राजनीति

SC, ST, OBC वर्ग छग में आंदोलित होने के मूड में क्यों है?

छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समुदायों के भीतर पनप रहा वर्तमान असंतोष और भावी आंदोलन की रूपरेखा कोई तात्कालिक घटना नहीं है। यह इन वर्गों के अधिकारों, उनकी सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा और उनके भविष्य पर लगातार हो रहे नीतिगत व प्रशासनिक प्रहारों की परिणति है।छत्तीसगढ़ की कुल आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा इन तीन वर्गों से आता है। जल, जंगल, जमीन से लेकर सत्ता के गलियारों तक अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने के बावजूद, आज यह बहुसंख्यक समाज खुद को हाशिए पर पा रहा है।नीचे इस गंभीर मुद्दे के चारों मुख्य स्तंभों पर शोषित और वंचित वर्गों की सोच तथा उनकी पीड़ा को अभिव्यक्त करता एक विस्तृत और तार्किक लेख प्रस्तुत है:

1. छत्तीसगढ़ में SC, ST, OBC वर्ग के आक्रोश का घोषणापत्र : अधिकारों पर चोट और युवा पीढ़ी की उपेक्षा१. आरक्षण पर जानबूझकर चोट: संवैधानिक अधिकारों का क्रमिक क्षरणआरक्षण इन वर्गों के लिए कोई खैरात या गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है। यह हजारों सालों के सामाजिक अन्याय को ठीक करने और शासन-प्रशासन में आनुपातिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का एक संवैधानिक सुरक्षा कवच है। लेकिन छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ वर्षों से आरक्षण की व्यवस्था को एक राजनीतिक फुटबॉल बना दिया गया है।नीतिगत इच्छाशक्ति का अभाव: शोषित वर्गों का मानना है कि चाहे सरकार किसी भी दल की हो, आरक्षण के बढ़े हुए कोटे (जैसे ST के लिए 32%, OBC के लिए 27% और SC के लिए 13%) को कानूनी रूप से नौवीं अनुसूची में शामिल कराने या न्यायलयीन पेचीदगियों से बचाने के लिए ठोस, ईमानदार और आक्रामक पैरवी नहीं की गई।न्यायालयों में कमजोर पैरवी: जब भी आरक्षण के खिलाफ कोई याचिका दायर होती है, तो सरकारी तंत्र जानबूझकर ढुलमुल रवैया अपनाता है। पर्याप्त और वैज्ञानिक डेटा (Quantifiable Data) कोर्ट के सामने समय पर पेश नहीं किया जाता। वर्ग की सोच यह है कि यह कोई प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक ‘सुनियोजित साजिश’ है ताकि कोर्ट के आदेशों की आड़ लेकर आरक्षण को कमजोर किया जा सके।प्रतिनिधित्व का संकट: आरक्षण पर लगने वाले हर कानूनी अड़ंगे का सीधा असर युवाओं की सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में प्रवेश पर पड़ता है। इससे यह वर्ग सत्ता और प्रशासनिक मशीनरी के शीर्ष पदों से दूर होता जा रहा है।

2. पदोन्नति में आरक्षण पर चोट : उच्च पदों पर ‘काल्पनिक सीलिंग’नौकरी में प्रवेश स्तर पर आरक्षण देना एक बात है, लेकिन जब तक पदोन्नति (Promotion) में आरक्षण लागू नहीं होता, तब तक नीति-निर्माण (Policy-making) के शीर्ष स्तरों पर SC, ST और OBC अधिकारियों की संख्या नगण्य बनी रहती है।प्रशासनिक अवरोध (Red Tapism): छत्तीसगढ़ में पदोन्नति में आरक्षण का मुद्दा लगातार फाइलों और कोर्ट-कचहरी के चक्करों में उलझा हुआ है। जब निचले पदों पर बैठे आरक्षित वर्गों के कर्मचारी रिटायर होने की कगार पर पहुंच जाते हैं, तब भी उन्हें उनका जायज हक नहीं मिलता।कांच की अदृश्य दीवार (Glass Ceiling): इन वर्गों के अधिकारियों का मानना है कि प्रशासनिक तंत्र के भीतर बैठे कुछ उच्च वर्ग के मानसिकता वाले लोग नहीं चाहते कि एक दलित, आदिवासी या पिछड़ा वर्ग का व्यक्ति नीति-निर्माण के स्तर पर बैठे। जानबूझकर नियमों की ऐसी व्याख्या की जाती है जिससे पदोन्नति की प्रक्रिया लटक जाए। इसके कारण आरक्षित पदों को अक्सर ‘योग्य उम्मीदवार न मिलने’ का बहाना बनाकर ‘बैकलॉग’ में डाल दिया जाता है या सामान्य वर्ग से भर दिया जाता है।

 3.जेन जी (Gen Z) वर्ग की उपेक्षा : आकांक्षाओं और संभावनाओं का दमनआज का युवा डिजिटल युग का युवा है। वह केवल बुनियादी राशन या मुफ्त की योजनाओं पर निर्भर नहीं रहना चाहता। SC, ST, OBC की ‘जेन जी’ (Gen Z – नई पीढ़ी) शिक्षित है, जागरूक है और अपने अधिकारों के प्रति मुखर है। लेकिन वर्तमान व्यवस्था उनकी आकांक्षाओं को कुचल रही है।बेरोजगारी और पेपर लीक का दंश: छत्तीसगढ़ का युवा पिछले कई वर्षों से नियमित सरकारी भर्तियों के अभाव, सीजीपीएससी (CGPSC) और व्यापम (VYAPAM) जैसी परीक्षाओं में कथित घोटालों, भाई-भतीजावाद और बार-बार होने वाले पेपर लीक से बुरी तरह टूट चुका है। मेधावी युवाओं को साइडलाइन करके अपनों को उपकृत करने की इस प्रवृत्ति ने युवा पीढ़ी में गहरा आक्रोश भर दिया है।संविदा और आउटसोर्सिंग का जाल: सरकारें नियमित भर्तियां करने के बजाय ‘आउटसोर्सिंग’ और ‘संविदा’ (Contractual) व्यवस्था को बढ़ावा दे रही हैं। इन ठेका पद्धतियों में आरक्षण का कोई नियम लागू नहीं होता। यह नई पीढ़ी के युवाओं के साथ एक बहुत बड़ा धोखा है, जिससे उनका भविष्य पूरी तरह असुरक्षित हो गया है।गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और फेलोशिप की कमी: ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में उच्च शिक्षा की स्थिति दयनीय है। शोध (Research) के लिए मिलने वाली फेलोशिप और छात्रवृत्ति समय पर नहीं मिलती। वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए जिस आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है, वह इन युवाओं को सुलभ नहीं है।

4. TSP और SCP प्लान पर प्रशासनिक उपेक्षा : बजट का डायवर्जन और उपेक्षाट्राइबल सब-प्लान (TSP) और शेड्यूल कास्ट सब-प्लान (SCP) की परिकल्पना इसलिए की गई थी ताकि इन वर्गों के विकास के लिए आबादी के अनुपात में सीधे बजट आवंटित हो और वह पैसा सिर्फ और सिर्फ उनकी बुनियादी सुविधाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च हो। लेकिन हकीकत इसके उलट है।

बजट की हेराफेरी (Fund Diversion): छत्तीसगढ़ के मूल निवासियों और वंचितों का यह स्पष्ट आरोप है कि TSP और SCP के फंड का उपयोग उन कामों में किया जा रहा है जिनका इन वर्गों के सीधे उत्थान से कोई लेना-देना नहीं है। बड़े-बड़े बुनियादी ढांचों के निर्माण, शहरों के सुंदरीकरण और प्रशासनिक खर्चों को इन योजनाओं के मद से पूरा किया जा रहा है।

जमीनी स्तर पर शून्यता: बस्तर, सरगुजा और अन्य अनुसूचित क्षेत्रों में आज भी पीने का साफ पानी, सुसज्जित अस्पताल और बेहतर स्कूल नहीं हैं। प्रशासनिक अधिकारी इन योजनाओं को लेकर पूरी तरह उदासीन हैं। टीएसी (Tribal Advisory Council) जैसी संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक अखाड़ा बना दिया गया है, जिससे उनकी स्वायत्तता खत्म हो गई है।

निर्णय प्रक्रिया से बेदखली: इन प्लांस के क्रियान्वयन में स्थानीय समुदायों या ग्राम सभाओं की सहमति को नजरअंदाज किया जाता है, जो कि पेसा (PESA) कानून और पांचवीं अनुसूची की भावना के सीधे खिलाफ है।

निष्कर्ष : आंदोलन ही अंतिम विकल्प क्यों?छत्तीसगढ़ का बहुसंख्यक SC, ST और OBC समाज अब यह समझ चुका है कि केवल वोट बैंक बनकर रहने से उनके अधिकारों की रक्षा नहीं हो सकती। जब व्यवस्था संवाद के सारे रास्ते बंद कर देती है, जब संवैधानिक संस्थाएं मूकदर्शक बन जाती हैं और जब युवाओं का भविष्य अंधकारमय दिखने लगता है, तब सड़क पर उतरकर आंदोलन करना एक मजबूरी नहीं, बल्कि अस्तित्व की रक्षा का अनिवार्य धर्म बन जाता है।यह भावी आंदोलन सिर्फ राजनीतिक दलों के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस समूचे ‘सिस्टम’ के खिलाफ है जो बहुसंख्यकों के हक को दबाकर कुछ खास वर्गों के हितों की रक्षा में लगा हुआ है। छत्तीसगढ़ की माटी की यह हुंकार अब अपने हक,हिस्सेदारी और स्वाभिमान को वापस पाने के लिए आर-पार की लड़ाई के मूड में है।

— पूर्वी लहरे

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554