अधूरे पन्ने का आखिरी रंग
अवनीश जी अपनी ज़िंदगी की साठ बसंत देख चुके थे। रिटायरमेंट के बाद उनका दिन अखबार, चाय और बालकनी में लगे पौधों की देखभाल में बीतता था। तीन साल पहले पत्नी के जाने के बाद, उनके जीवन में एक गहरा सन्नाटा पसर गया था। बच्चे विदेश में सेटल थे, और बात करने के नाम पर सिर्फ हफ्ते में एक बार आने वाला वीडियो कॉल था।तभी उनके पड़ोस वाले फ्लैट में उमा जी रहने आईं। उमा जी एक रिटायर्ड स्कूल टीचर थीं, जो हमेशा चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान रखती थीं। उनकी ज़िंदगी भी अवनीश जी जैसी ही अकेली थी, लेकिन उनके पास जीने का एक अलग नज़रिया था।दोनों की पहली मुलाकात सोसायटी के पार्क में हुई। अवनीश जी बेंच पर अकेले बैठे थे, जब उमा जी ने आकर पूछा, “क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?”शुरुआत में सिर्फ “नमस्ते” और “मौसम कैसा है” से शुरू हुई बातचीत धीरे-धीरे शाम की चाय और पुरानी यादों तक पहुँच गई। अवनीश जी को अहसास हुआ कि उनके जीवन का सूनापन अब कम होने लगा है। उन्हें अब शाम का इंतज़ार रहने लगा था।
एक दिन, उमा जी को तेज़ बुखार आ गया। जब अवनीश जी को पता चला, तो वे बिना सोचे उनके घर पहुँचे। उन्होंने उमा जी के लिए सूप बनाया, दवाइयाँ लाकर दीं और रात भर उनके ठीक होने की फिक्र में जागे रहे। जब अगले दिन उमा जी की आँख खुली, तो उन्होंने अवनीश जी को सामने कुर्सी पर सोते हुए पाया। उनकी आँखों में आँसू आ गए।जब अवनीश जी जागे, तो उमा जी ने धीरे से कहा, “इस उम्र में आकर मैंने कभी नहीं सोचा था कि कोई मेरे लिए इस तरह फिक्रमंद होगा।”अवनीश जी ने मुस्कुराते हुए उनका हाथ थामा और कहा, “मोहब्बत और परवाह करने की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती, उमा जी। दिल कभी बूढ़ा नहीं होता।”दोनों ने समाज की परवाह किए बिना, ज़िंदगी के उस आखिरी पड़ाव पर एक-दूसरे का हाथ थामने का फैसला किया। उनका यह इश्क़ जवानी के उस शोर-शराबे जैसा नहीं था, बल्कि सर्दियों की धूप जैसा सुकून देने वाला था।
अवनीश जी और उमा जी के इस फैसले ने उनके जीवन के खाली पन्नों को एक नए रंग से भर दिया था।
सर्दियों की धूप और समाज का कोहरा जब दोनों ने एक साथ रहने का फैसला किया, तो सबसे बड़ी चुनौती समाज और बच्चों की प्रतिक्रिया थी। अवनीश जी के बेटे ने जब फोन पर यह बात सुनी, तो उसका पहला सवाल था, “पापा, इस उम्र में लोग क्या कहेंगे? हमारी क्या इज़्ज़त रह जाएगी?” वहीं उमा जी की बेटी ने थोड़े संकोच के बाद कहा, “मम्मी, अगर आप खुश हैं, तो मुझे कोई ऐतराज़ नहीं, लेकिन दुनिया बहुत बातें बनाएगी।”सोसायटी के कुछ लोग भी उन्हें देखकर आपस में कानाफूसी करने लगे थे। लेकिन अवनीश जी और उमा जी ने तय कर लिया था कि वे अब अपनी ज़िंदगी के बचे हुए पन्ने दूसरों के डर से कोरे नहीं छोड़ेंगे।एक शाम, सोसायटी की एनुअल दीवाली पार्टी थी। अवनीश जी ने सफेद कुर्ता-पायजामा और उमा जी ने एक खूबसूरत नीली सिल्क की साड़ी पहनी थी। जब दोनों ने एक साथ पंडाल में एंट्री की, तो पूरे हॉल में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। फुसफुसाहटें शुरू हो गईं।तभी सोसायटी के सबसे बुजुर्ग सदस्य, 85 वर्षीय शर्मा जी खड़े हुए। सबने सोचा कि वे दोनों को टोकेंगे। लेकिन शर्मा जी मुस्कुराए और आगे बढ़कर बोले, “अवनीश, उमा… आज तुम दोनों को साथ देखकर बहुत खुशी हुई। इस उम्र में अकेलेपन से बड़ा कोई अभिशाप नहीं होता, और तुम दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामकर जो हिम्मत दिखाई है, वह काबिले-तारीफ है। ज़िंदगी जीने के लिए होती है, काटने के लिए नहीं।”शर्मा जी की बात सुनकर हॉल में मौजूद कुछ लोगों की आँखें खुल गईं और धीरे-धीरे पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।पार्टी के बाद, दोनों अपनी बालकनी में बैठे थे। हल्की ठंड थी और आसमान में दीवाली के दीयों की रोशनी थी। उमा जी ने चाय का कप अवनीश जी की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “सचमुच, डर सिर्फ हमारे दिमाग में होता है।”अवनीश जी ने चाय की चुस्की ली, उमा जी का हाथ अपने हाथ में लिया और बोले, “शुरुआत हमेशा खुद से होती है, उमा। हमारा यह इश्क़ जवानी की तरह बेबाक भले न हो, पर इसमें जो ठहराव है, वही हमारी ताकत है।”अब उनकी सुबह अखबार के साथ नहीं, बल्कि एक-दूसरे की मुस्कुराहट और साझा की गई यादों के साथ होती थी। उन्होंने साबित कर दिया था कि मोहब्बत की कोई उम्र नहीं होती, बस एक सच्चे दिल की जरूरत होती है।
अवनीश जी और उमा जी के सफर को एक बेहद खूबसूरत और सुकून देने वाले मुकाम पर ले जाता है:मुस्कुराहटों का नया आशियाना (सुखद अंत) वक्त धीरे-धीरे बीतता गया और समाज की कानाफूसी अब उनके प्रति आदर में बदल चुकी थी। अवनीश जी के बेटे को भी धीरे-धीरे अहसास हुआ कि दूर देश में रहकर वह अपने पिता को वह खुशी और परवाह कभी नहीं दे सकता था, जो उमा जी के साथ रहकर उन्हें मिल रही थी। उसने भारत आकर दोनों के इस रिश्ते को अपना पूरा आशीर्वाद दिया।अपने इस खूबसूरत सफर को एक नाम देने के लिए, दोनों ने कोई बड़ी शादी नहीं की। बल्कि एक कोर्ट मैरिज और फिर एक छोटी सी ‘टी-पार्टी’ रखी, जिसमें उनके बच्चे, सोसायटी के दोस्त और शर्मा जी शामिल हुए।उस शाम, अवनीश जी ने एक छोटा सा सरप्राइज रखा था। उन्होंने घर के नेमप्लेट को बदल दिया था। अब उस पर किसी एक का नाम नहीं, बल्कि लिखा था—”आशियाना: अवनीश और उमा”।शादी के कुछ महीनों बाद, दोनों ने एक नई शुरुआत की। उन्होंने सोसायटी के उन बच्चों के लिए शाम को एक मुफ्त ‘स्टोरी-टेलिंग और हॉबी क्लास’ शुरू की, जिनके माता-पिता काम पर जाते थे। अवनीश जी बच्चों को गणित के गुर सिखाते और उमा जी उन्हें पंचतंत्र की कहानियाँ सुनातीं। उनका वह अकेला और शांत घर अब बच्चों की किलकारियों और हंसी से गूंजने लगा था।एक शाम, जब वे दोनों बच्चों की क्लास खत्म होने के बाद बालकनी में बैठे थे, तब हल्की बारिश हो रही थी। उमा जी ने अवनीश जी के कंधे पर अपना सिर टिकाया।अवनीश जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “जानती हो उमा, लोग कहते हैं कि ढलती उम्र में इंसान का सूरज डूबने लगता है। लेकिन तुम्हारे आने से मेरी ज़िंदगी में एक नई सुबह हो गई है।”उमा जी ने उनका हाथ कसकर थाम लिया और बोलीं, “सूरज कभी ढलता नहीं अवनीश, वह बस एक नई जगह को रोशन करने के लिए आगे बढ़ जाता है। हमारा इश्क़ भी वैसा ही है—हमेशा रोशन।”दोनों एक-दूसरे की आँखों में देख मुस्कुरा दिए। उनकी सफेद जुल्फों और चेहरे की झुर्रियों के पीछे एक ऐसा निश्छल प्यार था, जिसे उम्र का कोई दायरा कभी बांध नहीं सकता था।
— डॉली अग्रवाल
