भाजपा और मोदी – नए युग का भस्मासुर
गाँवों में एक कहावत है—“ये लकड़ी क्यों पड़ी हो झाड़ में? आ जाओ, घुस जाओ मेरी आंत में।” मोदी जी वही कर रहे हैं, वो भी एक बार नहीं, बल्कि एक के बाद एक। कुछ तो ऐसा हुआ है भाजपा में कि मोदी भाजपा को खत्म कर देना चाहते हैं अपने कुकर्मों से, लेकिन क्या हुआ है, ये पता लगाने वाली बात है।
देश की कोई भी पार्टी हो, वो अपने कोर वोटरों का ख्याल जरूर रखती है। नहीं भी रखती है तो कम से कम ध्यान तो अवश्य ही रखती है। भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी है जो अपने कोर और पारंपरिक वोट बैंक को जूते पर रखती है, सिर्फ जूते पर ही नहीं रखती, बल्कि समय-समय पर उन्हें अपमानित भी करती है। भाजपा इकलौती पार्टी है जो अपने कोर वोटरों को taken for granted लेती है।
2014 के पहले तमाम सोशल मीडिया एक्टिविस्ट, जो भाजपाई थे भी नहीं और न ही उनका पार्टी से कोई लेना-देना था, वे एकमात्र हर जगह इनके लिए बोल रहे थे, लिख रहे थे कि भाजपा सत्ता में आ जाए और कांग्रेस के एकतरफा तुष्टिकरण से मुक्ति मिले। और भाजपा सत्ता में आई भी। सब जाति-पाति तोड़कर लोगों ने इसे वोट दिया और मोदी सत्ता के शिखर पर बैठ गए। एक टर्म तो शानदार रहा। दूसरे टर्म में आते ही भाजपा कांग्रेस हो गई, बल्कि कांग्रेस से भी आगे बढ़कर भस्मासुर हो गई।
आपको याद है, 1986 में कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला अपने वोट बैंक को देखते हुए पलट दिया था शाहबानो केस के मामले में, कि उनका मुस्लिम वोट बैंक कहीं नाराज न हो जाए। ये बात तो समझ में आती है कि चलो, अपने वोट बैंक को ध्यान में रखा।
लेकिन यही भाजपा अगस्त 2018 में सुप्रीम कोर्ट के उस शानदार फैसले, जिसमें SC/ST Act में तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी, को पलट दिया। किसके लिए? उस कैटेगरी के लिए जो उसका पारंपरिक वोट बैंक है ही नहीं।
सवर्ण और कुछ भाग OBC भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक माने जाते हैं, लेकिन भाजपा को ये कैसे बर्दाश्त हो कि उसके पारंपरिक वोट बैंक सुख-चैन से रहें? तो ले ली पड़ी लकड़ी और डाल ली अपने ही विरुद्ध।
उस समय सवर्णों ने ज्यादा हो-हल्ला नहीं किया, क्योंकि वैसे भी उन्हें लंबे समय से दलित-विरोधी और शोषक के रूप में चित्रित किया जाता रहा है। इस फैसले पर सवर्णों का ज्यादा विरोध न करने का एक उस समय सवर्णों ने ज्यादा हो-हल्ला नहीं किया कि वैसे भी वो दलित विरोधी माने जाते रहे हैं, शोषक हैं, 5000 साल पहले पानी नहीं पीने दे रहे हैं, अगला फिर भी 5000 साल से स्वयं का पसीना पी-पी के जिंदा है। इस फैसले पे सवर्णों का ज्यादा विरोध न करने का एक कारण और भी था कि ज्यादातर मामले में आँकड़ा देखा जाए तो 85% SC/ST केस OBC वर्ग पर ही लगते हैं। जब ये सबसे बड़ी जनसंख्या वाला वर्ग चुप है तो, तो सवर्ण भी चुप रह गए।
2018 में भाजपा ने बता दिया कि उसकी राजनीतिक सूझबूझ कितनी विवादास्पद दिशा में जा रही है। कांग्रेस ने तो अपने वोट बैंक के लिए निर्णय लिया, लेकिन तुमने? उस कैटेगरी के लिए जिसका राजनीतिक प्रतिनिधित्व और समर्थन अन्य दल भी लंबे समय से करते रहे हैं। मायावती से लेकर चंद्रशेखर, कांग्रेस और तमाम पार्टियाँ दलितों को अपना स्टेकहोल्डर मानती रही हैं, लेकिन जो भाजपा के स्टेकहोल्डर माने जाते रहे, उन पर भाजपा ने पहले उपेक्षा की और फिर उन्हें राजनीतिक रूप से नाराज किया।
फिर भी सवर्णों और OBC ने मिलकर भाजपा को 2019 में जिताया। और शायद इसी को कहते हैं—“अपने ही नुकसान का कारण बनकर भी उसी के साथ खड़े रहना।” सच बात भी है कि सवर्ण और OBC के पास दूसरा विकल्प भी नहीं था और उन्होंने भाजपा के इन विवादास्पद निर्णयों को नजरअंदाज कर दिया।
तो एक बात पर फिर विचार करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा SC/ST Act से संबंधित दिए गए फैसले को पलटने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम के बाद, उसके राजनीतिक संतुलन के रूप में EWS आरक्षण का मुद्दा सामने लाया गया ।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि उस समय सवर्ण समाज की ओर से EWS आरक्षण की कोई व्यापक और संगठित मांग प्रमुखता से सामने नहीं आई थी। इसके बावजूद आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% आरक्षण की व्यवस्था की गई जो सवर्णो के लिए एक झुन झुना मात्र है, जिसमे न फार्म फीस मे छूट है, न फीस मे न ही आयु मे न ही शैक्षिक योग्यता मे , तो किस बात का सवर्ण आरक्षण? । आलोचकों के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह कदम सामाजिक न्याय की वास्तविक आवश्यकता को संबोधित करने के बजाय एक प्रकार का राजनीतिक संतुलन बनाने का प्रयास प्रतीत हुआ।
इस पूरे घटनाक्रम ने विभिन्न जातीय समूहों के बीच पहले से मौजूद असंतोष और अविश्वास को और बढ़ाने का काम किया।
परिणामस्वरूप, विभिन्न जातियों और सामाजिक वर्गों के बीच वैमनस्य तथा अविश्वास बढ़ने की परिस्थितियां निर्मित हुईं।
फिर आया तीसरा टर्म। यहाँ पब्लिक देखती है कि जो इनकी मारता है उसकी ये सहलाते हैं, किसान आंदोलन हुआ जिसमें तमाम अराजकताएँ फैलाई गईं लेकिन मोदी सहलाते रहे, शाहीन बाग हुआ, मोदी सहलाते रहे, और लाए UGC Act, ये हद तक मेंढक टेस्ट कराना चाहते थे कि धीरे-धीरे गर्म करो, मेंढक मरेगा रहे फिर भी हमारा ही। सवर्णों को तो इसमें आदतन अपराधी बना दिया जैसे अंग्रेजों ने कभी पिंडारियों को बनाया था जो लूटपाट और हत्याएँ करते थे। जबकि सा/ST वर्ग का सबसे जादा शोषण OBC वर्ग ही करता है, 80% SC/ST act OBC वर्ग पे है, लेकिन UGC Act मे इन्हे उन्मोचित् रखा गया, और जिस वर्ग के उपर मात्र 20% SC/ST केस है उन्हे बाई डिफाल्ट शोषक और अपराधी बता दिया गया। भाजपा ने बता दिया कि यदि आप सवर्ण हैं तो आप अपराधी हैं, ठीक है वैसे ही जैसे कांग्रेस 2011 में सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा निवारण विधेयक ला रही थी। वो खैर नहीं ला पाई लेकिन मोदी जी ने अपना चिर-परिचित काम कर दिया।
और यह भी विडंबना है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से संबंधित यह व्यवस्था न तो किसी दलित संगठन की प्रमुख माँग थी और न ही किसी अन्य पिछड़ा वर्ग के संगठन की। फिर भी, भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इसे लागू करने का प्रयास किया और देर या सवेर इसे कर ही दिया जायेगा। परिणामस्वरूप, सामान्य वर्ग के लोगों के बीच यह धारणा मजबूत हुई कि उन्हें सामाजिक रूप से संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है और उन्हें “आदतन अपराधी” की तरह प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है।
इस प्रकार के कदम, चाहे उनका वास्तविक उद्देश्य कुछ भी रहा हो, सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने के बजाय विभिन्न जातीय और सामाजिक समूहों के बीच अविश्वास, असंतोष और वैमनस्य को बढ़ाने का काम किया।
यहाँ फिर देखने लायक बात है—कांग्रेस सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा निवारण विधेयक अपने वोटरों को ध्यान में रखकर ला रही थी, भले ही उसके विरोध में नैतिक और राजनीतिक तर्क दिए गए हों। वहीं भाजपा भी कई बार ऐसी नीतियाँ लेकर आई जिन्हें उसके पारंपरिक समर्थकों के एक हिस्से ने अपने हितों के खिलाफ माना। शायद उन्हें एक बार फिर लगा होगा कि जनता सब कुछ सहकर भी उसी के साथ रहेगी।
यहीं से सवर्णों में सुगबुगाहट शुरू हो गई। असंतोष फैलने लगा।
और हाल-फिलहाल कुछ नन्हे-मुन्ने कॉकरोचों ने मिल के इनके एक मंत्री का इस्तीफा तो लिया है साथ ही इनपे थूका भी, और ये लपक के कॉकरोचों का थूका चाट लिए और हाथ जोड़ के गुलदस्ता भी दिए। SC/ST Act को पलटने वाली भाजपा नहीं देख पाई कि उसी मंच से तमाम ब्राह्मणों की बहू-बेटियों के बारे में बेहद आपत्तिजनक और निंदनीय प्रलाप किए जा रहे थे, यदि बात ब्राह्मणों की करूँ तो इसमें सारे सवर्ण, बनिया, OBC इत्यादि को टारगेट किया जाता है क्योंकि एक साथ सारी जातियों का नाम तो नहीं ले सकते, सबको शामिल करके ब्राह्मण का नाम दे दिया जाता है। खैर देखती भी कैसे, ये उनके वोट बैंक, उनके घर के रामू जो ठहरे। वहीं जब सवर्णों ने लामबंद किया आरक्षण के खिलाफ तो उन्हें लाठियाँ खानी पड़ीं, ये सरकार अपने वोटरों की सुनने के लिए तैयार ही नहीं।
जबकि आरक्षण पर मेरा मानना है कि आरक्षण प्रतिनिधित्व के लिए है, न कि अयोग्यता के लिए। क्या वंचित वर्गों में कोई बुद्धिमान व्यक्ति नहीं होता, जिसे योग्यता के आधार पर अवसर मिल सके? क्या बहुत कम अंकों पर प्रवेश, पद और अवसर देना ही एकमात्र रास्ता है? यदि आप जातिगत आरक्षण रखना ही चाहते हैं तो रखिए, कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन कम से कम न्यूनतम शैक्षणिक या योग्यता-आधारित मानक तो रखिए।
पिछड़ी जातियों को प्रतिनिधित्व देने के लिए ही आरक्षण की संकल्पना की गई थी, न कि किसी भी अयोग्य व्यक्ति को केवल उसकी जाति के आधार पर अवसर देने के लिए। आप क्या बताना चाहते हैं कि इतनी सुविधाएँ देने के बाद भी वंचित वर्गों में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो न्यूनतम योग्यता तक पहुँच सके? कहीं तो न्यूनतम पात्रता रखनी होगी।
यही नहीं, इससे भी बढ़कर अजीत भारती ने एक प्रत्युत्तर में बिना जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किए बिना अपनी बहन का बचाव किया, तो उन पर SC/ST Act लगा दिया गया। अब जोड़िए तार—2018 SC/ST Act Amendment से लेकर अजीत भारती के मामले तक।
अब सवर्णों का खून खौल चुका है। जो बोल-लिख नहीं पा रहे, उनके भीतर भी असंतोष उबाल मार रहा है और इसका नतीजा स्पष्ट रूप से आने वाले चुनावों में दिखाई दे सकता है।
अब जनता किसी के बहकावे में आकर उसे घर तक छोड़ने नहीं जाएगी, बल्कि स्वयं महादेव बनकर भस्मासुर की शक्ति उसी पर वापस कर सकती है।
हालाँकि भाजपाइयों के लिए किसी बाहरी शक्ति की जरूरत नहीं होगी। एक के बाद एक अपने ही विवादास्पद निर्णयों और कथित कुकर्मों से मिली शक्ति का दुरुपयोग करते हुए वे स्वयं अपने हाथ अपने सिर पर रखकर राजनीतिक रूप से भस्मासुर बन सकते हैं।
— कमल कुमार
