, रहे बस केवल जिंदा।। 

कहें मित्र यमराज, सुने बिन रहता सुनकर। 

जीवन  लेता  काट, मार्ग  कंटीले  चुनकर।।२१०

अपने भारत का बड़ा, आज विश्व में नाम।

फिर भी अपने लोग ही, करें  खूब  बदनाम।।

करें  खूब  बदनाम, गजब  है  इनकी  लीला।

स्वार्थ लोभ के फेर में, बोल बोलें  जहरीला।।

कहें   मित्र   यमराज, देखते   रहिए   सपने।

देख  रहा  है  देश, कौन  उसके  हैं   अपने।।२११

कहना  मानों  आप  सब, बदलो  अपना  रंग।

कुछ भी तुम करते  रहो, चलो वक्त  के संग।।

चलो  वक्त  के  संग, आज की  यही जरूरत।

नहीं  तुम्हारी  चाह,   अगर  होना  बदसूरत।।

कहें  मित्र  यमराज, समय  को मानो  गहना।

देता  नेक  सलाह,     मानना  होगा  कहना।।२१२

सबसे  मुश्किल  काम है,  कैसे  होगी  खोज।

अपनों के ही  बीच का, दुश्मन निकले रोज।।

दुश्मन  निकले रोज,  समस्या   आई   भारी।

मान   रहे   सब   लोग, बड़ी  है ये  बीमारी।।

कहें  मित्र  यमराज,  खेल  होता  है  कबसे।

रोकेगा  अब कौन, जहर पीते जब  सबसे।।२१३

दर्पण  में  निज  झाँककर, देखो  अपना  हाल।

नाहक  करना  व्यर्थ  है, प्रियवर  कोई बवाल।। 

प्रियवर  कोई  बवाल,   बात  इतनी  सी  मानो।  

फिर  करना  वो काम, आप अच्छा जो जानो।। 

कहें  मित्र  यमराज, नहीं  कुछ  करना अर्पण।।

देखो  तो इक  बार, भला  कहता  क्या दर्पण।।२१४      

अपना   दर्पण   देखना,  अच्छा   होता   यार।

जिसको इतनी समझ है, वहीं समझता सार।।

वहीं  समझता  सार, भला  इसमें  क्या बाधा। 

कहता  तुमसे  कौन,  बाँट लो  आधा-आधा।। 

कहें  मित्र  यमराज,     टूटता  सबका  सपना। 

बुद्धिमान  वे  लोग,    बना  लेते  जो  अपना।।२१५

जन-मन  हैं  कुछ  चाहते, करें  खूब  उत्पात।

स्वार्थ लोभ के  चक्र में, करें  घात-प्रतिघात।।

करें  घात-प्रतिघात,   समझना  बड़ा  जरूरी।

खुशियों की बरसात,   चाह तो  रखिए  दूरी।।

कहें  मित्र  यमराज,      घूमते  प्यारे  हर  मन।

विष से भरे विचार, जगत में कितने बहु जन।।२१६

इतना सब कुछ सह लिया, फिर भी बनें महान।

जाने    कैसी   सोच   है,   टूटा   नहीं   गुमान।।

टूटा   नहीं   गुमान,  जिसे   होता   दुख   भारी।

मजबूरी  है  नाम,  करें   क्या   जब  है   यारी।।

कहें मित्र  यमराज, नहीं  तुमको  यदि   पिटना।

सोचो  समझो आज,   मानना   होगा   इतना।।२१७

काले  बादल  गगन  में,  बरसे  जलधर  मेह।  

प्यास  धरा की बुझ  गई, भीगे  तरुवर  देह।। 

भीगे   तरुवर   देह,  गीत   कोयलिया  गाए ।  

मेंढक  करते  टर्र,      नाचता   मोर  सुहाए।। 

हरियाली  को  देख,   हर्ष  में  सब  मतवाले।  

जलधर  दे  आनंद,  मोहते   बादल   काले।।२१८

सबका  सबके  पास  है, अपना  ही  ईमान।

बिके  नहीं  बाजार  में, सभी  रहे  हैं  जान।।

सभी  रहे  हैं  जान, चेहरा   चमके   अपना।

जिसका जस ईमान, पूर्ण  हो वैसा  सपना।।

कहें मित्र  यमराज, नहीं है  निश्चित  तबका।

लोग   रहे   ईमान,   तौलते   ऐसे  सबका।।२१९

जिसको  भी  ईमान  का, होता  मालूम  भाव।

वे   सब   सहते   ही   रहे,  छोटे-मोटे   घाव।।

छोटे-मोटे   घाव,  भला   इससे   कब   डरते।

चलते  अपनी  राह,  भरोसा  खुद पर करते।।

कहें मित्र  यमराज, दोष  देते  कब  किसको।

अनपढ़ का ईमान, समझते  मूरख जिसको।।२२०

होते  हैं  अब  इन  दिनों, तरह-तरह  के खेल।

सबके अपने स्वार्थ  हैं, सबकी  अपनी  रेल।।

सबकी अपनी रेल, नहीं जन मानस  दिखता।

मजबूरी  की  मार,    बिचारा  रोता  पिसता।।

कहें  मित्र  यमराज,    उड़े  सब  उसके  तोते।

नेताओं  के  खेल,   भला  इनके  कब  होते।।२२१

सबसे  रखना  मेल  ही, आज  समय  की  माँग।

मत  कह देना  आप सब,  यह बिल्कुल है राँग।।

यह  बिल्कुल  है  राँग,    नहीं  मूरख  है  बनना।

कहें   मित्र   यमराज,   नहीं   है   प्यारे   डरना।।

कहना  जो  भी  बात,  कहो  जो  कहना  हमसे।

नाहक   नहीं   विवाद,  आप करना मत सबसे।।२२२

कलयुग दिखला है रहा, अपना असली रंग।

करते हैं अब हम सभी, आपस में ही जंग।।

आपस में ही जंग, शर्म किसको अब आती।

सबको लगता आज, हमारी ये भी थाती।।

कहें मित्र यमराज, जियो तुम प्यारे जुग-जुग।

बिगड़े बोल जनाब, नमन तुमको है कलयुग।।२२३

बच्चे  अब  पूछें  नहीं,    कैसे  भरें  उड़ान।

मातु-पिता को आज वे, देते इसका ज्ञान।।

देते   इसका  ज्ञान,     नहीं  हैं  वो  शर्माते।

मातु-पिता असहाय, मौन रह मान बचाते।।

कहें  मित्र  यमराज,   मानिए  ये   हैं  सच्चे।

लगता  जैसे  आज, नहीं  वो हम हैं  बच्चे।।२२४

मौसम के  अनुसार ही, यदि  हम  गाएँ  गीत।

हार-जीत  को  भूलकर, इसे  बना  लें  मीत।।

इसे  बना  लें  मीत,     नहीं  ये कोई   दुश्मन।

क्यों करते तकरार, स्वस्थ होगा  अपना तन।।

कहें  मित्र  यमराज, व्यर्थ  है जीवन  का ग़म।

यदि  देंगे  हम  आप,  लगेगा  प्यारा  मौसम।।२२५

फूटा  हुआ  नसीब है,  सुनता  कौन  गुहार।

सहता मार गरीब नित, बेबस अरु लाचार।।

बेबस  अरु  लाचार, भाग्य  को  अपने रोए।

घर में  नहीं  अनाज, भला खाए क्या धोए।।

कहें  मित्र  यमराज, रहा  लग  तारा  टूटा।

कहना है बेकार, कहें क्या किस्मत फूटा।।२२६

किंकर बनकर  जो रहे, प्रभु चरणन के पास।

श्रद्धा  अरु  विश्वास  से, पावे  सुखदा  रास।।

पावे  सुखदा  रास, मिटे  सब  भव की त्रासा।

राम-नाम  आधार,  सफलतम  सारी आशा।।

कहें  मित्र  यमराज, कहें  सब  सन्त निरंतर।

होते  पूरण  काज, बना  रहता  जो किंकर।।२२७

किंकर वही महान है, जिसको नहीं  गुमान।

जिसकी  होती  भावना, सेवा  धर्म महान।।

सेवा  धर्म  महान,    यही  है   सच्ची  पूजा।

अहंकार को त्याग, दिखावा  कभी न दूजा।

कहते  हैं  विद्वान,  वही  है जग में दिनकर।

बनता वही महान, श्रेष्ठ जो सच्चा किंकर।।२२८

रिश्ते अब देने लगे, बिना बात के पीर।

सोच- सोच हैरान हूँ, बहे नयन से नीर।।

बहे नयन से नीर, समस्या लगती भारी।

मुझको लगता आज, न ई फैली बीमारी।।

 कहें मित्र यमराज, पड़े  महंगी  न  किस्तें।

घाव  बने  नासूर, खत्म  हो  जाएँ   रिश्ते।।२२९

इतनी  चिंता  मत  करो, तुम  तो   हो  अंजान।

मद  में  इतना  चूर  हो,     भूल  गया  इंसान।।

भूल  गया  इंसान,    भला  कब   सोचा  हमने।

नहीं चौंकिए आप, सिखाया  मिलकर  सबने।।

कहें  मित्र  यमराज,       करें  तारीफें   कितनी।

गिनती  जाऊँ  भूल,  नहीं  आती  भी   इतनी।।२३०

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रक्षाबंधन /राखी 

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बंधन सबसे  है बड़ा, सबको  लगता  खास। 

रिश्ता भाई-बहन का, पावन और  उजास।। 

पावन और उजास, जगत को प्यारा लगता। 

होता  द्वय  को गर्व, भले  जाता  है ठगता।। 

कहें मित्र यमराज, जाय हो कितनी अनबन। 

पर  सबसे  मजबूत, बहन भाई का  बंधन।।२३१

भैया  सुनिए  बहन  की, कहे मान अधिकार। 

आप व्यर्थ करना नहीं, हमसे  अब तकरार।। 

हमसे  अब  तकरार, शपथ  बंधन  का देती। 

राखी  की   दरकार, नहीं   चाहूँ   मैं   खेती।। 

कहें   मित्र   यमराज, बनाए   रखना   छैंया। 

बहना  देखे  राह,  आप  आ  जाओ  भैया।।२३२

भाई   का   संदेश   है, बहना   सुन   तू   आज। 

राखी  का  त्योहार है, तुझ  पर  मुझको नाज।। 

तुझ पर मुझको नाज, दौड़ कर अब तू आ जा। 

रक्षाबंधन   बाँध,    आज   फिर  भैया  राजा।। 

कहें   मित्र   यमराज, बहन  जब  तू   मुस्काई। 

गर्वित   होता  नित्य, मान   देता   तव   भाई।।२३३

बंधन  जन्मों  साथ का, ईश्वर का  उपहार।

दूजा  माता  रूप  में,      बहनें  हैं  संसार।

बहनें  हैं  संसार,  साथ  है  बचपन  बीता।

लाड़-प्यार  तकरार, नेह  संबंध  न रीता।।

कहें मित्र यमराज, करें हम सब ही वंदन।

ईश्वर का उपहार, बहन भाई  का बंधन।।२३४

पावन राखी पर्व है, बहनों का अधिकार।

भ्रात कलाई साजकर, दे रक्षा का भार।।

दे रक्षा  का  भार, नहीं धागा  है  कच्चा।

इसमें  बंधा  हुआ, नेह सदा  का सच्चा।।

कहें मित्र यमराज, भाव होता मनभावन।

भाई-बहना  प्यार, सूत्र है सबसे  पावन।।२३५

रक्षाबंधन  पर्व  पर,      छाया  चहुँदिश  हर्ष।

भ्रात-बहन का  देखिए, आल्हादित  उत्कर्ष।।

खुशियों  का  उत्कर्ष, भरोसा  कभी  न  टूटे।

भैया  बहिनी  साथ, नहीं  जीवन  भर  छूटे।।

कहें  मित्र  यमराज, करूँ  मैं  प्रभु  से वंदन।

युगों -युगों  तक  रहे, अमर यह  रक्षाबंधन।।२३६

राखी बंधन  प्यार का, बहना  का  अरमान।

भ्राता भगिनी भावना, बनती उनकी शान।।

बनती  उनकी  शान, ईश की अद्भुत माया।

कच्चा  धागा  बाँध,    कामना  दूरी  छाया।

कहे  मित्र  यमराज,  बने  हैं  दोनों  साखी।

बनता  है  संबंध, जोड़कर  रखती  राखी।।२३७

राखी आई  सावनी, लेकर  खुशी  अपार।

इंतजार  में  भ्रात  के, बहन  देखती  द्वार।।

बहन देखती द्वार, हृदय में  खुशियाँ इतनी।

सजा कलाई प्रेम, कहें क्या  बातें कितनी।।

कहे मित्र यमराज,  नेह की है  यह  साखी।

भीगे द्वय की आँख, कलाई सजती राखी।।२३८

राखी  रिश्ते  जोड़ती ,      पावन  और  पवित्र।

सारी  दुनिया  देखती, इसका  अनुपम  चित्र।।

इसका अनुपम चित्र, भ्रात-भगिनी की आशा।

राखी  करती दूर, मिलन  की  सभी  निराशा।।

कहें  मित्र  यमराज,      बने  ये  नूतन  साखी।

भरती  नव  उल्लास,   बहन-भाई  में  राखी।।२३९

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रामायण 

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रामायण   का   सार   है, संस्कार   की  खान।

राम  सिया  के  नेह  में, बसता  जगत जहान।

बसता  जगत  जहान,  भरत  सा  भाई-चारा।

त्याग  तपस्या  धर्म,  ग्रंथ  है  सबको  प्यारा।।

कहें  मित्र  यमराज, पढ़े हम कर खुद अर्पण।

देती जग  को सीख, दास तुलसी  रामायण।।२४०

मानस जिस घर  में  रहे,  देती  है  सुख वास।

राम-नाम  की  ओट  में,   कोई  नहीं  उदास।

कोई  नहीं  उदास, मिले  जीवन  को  शिक्षा।

तुलसी की  चौपाई, दिशा दे  आप  परीक्षा।।

कहें  मित्र  यमराज,  हृदय  होता  है  पावस।

जो पढ़ता है नित्य, राम मय उसका मानस।।२४१

दर्पण  है  इस  ग्रंथ  में,    बढ़ता  मानव  मान।

राम  चरित  से  ही  बना, भारत  देश  महान।।

भारत  देश  महान,    लखन  के  जैसी  सेवा।

हनुमत   जैसा   भक्त, करें   रघुनंदन   सेवा।।

कहें मित्र यमराज, करें निज का  यदि अर्पण।

देख  सकें  हम आप, सामने  अपना  दर्पण।।२४२

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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