उर्मिला का विश्वास
लक्ष्मण जीवन और मृत्यु के बीच की स्थिति मूर्छित अवस्था में थे । उन्हें मेघनाद ने युद्ध में घायल कर दिया था । रामभक्त हनुमान वेद्यों के आदेशानुसार संजीवनी बूटी लेने हिमालय चले गये । लौटते समय अयोध्या से गुजरे तो भरत जी ने राक्षस समझ कर बाण मार दिया । जय श्री राम के उच्चारण से हनुमान व भरत की आपसी शंका दूर हुई । सारा वृत्तांत हनुमान जी ने अयोध्या वासियों को कह सुनाया ।
सभी दुःखी हो गये सिवाय उर्मिला को छोड़कर… हनुमान जी से उर्मिला की प्रसन्नता देखी न गई ।
हनुमान जी बोले- ‘देवी ! तुम्हारा पति मृत्यु के साये में है । सूर्य उदय होते ही सूर्यकुल का दीपक बुझ जायेगा और तुम विधवा हो जाओगी । तुम्हें तनिक भी अपने पति के प्राणों के संकट की चिंता नहीं । तुम्हारा चेहरा तनिक भी न मुरझाया ।’
उर्मिला ने हनुमान की बातों को सुनकर जो उत्तर दिया, उसे सुनकर तीनों लोकों के प्राणी उनकी वंदना किए बिना नहीं रह सकते ।
उर्मिला बोली- ‘हे हनुमान ! मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो कभी नहीं बुझ सकता । रही बात सूर्योदय की तो आप चाहें तो दो-चार दिन अयोध्या में विश्राम कीजिए । आपके वहां पहुंचे बिना सूर्योदय हो ही नहीं सकता । प्रभु श्री राम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं, जो साक्षात् ईश्वर का अवतार हैं और जो ईश्वर की गोद में सोया हो उसे मृत्यु क्या मारेगी । ये तो उनकी कोई लीला है । मेरे पति ने न सोने का प्रण लिया था, इसलिए वे कुछ समय के लिए विश्राम कर रहे हैं । शक्ति मेरे पति को नहीं स्वयं श्री राम को लगी है । मेरे पति की श्वास – श्वास में राम बसे हैं । उनके हृदय की हर धड़कन में राम बसे हैं । पीड़ा मेरे पति को नहीं राम को हो रही है । इसीलिए हे हनुमान ! आप निश्चिंत हो जाइए । जब तक आप वहां पहुंच नहीं जाते सूर्योदय नहीं होगा ।’
हनुमान उर्मिला की भक्ति और विश्वास देखकर दंग रह गये। उर्मिला की भक्ति, प्रेम, त्याग, समर्पण और बलिदान ने मृत्यु को हरा दिया।
— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
