कविता

कर्मफ़ल की अदालत

ऐ मेरे मन,पापों और गुनाहों से अब तौबा कर लो,
अंतर की मैली गलियों को पश्चाताप से धो लो।
आज सँभल जाओ,कल के पछतावे का बोझ न ढो लो,
नेकी की राह चुनकर जीवन को सच्चा कर लो।

कर्मों की किताब में हर इक़ हिसाब लिखा जाता है,
जो जैसा बीज़ बोता है,वैसा ही फ़ल पाता है।
दुनियाँ की अदालत से इंसान कभी बच भी जाता है,
कर्मफ़ल की अदालत में कोई कहाँ बच पाता है।

किसी के दिल को दुखाकर चैन कहाँ मिल पाएगा,
किसी का हक़ छीनोगे तो सुकून कहाँ आएगा।
गुनाहों को छिपाकर मन कब तक मुस्कुराएगा,
कर्मों का ब्याज़ समय आने पर सब लौटाएगा।

न धन काम आएगा,न छल का सहारा होगा,
न झूठी शान का कोई वहाँ इशारा होगा।
जिसे समझे थे छुपा लिया,वही कर्म हमारा होगा,
कर्मल के तराज़ू में हर कर्म दोबारा होगा।

इसलिए ऐ मेरे मन,अभी अपनी राह बदल ले,
बुराई के हर कदम को नेकी की ओर मोड़ ले।
किशन तौबा कर,किसी के आँसू को मुस्कान में बदल दे,
कर्मफ़ल से पहले अपने कर्मों का चेहरा बदल ले।

— किशन सनमुखदास भावनानी

*किशन भावनानी

कर विशेषज्ञ एड., गोंदिया

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