मुक्तक/दोहा

अस्सी का वह दौर

अस्सी का वह दौर था, रिश्तों में था प्यार।
अब रिश्ते है फोन में, सूना है घर-द्वार॥

थोड़ा था पर बाँटकर, खाते थे परिवार।
अब थाली भरपूर है, फिर भी मन बीमार॥

कच्चे घर में प्रेम था, पक्के मन के लोग।
अब पक्के हैं भवन सब, मन में बैठे रोग॥

दादा-दादी की कथा, संस्कारों की खान।
आज स्क्रीन के सामने, खोता बचपन-ज्ञान॥

चिट्ठी आती थी कभी, लेकर सच्चा प्यार।
अब संदेश हजार हैं, फिर भी मन लाचार॥

चूल्हा सबका एक था, एक जगह परिवार।
आज रसोई आधुनिक, फिर भी बिखरा प्यार॥

सुख-दुख जुड़े पड़ोस के, सब होते थे साथ।
अब अपने ही घर लगे, दूर हुए हैं हाथ॥

कम साधन, संतोष था, जीवन था खुशहाल।
सुविधाएँ बढ़ती गईं, बढ़ता गया मलाल॥

संस्कारों की छाँव में, पलता था परिवार।
अब स्वतंत्रता नाम पर, टूट रहे आधार॥

राजनीति में नीति थी, सेवा था आधार।
अब कुर्सी की होड़ में, खत्म जन-सरोकार॥

त्योहारों में मिलते सभी, अपने सारे लोग।
फोटो खिंचवा लौटते, खत्म हुआ संयोग॥

अस्सी जैसा काल फिर, चाहिए अगर समाज।
चित्र नहीं, व्यवहार में, लाओ उसका राज॥

बीते युग की याद में, मत कर समय खराब।
जो अच्छा उस दौर का, आज लगे है ख्वाब॥

चित्र बनाकर क्या मिले, यदि बदले न विचार।
लौट सके संस्कार तो, लौटेगा परिवार॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

Leave a Reply