राजनीति

ब्रिक्स के मंच पर भारत की नई कूटनीतिक परीक्षा

बदलती विश्व व्यवस्था में किसी देश की कूटनीतिक क्षमता का वास्तविक आकलन तब होता है, जब उसके सामने एक साथ कई विरोधाभासी हित खड़े हों। भारत के लिए इस समय ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसा ही अवसर लेकर आया है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, रूस और पश्चिम के बीच बढ़ती दूरी, अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, वैश्विक व्यापार में संरक्षणवाद और ऊर्जा सुरक्षा की चिंता ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को जटिल बना दिया है। ऐसे समय में भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है। इसलिए उसके सामने चुनौती केवल सम्मेलन को सफलतापूर्वक आयोजित करने की नहीं, बल्कि अलग-अलग हितों वाले देशों के बीच संवाद और सहयोग की ऐसी जमीन तैयार करने की है, जहां मतभेदों के बावजूद साझा हितों को आगे बढ़ाया जा सके।

ब्रिक्स का विस्तार पिछले कुछ वर्षों में इसकी शक्ति और जटिलता दोनों बढ़ा चुका है। प्रारंभ में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका तक सीमित यह समूह अब कई नई अर्थव्यवस्थाओं को अपने साथ जोड़ चुका है। इसका भौगोलिक और आर्थिक विस्तार वैश्विक दक्षिण की व्यापक आवाज बनने की संभावना पैदा करता है, लेकिन सदस्य देशों की राजनीतिक प्राथमिकताएं समान नहीं हैं। रूस पश्चिमी दबाव का सामना कर रहा है, चीन वैश्विक शक्ति-संतुलन में अपने प्रभाव का विस्तार चाहता है, ईरान पश्चिमी प्रतिबंधों से जूझ रहा है, जबकि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए अमेरिका और यूरोप के साथ भी संबंध मजबूत कर रहा है। यही विविधता ब्रिक्स को महत्वपूर्ण भी बनाती है और कठिन भी।

भारत के सामने पहली बड़ी चुनौती यह है कि ब्रिक्स को किसी एक देश या किसी एक विचारधारा के विरुद्ध खड़े राजनीतिक गुट में बदलने से रोका जाए। यदि ब्रिक्स की पहचान केवल पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में बनने लगेगी तो भारत के लिए उसकी उपयोगिता सीमित हो सकती है। भारत का हित ऐसी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में है जिसमें किसी एक शक्ति का प्रभुत्व न हो, लेकिन साथ ही विश्व राजनीति स्थायी टकराव में भी न बदल जाए। इसलिए भारत को ब्रिक्स को सहयोग, विकास और वैश्विक शासन में सुधार के मंच के रूप में स्थापित करने पर जोर देना चाहिए।

पश्चिम एशिया का संकट इस परीक्षा को और कठिन बना रहा है। ब्रिक्स के भीतर ही ऐसे देश मौजूद हैं जिनके क्षेत्रीय हित कई बार एक-दूसरे से टकराते हैं। ईरान और अरब देशों के बीच तनाव इसका उदाहरण है। ऐसी परिस्थितियों में किसी साझा राजनीतिक बयान पर सहमति बनाना आसान नहीं होता। भारत को ऐसी कूटनीतिक भाषा विकसित करनी होगी जो किसी पक्ष की कठोर आलोचना के बजाय शांति, संप्रभुता, संवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान पर आधारित हो। यदि नई दिल्ली इस संवेदनशील प्रश्न पर व्यापक सहमति बनाने में सफल होती है तो यह उसकी कूटनीतिक परिपक्वता का महत्वपूर्ण प्रमाण होगा।

ब्रिक्स सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय पहलू भारत-चीन संबंध भी हैं। सीमा विवाद के कारण दोनों देशों के बीच लंबे समय से अविश्वास बना रहा है। हालांकि हाल के समय में संबंधों को स्थिर करने और संवाद बढ़ाने के प्रयास हुए हैं। चीन के शीर्ष नेतृत्व की भारत यात्रा इस संदर्भ में विशेष महत्व रखती है। दोनों देशों के बीच सीमा पर शांति, व्यापार असंतुलन, निवेश और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे विषय महत्वपूर्ण हैं।

भारत को चीन के साथ संबंध सुधारने की आवश्यकता है, लेकिन यह सुधार राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर नहीं हो सकता। सीमा पर शांति दोनों देशों के हित में है, पर शांति का अर्थ रणनीतिक सतर्कता समाप्त करना नहीं है। भारत को आर्थिक सहयोग बढ़ाने के साथ संवेदनशील क्षेत्रों में निर्भरता कम करने और अपनी घरेलू उत्पादन क्षमता मजबूत करने की दिशा में भी आगे बढ़ना होगा। संबंधों में सुधार तभी टिकाऊ होगा, जब वह विश्वास, पारदर्शिता और पारस्परिक सम्मान पर आधारित हो।

रूस के साथ भारत के संबंध भी इस सम्मेलन में महत्वपूर्ण रहेंगे। ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्र में रूस भारत का लंबे समय से महत्वपूर्ण साझेदार रहा है। वैश्विक प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत ने रूस के साथ संवाद बनाए रखा है। यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का हिस्सा है। लेकिन इसके साथ पश्चिमी देशों के साथ भारत के बढ़ते आर्थिक, तकनीकी और सामरिक संबंध भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए भारत को यह संदेश स्पष्ट रखना होगा कि रूस के साथ संबंध पश्चिम के विरुद्ध नहीं हैं और पश्चिम के साथ सहयोग रूस के विरुद्ध नहीं है। भारत की विदेश नीति का आधार किसी गुट का समर्थन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित होना चाहिए।

ब्रिक्स का आर्थिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्यापारिक बाधाएं, आपूर्ति शृंखला का पुनर्गठन, ऊर्जा असुरक्षा और बढ़ती संरक्षणवादी प्रवृत्तियां उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं। भारत को ब्रिक्स के माध्यम से व्यापार, निवेश, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, स्वास्थ्य और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में व्यावहारिक सहयोग बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। यदि सदस्य देश केवल राजनीतिक घोषणाओं तक सीमित न रहकर वास्तविक आर्थिक परियोजनाओं पर आगे बढ़ते हैं तो ब्रिक्स की उपयोगिता कहीं अधिक बढ़ सकती है।

विकासशील देशों के लिए वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों की भागीदारी और निर्णय प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग लंबे समय से उठती रही है। भारत ब्रिक्स के मंच से इन संस्थाओं में सुधार का मुद्दा मजबूती से उठा सकता है। इसका उद्देश्य किसी मौजूदा व्यवस्था को अचानक समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे अधिक प्रतिनिधिक, पारदर्शी और विकासशील देशों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना होना चाहिए।

तकनीक का क्षेत्र भी भारत को अपनी विशिष्ट भूमिका निभाने का अवसर देता है। डिजिटल भुगतान, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी नवाचार में भारत का अनुभव कई विकासशील देशों के लिए उपयोगी हो सकता है। लेकिन तकनीकी सहयोग के साथ डेटा सुरक्षा, डिजिटल अधिकार, साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की जवाबदेही जैसे प्रश्नों पर भी साझा दृष्टिकोण आवश्यक होगा। भविष्य की कूटनीति केवल भूगोल और सैन्य शक्ति से निर्धारित नहीं होगी। तकनीकी क्षमता भी वैश्विक प्रभाव का महत्वपूर्ण आधार बनेगी।

ब्रिक्स को वैश्विक दक्षिण की आवाज बनाने की बात तभी सार्थक होगी, जब उसके एजेंडे में आम नागरिकों से जुड़े प्रश्न भी प्रमुख हों। सस्ती और सुरक्षित ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार, जलवायु वित्त, आपदा प्रबंधन और विकास के लिए संसाधन ऐसे विषय हैं जिन पर भारत व्यावहारिक नेतृत्व दे सकता है। दुनिया के विकासशील देशों को बड़ी घोषणाओं से अधिक ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जिनका प्रभाव उनके नागरिकों के जीवन में दिखाई दे।

भारत को यह भी ध्यान रखना होगा कि ब्रिक्स में नेतृत्व का अर्थ हर मुद्दे पर अपनी बात मनवाना नहीं है। प्रभावी कूटनीति वह है जिसमें अलग-अलग देशों के हितों को समझकर न्यूनतम साझा सहमति तैयार की जाए। भारत यदि अपनी प्राथमिकताओं को दूसरों पर थोपने के बजाय पुल की भूमिका निभाता है तो उसकी स्वीकार्यता बढ़ेगी। यही कारण है कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता केवल विदेश नीति का सिद्धांत नहीं, बल्कि वर्तमान समय की व्यावहारिक आवश्यकता है।

ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत को वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर देती है, लेकिन इसके साथ अपेक्षाएं भी बढ़ती हैं। भारत को एक ओर चीन और रूस जैसे महत्वपूर्ण साझेदारों के साथ संवाद बनाए रखना है, दूसरी ओर पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करना है। उसे पश्चिम एशिया के संकट में संतुलित भूमिका निभानी है और साथ ही वैश्विक दक्षिण के विकास संबंधी हितों को भी आवाज देनी है। यह संतुलन आसान नहीं होगा।

आखिरकार भारत की सफलता सम्मेलन की चमक-दमक या घोषणापत्र की लंबाई से नहीं मापी जाएगी। वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि क्या भारत ब्रिक्स के भीतर संवाद की संस्कृति को मजबूत कर पाता है, क्या आर्थिक और विकासात्मक सहयोग के लिए ठोस रास्ते निकलते हैं और क्या संगठन को किसी गुटीय टकराव का माध्यम बनने से बचाया जा सकता है।

आज विश्व व्यवस्था एक ऐसे दौर में है जहां पुरानी संस्थाएं दबाव में हैं और नई शक्ति-संरचनाएं आकार ले रही हैं। इस संक्रमणकाल में भारत के पास अपनी कूटनीतिक क्षमता प्रदर्शित करने का महत्वपूर्ण अवसर है। उसे न तो किसी शक्ति-गुट का पिछलग्गू बनना है और न ही हर अंतरराष्ट्रीय प्रश्न पर अलगाव की राह अपनानी है। उसे संवाद, संतुलन और राष्ट्रीय हित के आधार पर अपनी राह बनानी है।

ब्रिक्स के मंच पर भारत की नई कूटनीतिक परीक्षा इसी संतुलन की परीक्षा है। यदि भारत विविध हितों वाले देशों को एक साझा विकासात्मक एजेंडे पर जोड़ने में सफल रहता है, तो यह उसकी वैश्विक भूमिका को नई ऊंचाई देगा। आने वाले समय में भारत की प्रतिष्ठा केवल इस बात से नहीं तय होगी कि वह कितनी तेजी से आर्थिक शक्ति बनता है, बल्कि इससे भी तय होगी कि वह अपनी बढ़ती शक्ति का इस्तेमाल विश्व में संवाद, स्थिरता और सहयोग बढ़ाने के लिए कितनी समझदारी से करता है। यही ब्रिक्स की चुनौती है और यही भारत के सामने खड़ा सबसे बड़ा कूटनीतिक अवसर भी।

— अवनीश कुमार गुप्ता

अवनीश कुमार गुप्ता

साहित्यकार, स्वतंत्र स्तंभकार, समीक्षक एवं पुस्तकालयाध्यक्ष पता: प्रयागराज 211008, उत्तर प्रदेश मोबाइल: 8354872602 ईमेल: awanishg30@gmail.com

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