मेरे अक्षरों में भारत
मेरे अक्षरों में भारत है, मेरी वाणी में स्वाभिमान,
मेरी बोली के कण-कण में, गूँजे मेरा हिंदुस्तान।
माँ के आँचल की ममता है, मिट्टी की सौंधी खुशबू,
हिंदी के हर स्वर में सुनता, मैं भारत की मधुर धुन।
यह केवल बोलों का क्रम नहीं, यह युग की जीवित धारा,
इसमें गाँवों की सादगी है, इसमें नगरों का उजियारा।
हल की मूठ पकड़ते हाथों का इसमें सच्चा मान,
मेहनत की हर एक लकीर में, लिखता अपना हिंदुस्तान।
कभी संतों की निर्भय वाणी, कभी भक्तों का विश्वास,
कभी प्रेम की निर्मल सरिता, कभी सत्य का प्रकाश।
कबीर की आँखों का साहस, तुलसी का संस्कार,
मीरा के मन का समर्पण, सूर का प्रेम अपार।
यह भाषा मन जोड़ती है, दूरी को कम करती है,
अनकहे भावों को भी सहज, शब्दों में भरती है।
उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूरब से पश्चिम तक,
भारत की विविध धड़कनों को, बाँधती एक लय में।
हर भाषा भारत का गहना, हर बोली का मान,
सबके सुर से सजता सुंदर, मेरा हिंदुस्तान।
किसी भाषा को छोटा करना, हिंदी का संस्कार नहीं,
सबको साथ लेकर बढ़ना ही, इसकी सच्ची पहचान सही।
अब प्रयोगशालाओं में पहुँचे, हिंदी के उजले शब्द,
तकनीक की नई दिशाओं में, गढ़े ज्ञान के पर्वत।
कंप्यूटर से अंतरिक्ष तक, शिक्षा से अनुसंधान,
हर नए क्षितिज पर लिख दे, हिंदी अपनी पहचान।
नई पीढ़ी के हाथों में जब, ज्ञान का दीप जलेगा,
हिंदी का स्वर नई सदी में, और अधिक उजलेगा।
पुस्तक, विद्यालय, मंच, तकनीक, हर जगह बने आधार,
मातृभाषा के साथ बढ़ेगा, ज्ञान का विस्तृत संसार।
आओ शब्दों को कर्म बनाएँ, केवल नारा न दें,
हिंदी के सम्मान के खातिर, अपना योगदान दें।
बच्चों को इसकी मिठास दें, युवाओं को दें उड़ान,
ज्ञान और सृजन से दुनिया में, ऊँचा हो हिंदुस्तान।
जब तक खेतों में हरियाली, जब तक नदियों में धार,
जब तक हिमगिरि खड़ा रहेगा, लेकर नभ का भार,
तब तक मेरी हिंदी बोले, मेरा भारत महान,
तब तक मेरे अक्षरों में, जीवित हिंदुस्तान!
मैं हिंदी को केवल भाषा नहीं, अपना स्वर मानूँगा,
इसके हर अक्षर में भारत का उज्ज्वल कल जानूँगा।
माथे पर इसका गौरव होगा, हृदय में इसका गान,
मेरे अक्षरों में भारत, मेरी हिंदी मेरी शान!
जय हिंदी! जय भारत! जय हिन्दुस्तान! जय आर्यावर्त!
— रूपेश कुमार
