भारत की तंबाकू नियंत्रण नीति में है बड़ी खामी
भारत में तंबाकू नियंत्रण के सामने अब एक नई चुनौती खड़ी हो रही है। बाजार में ऐसे निकोटिन पाउच तेजी से दिखाई देने लगे हैं, जिनमें तंबाकू की पत्ती नहीं होती, लेकिन निकोटिन मौजूद रहता है। छोटे और आसानी से इस्तेमाल किए जा सकने वाले ये पाउच अलग-अलग स्वादों में उपलब्ध हैं। इन्हें दुकानों के साथ-साथ ऑनलाइन भी बेचा जा रहा है। एक अध्ययन में ऐसे निकोटिन पाउच देश के 10 में से 7 शहरों में पाए गए। इनमें निकोटिन की मात्रा भी काफी अधिक थी। इससे साफ है कि यह केवल भविष्य की समस्या नहीं है, बल्कि भारत के बाजार में इसकी मौजूदगी बढ़ रही है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि तंबाकू न होने के कारण मौजूदा कानूनों में इन उत्पादों की सही जगह स्पष्ट नहीं है। भारत में तंबाकू नियंत्रण के लिए मुख्य कानून सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम यानी सीओटीपीए, 2003 है। यह कानून मुख्य रूप से उन उत्पादों पर लागू होता है जिनमें तंबाकू मौजूद है। इसलिए तंबाकू-मुक्त निकोटिन पाउच को सीधे सीओटीपीए के तहत रखना आसान नहीं है। यही कानूनी खामी कंपनियों और विक्रेताओं के लिए रास्ता खोल सकती है।
सीओटीपीए के तहत तंबाकू उत्पादों के विज्ञापन, नाबालिगों को बिक्री, पैकेजिंग और स्वास्थ्य चेतावनी जैसे कई नियम हैं। लेकिन यदि किसी उत्पाद में तंबाकू की जगह केवल निकोटिन है तो सवाल उठता है कि उस पर यही नियम किस आधार पर लागू किए जाएं। कानून को केवल उसकी भावना के आधार पर नहीं चलाया जा सकता। प्रशासन यह मानकर किसी नए उत्पाद को पुराने कानून में नहीं ला सकता कि उसका स्वास्थ्य पर प्रभाव समान है। इसके लिए स्पष्ट कानूनी आधार जरूरी है।
कुछ लोग निकोटिन पाउच को इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट निषेध अधिनियम, 2019 के तहत नियंत्रित करने की बात कर सकते हैं। लेकिन यह रास्ता भी आसान नहीं है। ई-सिगरेट ऐसे उपकरण हैं जिनमें किसी पदार्थ को गर्म करके एरोसोल बनाया जाता है। निकोटिन पाउच में न तो कुछ जलाया जाता है और न ही एरोसोल बनाया जाता है। इसे केवल इसलिए ई-सिगरेट मान लेना कि दोनों में निकोटिन होता है, कानूनी रूप से कमजोर तर्क हो सकता है। इसलिए सरकार को इस बारे में स्पष्ट कानूनी व्यवस्था बनाने की जरूरत है।
खाद्य सुरक्षा कानून के तहत खाद्य पदार्थों में तंबाकू और निकोटिन के इस्तेमाल पर रोक है। लेकिन हर ऐसी चीज जिसे मुंह में रखा जाता है, जरूरी नहीं कि वह कानूनी रूप से खाद्य पदार्थ भी हो। निकोटिन पाउच का इस्तेमाल मुंह में किया जाता है, लेकिन इससे वह अपने आप खाद्य पदार्थ नहीं बन जाता। इसलिए केवल खाद्य सुरक्षा कानून के सहारे इनके पूरे बाजार को नियंत्रित करना भी आसान नहीं होगा। अलग-अलग कानूनों के बीच स्पष्टता और आपसी तालमेल जरूरी है।
निकोटिन का इस्तेमाल कुछ चिकित्सकीय उत्पादों में भी होता है। उदाहरण के लिए निकोटिन गम और पैच जैसे उत्पाद धूम्रपान छोड़ने में मदद के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं और इन पर औषधि संबंधी नियम लागू होते हैं। इसलिए सरकार को निकोटिन पाउच की प्रकृति और उनके दावों के आधार पर यह स्पष्ट करना चाहिए कि कोई उत्पाद चिकित्सकीय उपयोग का है या केवल मनोरंजक इस्तेमाल के लिए बाजार में लाया गया है। हर निकोटिन उत्पाद को दवा मान लेना सही नहीं होगा और हर उत्पाद को दवा के दायरे से बाहर रखना भी उचित नहीं होगा।
हाल में निकोटिन पाउच की बिक्री को लेकर मुंबई हवाई अड्डे की ड्यूटी-फ्री दुकानों का मामला भी सामने आया। इससे पता चलता है कि इन उत्पादों की कानूनी स्थिति को लेकर सरकार और कारोबारियों के बीच भ्रम पैदा हो सकता है। ऐसे मामलों में केवल कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। सरकार को यह भी स्पष्ट करना होगा कि किस कानून के तहत कार्रवाई की जा रही है और उसकी कानूनी सीमा क्या है।
सरकार को इस मामले में जल्दबाजी में ऐसा आदेश नहीं निकालना चाहिए जो बाद में अदालत में टिक न पाए। सबसे पहले यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किन परिस्थितियों में निकोटिन युक्त मौखिक उत्पादों को दवा माना जाएगा और किन परिस्थितियों में नहीं। इसके लिए वैज्ञानिक प्रमाण और मौजूदा कानून दोनों को आधार बनाया जाना चाहिए। साथ ही निकोटिन पाउच के आयात पर भी सख्ती की जरूरत है। सीमा शुल्क, विदेश व्यापार महानिदेशालय और औषधि नियामकों के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए, ताकि बिना उचित अनुमति के आने वाली खेपों पर प्रभावी कार्रवाई की जा सके।
स्वास्थ्य मंत्रालय, औषधि नियामक, खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण, सीमा शुल्क और राज्य स्तर के संबंधित विभागों के बीच भी एक साझा व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। अभी अलग-अलग विभागों के बीच जिम्मेदारी को लेकर अस्पष्टता दिखाई देती है। इसका फायदा कारोबारी उठा सकते हैं। यदि किसी उत्पाद की कानूनी स्थिति ही स्पष्ट नहीं होगी तो उसका प्रभावी नियमन कैसे होगा, यह सवाल स्वाभाविक है।
ऑनलाइन बिक्री पर भी विशेष ध्यान देना होगा। आज कोई भी नया उत्पाद केवल बाजार की दुकानों तक सीमित नहीं रहता। ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स के माध्यम से वह कुछ ही घंटों में उपभोक्ता तक पहुंच सकता है। इसलिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बेचने से पहले उत्पाद की कानूनी स्थिति, विक्रेता की जानकारी और आयु सत्यापन जैसी व्यवस्थाएं जरूरी होनी चाहिए। बिना अनुमति या स्पष्ट कानूनी स्थिति वाले उत्पादों को ऑनलाइन बिक्री से हटाने की व्यवस्था भी प्रभावी होनी चाहिए।
युवाओं को इन उत्पादों से बचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए स्पष्ट स्वास्थ्य चेतावनी, न्यूनतम आयु सीमा, बच्चों से सुरक्षित पैकेजिंग और युवाओं को आकर्षित करने वाले स्वाद तथा विज्ञापन पर नियंत्रण जैसे उपाय जरूरी हैं। लेकिन इन सभी उपायों का आधार मौजूदा कानून होना चाहिए। सरकार केवल कार्यकारी आदेश के माध्यम से ऐसा नया कानून नहीं बना सकती जो संसद के अधिकार क्षेत्र में आता हो।
सरकार के तत्काल कदम जरूरी हैं, लेकिन वे स्थायी समाधान नहीं हैं। स्थायी समाधान संसद को करना होगा। सीओटीपीए में संशोधन किया जा सकता है या निकोटिन उत्पादों के लिए एक नया व्यापक कानून बनाया जा सकता है। ऐसे कानून में अलग-अलग निकोटिन उत्पादों के लिए अलग श्रेणियां बनाई जा सकती हैं, जैसे ज्वलनशील तंबाकू, धुआंरहित तंबाकू, ई-सिगरेट, मौखिक निकोटिन पाउच और चिकित्सकीय निकोटिन उत्पाद। इससे कानून केवल इस बात पर निर्भर नहीं रहेगा कि किसी उत्पाद में तंबाकू की पत्ती है या नहीं, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि वह शरीर में निकोटिन किस तरह पहुंचाता है और उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है।
यह भी जरूरी है कि सभी निकोटिन उत्पादों को एक ही नजर से न देखा जाए। चिकित्सकीय निकोटिन गम और मनोरंजन के लिए इस्तेमाल होने वाले निकोटिन पाउच को समान श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। कानून को उत्पाद के जोखिम और उसके उपयोग के आधार पर अलग-अलग नियम बनाने चाहिए। साथ ही व्यावसायिक कंपनियों को यह छूट भी नहीं मिलनी चाहिए कि वे केवल तंबाकू की पत्ती हटाकर किसी नए उत्पाद को मौजूदा तंबाकू कानूनों से बाहर कर दें।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तंबाकू-मुक्त का अर्थ जोखिम-मुक्त नहीं है। निकोटिन नशे की लत पैदा करता है। खासकर युवाओं और पहली बार निकोटिन लेने वाले लोगों के लिए इसके प्रभाव को हल्के में नहीं लिया जा सकता। आकर्षक स्वाद, पैकेजिंग और ऑनलाइन प्रचार युवाओं को इन उत्पादों की ओर आकर्षित कर सकते हैं। इसलिए जनस्वास्थ्य की चिंता को कानून की स्पष्टता के साथ जोड़ना जरूरी है।
भारत को न तो इस मामले में अनावश्यक घबराहट की जरूरत है और न ही आंखें बंद करके बैठने की। तत्काल जरूरत है कि सरकार मौजूदा कानूनों के तहत आयात, लाइसेंसिंग, वर्गीकरण और ऑनलाइन बिक्री पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करे। साथ ही संसद को ऐसी कानूनी व्यवस्था बनानी चाहिए जो भविष्य में आने वाले नए निकोटिन उत्पादों पर भी लागू हो सके।
कानून में खामी का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि बाजार को खुला छोड़ दिया जाए। लेकिन यह भी सच है कि सरकारी अधिसूचना संसद द्वारा बनाए जाने वाले कानून का विकल्प नहीं हो सकती। आज जरूरत ऐसे कानून की है जो बदलती तकनीक और बदलते बाजार के साथ कदम मिलाकर चले। निकोटिन का रूप बदल सकता है, उसका बाजार बदल सकता है, लेकिन उसकी लत का खतरा बना रहता है। इसलिए जरूरी है कि कानून बनने का इंतजार करते हुए सरकार अपनी मौजूदा कानूनी शक्तियों का सही इस्तेमाल करे और संसद भविष्य के लिए स्पष्ट, व्यापक और प्रभावी निकोटिन नियंत्रण कानून बनाए।
– डॉ. सत्यवान सौरभ
