कविता

साइकिल तथा कार

साइकिल तथा कार
रास्ते से जा रहे थे
अपनी सौंदर्य तथा
तेज रफ्तार पर
कार को अभिमान था
कार साइकिल से बोली,
तुम्हारी औकात छोटी है
एक तिनके की तरह हो तुम
तुम्हारी कोई पहचान नहीं है
तुम बदसूरत सी दिखती हो
मैं सब परिस्थितियों से
लड़ जाती हूँ
और तुम कायर की तरह
सड़क के किनारे से चलती हो
इतनें में भारी भीड़ दिखी
और भयंकर जाम
साइकिल कार को देखकर मुस्कराई
मैं तो इधर-उधर से निकल जाऊंगी
अब तुम जाम का मज़ा लो
मैं तो चली अपने साजन के द्वार

— जयचन्द प्रजापति ‘जय’

*जयचन्द प्रजापति

प्रयागराज मो.7880438226 jaychand4455@gmail.com

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