विरह और शृंगार के अनुगामी दोहे
थम थम कर क्यों बज रही, पायल तेरी बोल।
झुमकी धरती पर मिली,राज जरा तू खोल।।
छेड़ नहीं मुझको प्रिये,जाने तू सब बात।
पिया बसे परदेस हैं, डसती काली रात।।
कंगन पहने हाथ में, राह निहारे रोज़।
पिया बिना फीका लगे, सिंदूरी यह ओज़।।
काजल बहता नैन से, सावन की बौछार।
सूना-सूना घर लगे, रूठा सब शृंगार।।
दर्पण देखूँ तो प्रिये, नैना दिखते लाल ।
अधरों की लाली उड़ी, खिले न बिंदी भाल ।।
— सविता सिंह मीरा
