तस्वीर नहीं, संस्कार लौटाओ
अस्सी के बस चित्र से, खुश होते हो आज।
सोचो उस तस्वीर में, कैसा बसा समाज॥
रिश्ते अपनापन लिए, दिल में था विश्वास।
भाईचारा हर जगह, घर में था उल्लास॥
सादा भोजन, श्रम अधिक, जीवन था खुशहाल।
माटी से जुड़ आदमी, मन से था धनवान॥
अब तो चारों ओर बस, मशीन का संसार।
पैसा बढ़ता जा रहा, घटता प्यार-दुलार॥
इक छत के नीचे रहें, फिर भी दूर विचार।
मोबाइल में सिमटता, अब पूरा संसार॥
संस्कारों की बात अब, लगती जैसे भार।
मर्यादा को भूलकर, कैसी यह रफ्तार॥
राजनीति के खेल में, गिरता रोज़ विचार।
स्वार्थों की इस दौड़ में, कहाँ है सरोकार॥
क्या लौटेंगे चित्र से, बीते दिन के रंग?
सूने मन के आँगना, कैसे आए उमंग॥
अस्सी जैसा चाहिए, तो बदलो व्यवहार।
तस्वीरें मत खोजिए, खोजो वह संस्कार॥
रिश्ते फिर से जोड़िए, फिर लौटे विश्वास।
प्रेम, श्रम और सादगी—यही समय की आस॥
चित्र नहीं, संस्कार दो, फिर आए वह काल।
रिश्ते जब जीवित रहें, जीवन हो खुशहाल॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
