सत्ता और सियासत से कोसों दूर : वंचित समाज की अधूरी राजनीतिक भागीदारी
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी व्यापकता, विविधता और संवैधानिक समानता में निहित है। संविधान ने प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा का अधिकार दिया है। मतदान का अधिकार नागरिकों को राजनीतिक शक्ति प्रदान करता है और संसद तथा विधानमंडल जनता की संप्रभुता की संस्थागत अभिव्यक्ति हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के माध्यम से करोड़ों नागरिकों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में समान स्थान दिया। यह उपलब्धि असाधारण थी, क्योंकि अनेक ऐसे देशों में, जहाँ लोकतंत्र विकसित होने में सदियाँ लगीं, भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही सामान्य नागरिक को राजनीतिक अधिकार प्रदान कर दिया। लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक सफलता केवल इस बात से निर्धारित नहीं होती कि कितने लोग मतदान करते हैं। उसकी वास्तविक परीक्षा इस बात से होती है कि निर्णय लेने वाली संस्थाओं में किन लोगों की कितनी प्रभावी भागीदारी है, कानून बनाने वाले सदनों में समाज की विविधता कितनी दिखाई देती है, नीतियाँ बनाने वाले लोग समाज के अंतिम व्यक्ति की वास्तविक समस्याओं को कितनी गहराई से समझते हैं और जिन सामाजिक समूहों की संख्या देश की जनसंख्या में बहुत बड़ी है, उनकी आवाज सत्ता के निर्णायक गलियारों तक कितनी मजबूती से पहुँचती है। यहीं से वंचित समाज की अधूरी राजनीतिक भागीदारी का प्रश्न सामने आता है। ‘वंचित समाज’ का आशय किसी एक जाति या समुदाय से नहीं, बल्कि व्यापक रूप से उन सामाजिक समूहों से है, जो ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक अथवा राजनीतिक कारणों से अवसरों और सत्ता-संरचनाओं में अपेक्षाकृत पीछे रहे हैं। इसमें विभिन्न पिछड़े वर्गों, अत्यंत पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर समूहों की बड़ी आबादी शामिल है। विभिन्न राज्यों में इन समूहों की जनसंख्या का अनुपात अलग-अलग है और पूरे भारत के लिए किसी एक प्रतिशत को अंतिम और निर्विवाद आँकड़ा मानना उचित नहीं होगा। फिर भी यह गंभीर प्रश्न बना हुआ है कि जिन सामाजिक समूहों की जनसंख्या देश के अनेक हिस्सों में अत्यंत महत्वपूर्ण है, उनकी वास्तविक भागीदारी सत्ता के प्रत्येक महत्वपूर्ण स्तर पर उनकी सामाजिक उपस्थिति के अनुरूप क्यों नहीं दिखाई देती। लगभग आठ दशकों की लोकतांत्रिक यात्रा के बाद भी यदि कोई बड़ा सामाजिक वर्ग यह महसूस करता है कि चुनाव के समय उसकी संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन निर्णय लेने के समय उसकी आवाज अपेक्षाकृत कमजोर है, तो इस अनुभव को केवल राजनीतिक असंतोष कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह भारतीय लोकतंत्र की सामाजिक समावेशिता की परीक्षा है।
भारतीय लोकतंत्र ने सामाजिक न्याय की दिशा में अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व की संवैधानिक व्यवस्था, स्थानीय निकायों में आरक्षण, महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी, शिक्षा और रोजगार में अवसरों का विस्तार तथा विभिन्न कल्याणकारी योजनाएँ इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास रहे हैं। पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों में आरक्षण ने उन वर्गों के लिए राजनीतिक प्रवेश का नया रास्ता खोला, जो पहले सत्ता के औपचारिक ढाँचे से बहुत दूर थे। अनेक सामान्य परिवारों के लोग पंचायतों और स्थानीय संस्थाओं से राजनीति की शुरुआत करके आगे बढ़े हैं। यह लोकतंत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन स्थानीय लोकतंत्र से राष्ट्रीय और राज्य स्तर की उच्च राजनीति तक पहुँचने की यात्रा अभी भी समान रूप से खुली नहीं है। यही वह क्षेत्र है, जहाँ राज्यसभा और विधान परिषद जैसे उच्च सदनों का महत्व बढ़ जाता है। राज्यसभा भारतीय संसद का उच्च सदन है और राज्यों के प्रतिनिधित्व के साथ-साथ विधायी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विधान परिषद उन राज्यों में विधायिका का उच्च सदन है, जहाँ द्विसदनीय व्यवस्था है। इन संस्थाओं का उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि विधायी विमर्श में अनुभव, विशेषज्ञता, सामाजिक विविधता और व्यापक दृष्टिकोण को स्थान देना भी है। इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक है कि इन उच्च सदनों में भारत की सामाजिक विविधता का प्रतिबिंब कितना वास्तविक है। यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि राज्यसभा में लोकसभा की तरह प्रत्यक्ष निर्वाचन-क्षेत्र आधारित सामाजिक आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। राज्यसभा के सदस्य राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं। विधान परिषद की संरचना भी संविधान के अनुच्छेद 171 के अनुसार विभिन्न निर्वाचन और नामांकन श्रेणियों पर आधारित है। इसलिए पिछड़े वर्गों के लिए इन उच्च सदनों में लोकसभा या विधानसभा के समान सामान्य जाति-आधारित आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। लेकिन संवैधानिक आरक्षण का अभाव राजनीतिक दलों को व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व की नैतिक और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। यदि किसी समाज से चुनाव के समय वोट माँगे जाते हैं, उसकी समस्याओं को घोषणापत्र में स्थान दिया जाता है, उसके नाम पर योजनाएँ बनाई जाती हैं और उसके समर्थन को सरकार बनाने के लिए निर्णायक माना जाता है, तो उसी समाज की प्रतिभा, नेतृत्व और अनुभव को निर्णयकारी संस्थाओं में अवसर देना भी लोकतांत्रिक राजनीति की जिम्मेदारी है।
वोट बैंक और राजनीतिक भागीदारी के बीच बहुत बड़ा अंतर है। वोट बैंक वह स्थिति है, जिसमें किसी समुदाय की संख्या को चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक शक्ति में बदला जाता है, जबकि वास्तविक राजनीतिक भागीदारी वह स्थिति है, जिसमें वही समुदाय कानून निर्माण, नीति निर्धारण, संगठनात्मक निर्णय और शासन की दिशा तय करने में भी प्रभावी भूमिका निभाता है। वंचित समाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि अनेक अवसरों पर उसकी राजनीतिक शक्ति चुनाव तक सीमित कर दी जाती है। मतदान के दिन उसकी संख्या महत्वपूर्ण होती है, चुनाव प्रचार में उसका उत्साह महत्वपूर्ण होता है, राजनीतिक रैलियों में उसकी उपस्थिति महत्वपूर्ण होती है, लेकिन सरकार बनने के बाद उसके प्रतिनिधित्व और निर्णयकारी भागीदारी का प्रश्न अपेक्षाकृत पीछे चला जाता है। लोकतंत्र में नागरिक केवल वोट देने वाला व्यक्ति नहीं है; वह शासन की वैधता का स्रोत है। प्रतिनिधि केवल चुनाव जीतने वाला व्यक्ति नहीं है; वह जनता के विश्वास का संवैधानिक दायित्व निभाने वाला व्यक्ति है। इसलिए प्रतिनिधित्व का अर्थ केवल सदन में किसी व्यक्ति का बैठना नहीं है। प्रतिनिधित्व का अर्थ है जनता की समस्याओं को समझना, उन्हें नीति के स्तर पर उठाना, सरकार से जवाब माँगना और समाधान के लिए संस्थागत प्रयास करना। यदि किसी समुदाय का प्रतिनिधि सदन में मौजूद है, लेकिन शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, कृषि, सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक अवसर, कौशल विकास, उद्यमिता और प्रशासनिक अवसरों से जुड़े वास्तविक प्रश्नों को प्रभावी ढंग से सामने नहीं रखता, तो केवल उसकी उपस्थिति को पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर, एक सक्षम, संवेदनशील और ईमानदार प्रतिनिधि अपनी सामाजिक पहचान से ऊपर उठकर पूरे समाज की आवाज बन सकता है। इसलिए प्रतिनिधित्व की पहली कसौटी संख्या हो सकती है, लेकिन अंतिम कसौटी प्रभावी, नैतिक और जिम्मेदार भागीदारी ही होनी चाहिए।
वंचित समाज के सत्ता से अपेक्षाकृत दूर रहने के अनेक कारण हैं और उन्हें किसी एक राजनीतिक दल या एक समुदाय की गलती के रूप में देखना समस्या को अत्यधिक सरल बना देना होगा। पहला कारण ऐतिहासिक सामाजिक असमानता है। भारतीय समाज में लंबे समय तक शिक्षा, भूमि, आर्थिक संसाधन, सामाजिक प्रतिष्ठा, प्रशासनिक अवसर और संस्थागत शक्ति समान रूप से वितरित नहीं रहे। संविधान ने स्वतंत्रता के बाद समानता की नई नींव रखी, लेकिन सदियों की असमानता कुछ दशकों में पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकती। जिन समुदायों को पीढ़ियों तक अवसरों से दूर रखा गया, उन्हें समान स्थिति तक पहुँचने के लिए केवल कानूनी समानता नहीं, बल्कि वास्तविक अवसरों की आवश्यकता है। दूसरा कारण आर्थिक असमानता है। राजनीति में सक्रिय रहने के लिए समय, संसाधन, संगठन, यात्रा, संपर्क और अनेक प्रकार के खर्च की आवश्यकता होती है। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए वर्षों तक राजनीति में सक्रिय रहना कठिन हो सकता है, क्योंकि उसे परिवार की आजीविका, बच्चों की शिक्षा और रोजमर्रा की आवश्यकताओं से भी संघर्ष करना पड़ता है। राजनीति में बढ़ता धनबल उन प्रतिभाओं के रास्ते को कठिन बनाता है, जो आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं हैं, लेकिन जनसेवा की क्षमता रखती हैं। तीसरा कारण राजनीतिक नेटवर्क का असमान वितरण है। जिन परिवारों और सामाजिक समूहों की कई पीढ़ियों से राजनीति में उपस्थिति रही है, उनके पास नेतृत्व, संगठन, मीडिया, प्रशासन और राजनीतिक दलों के भीतर संपर्कों का मजबूत नेटवर्क होता है। पहली पीढ़ी के राजनीतिक कार्यकर्ता को उसी स्तर तक पहुँचने के लिए कई गुना अधिक संघर्ष करना पड़ सकता है। चौथा कारण परिवारवाद है। परिवारवाद किसी एक दल की समस्या नहीं है; अलग-अलग राजनीतिक दलों में अलग-अलग रूपों में इसका प्रभाव दिखाई देता है। राजनीतिक परिवार से आने वाले योग्य व्यक्ति को अवसर मिलना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन यदि राजनीतिक अवसर लगातार कुछ परिवारों तक सीमित होते जाएँ और सामान्य कार्यकर्ता के लिए ऊपर उठने की राह बंद हो जाए, तो लोकतंत्र की सामाजिक गतिशीलता कमजोर होती है। पाँचवाँ कारण शिक्षा और राजनीतिक प्रशिक्षण की कमी है। राजनीति केवल भाषण देने, भीड़ जुटाने और चुनाव जीतने का नाम नहीं है। एक प्रभावी जनप्रतिनिधि को संविधान, कानून, बजट, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक वित्त, प्रशासन, संसदीय प्रक्रिया, सामाजिक नीति तथा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की समझ होनी चाहिए। इसलिए शिक्षा केवल नौकरी प्राप्त करने का साधन नहीं है; शिक्षा सत्ता की भाषा समझने की कुंजी भी है। जिस समाज के पास ज्ञान होगा, वह अपने अधिकारों को बेहतर समझेगा, अपने प्रतिनिधियों से बेहतर प्रश्न पूछेगा और सरकार के सामने वैकल्पिक नीति भी रख सकेगा।
छठा कारण सामाजिक विभाजन है। बड़े सामाजिक समूह अनेक छोटी जातियों, उपजातियों, क्षेत्रों और स्थानीय पहचानों में विभाजित हैं। यदि ये समूह एक-दूसरे को स्थायी राजनीतिक प्रतिस्पर्धी मानते रहें और व्यापक सामाजिक हित के लिए साझा मंच विकसित न कर पाएँ, तो उनकी सामूहिक शक्ति कमजोर हो जाती है। लेकिन सामाजिक एकता का अर्थ अपनी पहचान मिटाना नहीं है। भारत की विविधता उसकी शक्ति है। अलग-अलग समुदायों की अपनी पहचान, इतिहास और सांस्कृतिक परंपराएँ हैं। आवश्यकता इन पहचानों को समाप्त करने की नहीं, बल्कि उन्हें संवैधानिक समानता, सामाजिक सम्मान और साझा नागरिकता के सूत्र में जोड़ने की है। वंचित समाज की राजनीति यदि केवल जातीय प्रतिद्वंद्विता में बदल जाएगी, तो वह अपनी व्यापक शक्ति खो सकती है। उसे अधिकार चाहिए, लेकिन अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी चाहिए। उसे प्रतिनिधित्व चाहिए, लेकिन प्रतिनिधित्व के साथ योग्यता भी चाहिए। उसे सत्ता चाहिए, लेकिन सत्ता के साथ संवैधानिक मर्यादा भी चाहिए। यही लोकतांत्रिक परिपक्वता है। किसी व्यक्ति का किसी वंचित समुदाय से होना उसे स्वतः अच्छा प्रतिनिधि नहीं बनाता। प्रतिनिधि का चरित्र, योग्यता, ईमानदारी, सार्वजनिक जीवन की शुचिता, संवैधानिक प्रतिबद्धता और सभी नागरिकों के प्रति समान दृष्टिकोण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए वंचित समाज को अपने बीच से ऐसे नेतृत्व को आगे बढ़ाना होगा, जो अपनी जड़ों से जुड़ा हो, लेकिन संकीर्ण न हो; अपने समुदाय के अधिकारों की बात करे, लेकिन दूसरे समुदायों के अधिकारों का भी सम्मान करे; सत्ता प्राप्त करे, लेकिन सत्ता को निजी संपत्ति न समझे। जातीय पहचान राजनीतिक प्रवेश का आधार हो सकती है, लेकिन सुशासन की अंतिम कसौटी नहीं। यही अंतर अधिकार की राजनीति और जिम्मेदार लोकतांत्रिक राजनीति के बीच है।
अब प्रश्न यह है कि सुधार का रास्ता क्या हो। सबसे पहला सुधार राजनीतिक दलों के भीतर होना चाहिए। राजनीतिक दलों को उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, लोकतांत्रिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील बनाना चाहिए। राज्यसभा, विधान परिषद, विधानसभा, संगठनात्मक पदों और महत्वपूर्ण समितियों में सामाजिक विविधता को गंभीरता से ध्यान में रखा जाना चाहिए। केवल चुनाव जीतने की संभावना को उम्मीदवार चयन की एकमात्र कसौटी नहीं बनाया जाना चाहिए। दूसरा महत्वपूर्ण सुधार राज्यसभा और विधान परिषद के उम्मीदवार चयन से जुड़ा है। उच्च सदनों को राजनीतिक पुनर्वास का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए। केवल इसलिए किसी व्यक्ति को उच्च सदन में भेजना उचित नहीं कि वह चुनाव हार गया है, किसी प्रभावशाली व्यक्ति का निकट सहयोगी है या किसी राजनीतिक परिवार से संबंधित है। उच्च सदनों में ऐसे लोग होने चाहिए, जिनमें विधायी क्षमता, प्रशासनिक अनुभव, सामाजिक संवेदनशीलता, आर्थिक समझ, कानूनी ज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शिक्षा, साहित्य, सार्वजनिक सेवा या अन्य क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान हो। यदि ऐसे योग्य व्यक्तियों की पृष्ठभूमि वंचित समाज से आती है, तो उन्हें अवसर देने में राजनीतिक दलों को संकोच नहीं करना चाहिए। तीसरा सुधार राजनीतिक दलों के संगठनात्मक ढाँचे में होना चाहिए। सामाजिक प्रतिनिधित्व केवल चुनावी टिकट तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के पार्टी संगठन में भी विविध सामाजिक समूहों को वास्तविक जिम्मेदारी मिलनी चाहिए। संगठनात्मक जिम्मेदारी भविष्य के नेतृत्व की प्रयोगशाला होती है। चौथा सुधार राजनीतिक प्रशिक्षण का होना चाहिए। वंचित और ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवाओं के लिए संविधान, संसदीय प्रक्रिया, सार्वजनिक नीति, बजट, कानून और प्रशासन पर नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम होने चाहिए। विश्वविद्यालयों, राजनीतिक दलों और सामाजिक संस्थाओं को मिलकर लोकतांत्रिक नेतृत्व निर्माण की ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, जिसमें प्रतिभाशाली युवा राजनीति को केवल संघर्ष और शक्ति के क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, नीति और जनसेवा के क्षेत्र के रूप में देखें।
पाँचवाँ सुधार चुनावी वित्त व्यवस्था में होना चाहिए। यदि राजनीति अत्यधिक महँगी होती जाएगी, तो आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभाएँ स्वतः पीछे छूटती जाएँगी। राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता, चुनावी वित्त का बेहतर नियमन और चुनावी खर्च की प्रभावी निगरानी लोकतंत्र को अधिक समावेशी बना सकती है। छठा सुधार राजनीतिक दलों के आंतरिक लोकतंत्र का होना चाहिए। राजनीतिक दल स्वयं लोकतांत्रिक होंगे, तभी वे लोकतांत्रिक समाज को मजबूत कर पाएँगे। पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता, संगठनात्मक चुनाव, कार्यकर्ताओं की भागीदारी और नेतृत्व के लिए अवसरों की व्यापकता नए सामाजिक नेतृत्व को जन्म दे सकती है। सातवाँ सुधार परिवारवाद के प्रभाव को संतुलित करने का होना चाहिए। राजनीतिक परिवारों से आने वाले योग्य व्यक्तियों को अवसर मिलना लोकतांत्रिक रूप से निषिद्ध नहीं है, लेकिन अवसर केवल परिवार के कारण नहीं मिलना चाहिए। एक सामान्य कार्यकर्ता, जिसने वर्षों तक जनता के बीच काम किया है, उसे भी नेतृत्व तक पहुँचने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए। आठवाँ सुधार शिक्षा से जुड़ा होना चाहिए। वंचित समाज के राजनीतिक सशक्तीकरण का सबसे मजबूत आधार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा है। शिक्षा में केवल डिग्री नहीं, बल्कि आलोचनात्मक सोच, संवैधानिक चेतना, डिजिटल साक्षरता, आर्थिक समझ और नागरिक जिम्मेदारी भी शामिल होनी चाहिए। नौवाँ सुधार महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का होना चाहिए। वंचित समुदायों की महिलाओं को राजनीति में पर्याप्त स्थान दिए बिना सामाजिक प्रतिनिधित्व अधूरा रहेगा। स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी ने एक नया नेतृत्व तैयार किया है। उस नेतृत्व को जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आगे बढ़ने के अवसर मिलने चाहिए। दसवाँ सुधार युवा नेतृत्व को लेकर होना चाहिए। युवाओं को केवल रैलियों की भीड़, सोशल मीडिया प्रचार या चुनावी कार्यकर्ता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्हें नीति निर्माण, संगठन, शोध, राजनीतिक संवाद और निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भूमिका मिलनी चाहिए।
ग्यारहवाँ सुधार विश्वसनीय सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक आँकड़ों से जुड़ा होना चाहिए। यदि हमें यह स्पष्ट रूप से पता ही न हो कि किन सामाजिक समूहों की किन संस्थाओं में कितनी भागीदारी है, तो सामाजिक न्याय की नीतियों का वैज्ञानिक मूल्यांकन कठिन हो जाएगा। इसलिए जहाँ उचित और विधिसम्मत हो, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, शिक्षा, रोजगार और संस्थागत प्रतिनिधित्व से संबंधित विश्वसनीय आँकड़ों के आधार पर नीति निर्माण को मजबूत किया जाना चाहिए। बारहवाँ सुधार यह होना चाहिए कि प्रतिनिधित्व की चर्चा केवल जाति तक सीमित न हो। क्षेत्रीय, लैंगिक, आर्थिक, ग्रामीण-शहरी, पेशागत और शैक्षिक विविधता भी लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का हिस्सा है। भारत की सामाजिक संरचना बहुआयामी है, इसलिए उसका प्रतिनिधित्व भी बहुआयामी होना चाहिए। तेरहवाँ सुधार उच्च सदनों की गरिमा से संबंधित होना चाहिए। राज्यसभा और विधान परिषद को राजनीतिक पुरस्कार, पुनर्वास या केवल चुनावी गणित का मंच बनने से बचाना होगा। उच्च सदनों में ऐसे व्यक्तियों का प्रवेश होना चाहिए, जो गंभीर बहस कर सकें, विधेयकों का विश्लेषण कर सकें, सरकार से प्रश्न पूछ सकें और सार्वजनिक नीति को बेहतर बनाने में योगदान दे सकें। चौदहवाँ सुधार नेतृत्व की दूसरी और तीसरी पंक्ति तैयार करने का होना चाहिए। कोई भी समाज केवल एक नेता या एक परिवार पर निर्भर रहकर स्थायी राजनीतिक शक्ति नहीं बन सकता। नेतृत्व का विकेंद्रीकरण आवश्यक है। गाँव, पंचायत, नगर, जिला, विश्वविद्यालय और सामाजिक संगठनों से नए नेतृत्व को तैयार करना होगा। पंद्रहवाँ सुधार राजनीतिक जवाबदेही का होना चाहिए। वंचित समाज को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि हमारे कितने प्रतिनिधि हैं; उसे यह भी पूछना चाहिए कि हमारे प्रतिनिधियों ने कितने प्रश्न उठाए, कितनी बहसों में भाग लिया, कितनी समितियों में सक्रिय भूमिका निभाई, कितने जनहित के मुद्दे सामने रखे और कितनी नीतिगत पहल में योगदान दिया। यही वास्तविक राजनीतिक मूल्यांकन है।
वंचित समाज के राजनीतिक सशक्तीकरण के साथ उसकी अपनी जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। केवल राजनीतिक दलों को दोष देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। समाज को अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित करना होगा। उन्हें प्रशासन, न्याय, कानून, अर्थव्यवस्था, तकनीक, मीडिया, अनुसंधान, उद्यमिता और राजनीति—हर क्षेत्र में आगे बढ़ाना होगा। राजनीति में जाने वाले युवाओं को संविधान पढ़ना होगा, संसदीय प्रक्रिया समझनी होगी, बजट समझना होगा, कानून समझना होगा, अर्थव्यवस्था समझनी होगी, प्रशासन समझना होगा और सबसे महत्वपूर्ण, जनता की वास्तविक समस्याओं को समझना होगा। जिस समाज के पास केवल संख्या है, उसकी शक्ति सीमित हो सकती है। जिस समाज के पास संख्या के साथ ज्ञान, संगठन और नैतिक नेतृत्व है, उसकी शक्ति को लंबे समय तक नजरअंदाज करना कठिन है। इसलिए वंचित समाज की वास्तविक राजनीतिक मुक्ति का रास्ता शिक्षा, संगठन और संवैधानिक चेतना से होकर जाता है। राजनीतिक सशक्तीकरण का अर्थ केवल अपने समुदाय के लोगों को सत्ता में भेजना भी नहीं है। लोकतंत्र में प्रत्येक प्रतिनिधि पूरे निर्वाचन क्षेत्र और अंततः पूरे संविधान के प्रति उत्तरदायी है। हमें ऐसे प्रतिनिधियों की आवश्यकता है, जो अपने समुदाय की पीड़ा को समझें, लेकिन पूरे समाज के प्रति न्याय करें; जो अपने अधिकारों की बात करें, लेकिन दूसरों के अधिकारों का सम्मान करें; जो सामाजिक न्याय की माँग करें, लेकिन सामाजिक घृणा को अस्वीकार करें; जो सत्ता प्राप्त करें, लेकिन सत्ता के अहंकार से बचें। यही लोकतंत्र का उच्चतम आदर्श है।
वंचित समाज को अपने भीतर आत्मालोचना का साहस भी रखना होगा। यदि उसका कोई प्रतिनिधि सत्ता में पहुँचकर जनता से दूर हो जाता है, परिवारवाद को बढ़ावा देता है, भ्रष्टाचार में लिप्त होता है या केवल अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक शक्ति बढ़ाता है, तो उसकी आलोचना केवल इसलिए नहीं रोकी जानी चाहिए कि वह वंचित समुदाय से आता है। समुदाय की प्रतिष्ठा किसी व्यक्ति को जवाबदेही से मुक्त नहीं कर सकती। बल्कि वंचित समाज के प्रतिनिधियों से अपेक्षा अधिक होनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने जिस सामाजिक संघर्ष की पृष्ठभूमि से यात्रा शुरू की है, उससे उन्हें लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का अधिक गहरा बोध होना चाहिए। राजनीति में संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन संख्या के साथ नैतिकता और क्षमता जुड़ जाए, तो वही संख्या परिवर्तनकारी शक्ति बनती है। इसलिए वंचित समाज को अपने राजनीतिक आंदोलन को केवल ‘हम कितने हैं’ के प्रश्न से आगे ले जाकर ‘हम क्या कर सकते हैं’ के प्रश्न तक पहुँचाना होगा। यह परिवर्तन अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि केवल जनसंख्या का बड़ा होना राजनीतिक शक्ति की गारंटी नहीं है। संगठित, शिक्षित, जागरूक और दूरदर्शी समाज ही अपनी जनसंख्या को वास्तविक लोकतांत्रिक शक्ति में बदल सकता है। इसी प्रकार राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि किसी बड़े सामाजिक समूह को केवल चुनावी गणित के रूप में देखना लोकतंत्र की संभावनाओं को सीमित करता है। वह समूह प्रतिभा है, श्रम है, नागरिक शक्ति है और राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण साझेदार है। उसकी भागीदारी जितनी व्यापक होगी, भारत का लोकतंत्र उतना ही व्यापक होगा।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व को विकास की नीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता। सामाजिक न्याय का एक महत्वपूर्ण आयाम राजनीतिक आवाज है। जिस नागरिक की आवाज निर्णय प्रक्रिया में नहीं सुनी जाती, उसकी आर्थिक और सामाजिक समस्याओं के समाधान की संभावना भी कमजोर हो सकती है। यदि किसी ग्रामीण विद्यालय में शिक्षक की कमी है, यदि युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा, यदि छोटे किसान बाजार और सिंचाई की समस्याओं से जूझ रहे हैं, यदि गरीब परिवार गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा से वंचित हैं या यदि उच्च शिक्षा तक पहुँच में आर्थिक बाधाएँ हैं, तो ये केवल अलग-अलग परिवारों की समस्याएँ नहीं हैं; ये शासन की गुणवत्ता की परीक्षा हैं। इसलिए वंचित समाज की वास्तविक राजनीतिक भागीदारी का अर्थ यह है कि उसकी समस्याएँ स्थानीय शिकायत से निकलकर राज्य और राष्ट्रीय नीति का विषय बनें। एक ग्रामीण पृष्ठभूमि का व्यक्ति कृषि की समस्या को जिस तरह समझ सकता है, वह अनुभव नीति निर्माण में उपयोगी हो सकता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आया व्यक्ति शिक्षा और स्वास्थ्य की लागत को अलग दृष्टि से देख सकता है। पहली पीढ़ी का शिक्षित युवा प्रतियोगी परीक्षाओं, छात्रवृत्तियों और उच्च शिक्षा तक पहुँच की वास्तविक बाधाओं को अधिक स्पष्टता से सामने रख सकता है। इसलिए सामाजिक विविधता केवल पहचान का प्रश्न नहीं है; यह नीति की गुणवत्ता का भी प्रश्न है। इसी कारण राज्यसभा और विधान परिषद जैसे मंचों पर विविध सामाजिक अनुभवों की उपस्थिति लोकतांत्रिक विमर्श को समृद्ध कर सकती है।
फिर भी प्रतिनिधित्व का अर्थ यह नहीं कि केवल संख्या पूरी कर दी जाए और गुणवत्ता की उपेक्षा कर दी जाए। हमें संख्या और गुणवत्ता के बीच झूठा विरोध खड़ा करने से बचना होगा। वंचित समाज में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। कमी यदि कहीं है, तो अवसर, संस्थागत समर्थन और राजनीतिक मार्गदर्शन की है। इसलिए सुधार का उद्देश्य प्रतिभा खोजने से अधिक प्रतिभा को अवसर देने की व्यवस्था बनाना होना चाहिए। राजनीतिक दल यदि अपने संगठन में प्रतिभा की पहचान करने की प्रक्रिया विकसित करें, तो अनेक ऐसे युवा सामने आ सकते हैं, जो वर्षों से जनता के बीच काम कर रहे हैं, लेकिन शीर्ष नेतृत्व की नजर तक नहीं पहुँच पाए हैं। राजनीति में भी सामाजिक गतिशीलता आवश्यक है। जो व्यक्ति आज पंचायत में काम कर रहा है, वह कल जिला स्तर पर नेतृत्व कर सके; जो जिला स्तर पर सफल है, वह विधानसभा या विधान परिषद तक पहुँच सके; जो विधायक बन चुका है, वह सांसद बने, उससे भी आगे जाकर मंत्री मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री बने। इस ओर प्रयास होना चाहिए।
— डॉ. अशोक कुमार शर्मा
