मुक्तक/दोहा

विरह और शृंगार के अनुगामी दोहे

थम थम कर क्यों बज रही, पायल तेरी बोल।
झुमकी धरती पर मिली,राज जरा तू खोल।।

छेड़ नहीं मुझको प्रिये,जाने तू सब बात।
पिया बसे परदेस हैं, डसती काली रात।।

कंगन पहने हाथ में, राह निहारे रोज़।
पिया बिना फीका लगे, सिंदूरी यह ओज़।।

काजल बहता नैन से, सावन की बौछार।
सूना-सूना घर लगे, रूठा सब शृंगार।।

दर्पण देखूँ तो प्रिये, नैना दिखते लाल ।
अधरों की लाली उड़ी, खिले न बिंदी भाल ।।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com

Leave a Reply